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राज्यसभा ने पास किया केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय विधेयक, 2019 (संशोधन)

LiveLaw News Network
18 March 2020 3:00 AM GMT
राज्यसभा ने पास किया केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय विधेयक, 2019 (संशोधन)
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राज्यसभा के सदस्य सोमवार को केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय विधेयक, 2019 के समर्थन में आए और इसे ध्वनि मत से पारित कर दिया।

तीन संस्कृत विश्वविद्यालय को केंद्रीकृत करने के विधेयक को लोकसभा में 12 दिसंबर 2019 के शीतकालीन सत्र के दौरान मंजूरी दे दी गई थी।

मानव संसाधन विकास मंत्री, रमेश पोखरियाल ने नई दिल्ली में स्थित राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान व श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ और तिरुपति स्थित राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ को केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालयों में तब्दील करने के लिए विधेयक को पेश किया था।

मंत्री ने कहा कि यह कदम इन विश्वविद्यालयों की स्थिति या दर्जे को बढ़ाएगा। वहीं संस्कृत और शास्त्री शिक्षा के क्षेत्र में स्नातकोत्तर, डॉक्टरल और पोस्ट डॉक्टरल शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देगा।

उन्होंने कहा कि यह भारतीय दर्शन, योग, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में शिक्षा प्रदान करने के अवसरों को बढ़ाने में भी मदद करेगा।

विधेयक पर चर्चा के दौरान, कांग्रेस सांसद जयराम रमेश, बीजेडी के प्रशांत नंदा और एआईटीसी के सुखेंदु शेखर ने कुछ संदेह या शर्तोें के साथ विधेयक के लिए समर्थन व्यक्त किया। हालांकि, डीएमके के एम. शनमुगम ने बिल का विरोध करते हुए कहा कि यह तमिल जैसी शास्त्रीय भाषाओं के खिलाफ है।

इसी तरह के नोट या सोच पर , संस्कृत को ''मृत भाषा'' कहते हुए डीएमके के वाइको ने भी बिल का विरोध करते हुए कहा कि इससे न केवल दक्षिण भारतीय भाषाओं को बल्कि पंजाबी और ओडिया को भी खतरा होगा।

मुख्य विशेषताएं

विश्वविद्यालयों की स्थापना

विश्वविद्यालयों को संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए निर्देशात्मक, अनुसंधान और विस्तार की सुविधाएं प्रदान करके प्रसार और अग्रिम ज्ञान के उद्देश्य से एक निकाय के रूप में स्थापित किया जाएगा।

वे अध्यापन प्रक्रिया में नवाचारों को बढ़ावा देने और विषय के समग्र विकास के लिए जनशक्ति को शिक्षित और प्रशिक्षित करने के लिए उचित उपाय अपनाने के लिए जिम्मेदार होंगे।

विश्वविद्यालय की शक्तियाँ और कार्य

विधेयक की धारा 6 के अनुसार, विश्वविद्यालयों को सशक्त बनाया जाएगा और बाध्य किया जाएगा-

(ए)अध्ययन के पाठ्यक्रम का निर्धारण करना और प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करना ।

(बी) डिग्री, डिप्लोमा और प्रमाण पत्र प्रदान या अवार्ड करना।

(सी) दूरस्थ शिक्षा/ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली के माध्यम से शिक्षण की सुविधा प्रदान करना।

(डी) कॉलेज या किसी संस्थान को स्वायत्त स्थिति प्रदान करना। (ई) संस्कृत और संबद्ध विषयों में शिक्षा के लिए निर्देश प्रदान करना , (एफ) संस्थान फैलोशिप, छात्रवृत्ति आदि।

प्राधिकारी वर्ग

प्रत्येक विश्वविद्यालय में निम्नलिखित प्राधिकारी वर्ग होंगे।

एक कोर्ट- विश्वविद्यालय की नीतियों की समीक्षा करने और उसके विकास के लिए उपाय सुझाने के लिए।

-एक कार्यकारी परिषद- प्रमुख कार्यकारी निकाय

-एक अकादमिक परिषद-शैक्षणिक नीतियों की निगरानी के लिए ।

-बोर्ड ऑफ स्टडीज- शोध के लिए विषयों को अनुमोदित करने और शिक्षण के मानकों में सुधार के उपायों की सिफारिश करने के लिए।

-एक वित्त समिति- पदों के सृजन से संबंधित प्रस्तावों की जांच करने और विश्वविद्यालय के व्यय की समीक्षा करने के लिए।

-एक योजना और निगरानी बोर्ड- विश्वविद्यालय के समग्र नियोजन और विकास के लिए।

विवाद और अपील

कोई भी छात्र, जिसका नाम कुलपति, अनुशासन समिति या परीक्षा समिति के आदेशों या प्रस्ताव द्वारा ।

विश्वविद्यालय के रोल से हटा दिया गया है, या जिसे एक वर्ष से अधिक समय के लिए विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में उपस्थित होने से वंचित कर दिया गया है, वह इस तरह के आदेशों की प्राप्ति की तारीख के दस दिनों के भीतर कार्यकारी परिषद के समक्ष अपील कर सकता है।

एक छात्र के खिलाफ विश्वविद्यालय द्वारा की गई किसी भी अनुशासनात्मक कार्रवाई से उत्पन्न किसी भी विवाद को छात्र के अनुरोध पर मध्यस्था के न्यायाधिकरण या ट्रिब्यूनल में भेजा जा सकता है।

एक कर्मचारी और विश्वविद्यालय के बीच अनुबंध को लेकर उत्पन्न विवादों को भी ट्रिब्यूनल या पंचाट को संदर्भित किया जा सकता है, जिसमें

(ए) कार्यकारी परिषद द्वारा नियुक्त एक सदस्य

(बी) संबंधित कर्मचारी या छात्र द्वारा नामित एक सदस्य, और

( सी) विश्वविद्यालय के आगंतुक यानी भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त एक अंपायर या मध्यस्थ शामिल होगा।

चूंकि विधेयक को कुछ संशोधनों के साथ उच्च सदन द्वारा पारित किया गया है, इसलिए अब इसे वापस लोकसभा में भेजा जाएगा।

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