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'जमानत आवेदन के मामलों में तथ्यों पर केन्द्रित रहें, अधिकारी न्यायिक संयम बनायें', राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ टिप्पणी करने पर POCSO कोर्ट से कहा

SPARSH UPADHYAY
1 July 2020 10:56 AM GMT
जमानत आवेदन के मामलों में तथ्यों पर केन्द्रित रहें, अधिकारी न्यायिक संयम बनायें, राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ टिप्पणी करने पर POCSO कोर्ट से कहा
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राजस्थान हाईकोर्ट ने सोमवार (29 जून) को पारित किये गए एक जमानत आदेश में (धारा 439 Cr.P.C के अंतर्गत दाखिल किये गए जमानत आवेदन के मामले में) कहा कि जमानत आवेदन पर निर्णय लेने के दौरान, अदालत को अपने आप को केवल तथ्यों पर केन्द्रित करना चाहिए और केवल इसलिए कि, जिले में समान प्रकृति के मामले वाले कुछ अन्य उदाहरण भी हैं, उक्त आधार पर जमानत आवेदन को खारिज नहीं किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति संजीव प्रकाश शर्मा की पीठ ने यह टिप्पणी उस मामले में कि जिसमे जमानत के आवेदनकर्ता/याचिकाकर्ता के खिलाफ, पुलिस स्टेशन, मलारना डूंगर, जिला सवाई माधोपुर (राजस्थान) में धारा 457, 354 (ए), 354 (बी) और 506 आईपीसी एवं धारा 7 और 8 POCSO अधिनियम के अंतर्गत अपराध के चलते एफआईआर नंबर 40/2020 दर्ज की गयी है।

दरअसल, याचिकाकर्ता को प्रथम बार धारा 151 Cr.P.C के अंतर्गत अपराध के लिए गिरफ्तार किया गया था, और उसे सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और फिर छोड़ दिया गया। इसके बाद, आरोपी याचिकाकर्ता के खिलाफ, अन्य प्रावधानों के अलावा धारा 354 (ए) और 354 (बी) आईपीसी के तहत आरोपों के लिए शाम को एक प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई थी।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में इस बात को रेखांकित किया कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में भी यह अवलोकन आया है कि ऊपर बताई गयी धाराओं के अंतर्गत प्राथमिकी तब भी दर्ज की गयी, जबकि अभियोजन पक्ष (पीडिता) के पिता ने आरोपी याचिकाकर्ता की प्रारंभिक गिरफ्तारी के समय ऐसा कोई बयान नहीं दिया था।

लोक अभियोजक ने जमानत अर्जी का विरोध करते हुए अदालत में यह प्रस्तुत किया कि एफआईआर बाद में दर्ज की गई थी और 164 Cr.P.C. के अंतर्गत बयान भी दर्ज किया गया है।

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने अपने आदेश में देखा कि

"...मामले के मेरिट्स और कथन पर टिप्पणी किए बिना, ऐसा प्रतीत होता है कि प्रारंभ में, अभियुक्त को गिरफ्त में लेकर हैण्ड ओवर किया गया और उस स्तर पर, आरोपी याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाया गया और उसके बाद, एफआईआर को एक दिन की देरी के बाद दर्ज किया गया।"

इसके पश्च्यात, अदालत ने POCSO कोर्ट द्वारा याचिकाकर्ता की जमानत आवेदन को ख़ारिज करते हुए की गयी टिपण्णी को लेकर कहा कि,

"मैंने माननीय न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश का अवलोकन किया है, जिन्होंने ऐसा लगता है कि संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कुछ टिप्पणी की है। ऐसा प्रतीत होता है कि न्यायिक अधिकारी, समाचार पत्र की रिपोर्ट से काफी प्रभावित हैं और उनका निर्णय उसी से प्रभावित है। जमानत आवेदन पर निर्णय लेने के दौरान, अदालत को अपने आप को केवल तथ्यों पर केन्द्रित करना चाहिए और केवल इसलिए कि, जिले में समान प्रकृति के मामले वाले कुछ अन्य उदाहरण भी हैं, उक्त आधार पर जमानत आवेदन को खारिज नहीं किया जा सकता है।"

अदालत ने आगे कहा,

"न्यायिक संयम को अधिकारियों द्वारा बनाए रखा जाना चाहिए, विशेष रूप से जिला न्यायाधीश के स्तर पर। न्यायाधीश, स्पेशलकोर्ट (POCSO मामले), सवाई माधोपुर, द्वारा की गयी टिपण्णी, अदालत, प्रशासन और पुलिस के अस्तित्व पर ही एक सवालिया निशान है, पूरी तरह से अनुचित है। संबंधित न्यायाधीश को यह निर्देश दिया जाता है कि वह अपने आदेशों में इस तरह की टिप्पणी करने से भविष्य में सचेत रहें।"

आगे, अदालत ने जारी किए गए निर्देशों को निष्कासित/मिटाने (Expunge) का आदेश देते हुए कहा कि सम्बंधित न्यायाधीश आगे से अन्य मुद्दों पर विचलित होने के बजाय केवल उनके सामने मौजूद मामले पर ही केंद्रित रहें।

इसी के साथ अदालत ने अभियुक्त को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। याचिकाकर्ता को 20,000/- का एक व्यक्तिगत बॉन्ड, एक श्योरिटी के साथ प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया है, जिसे उसे संबंधित मजिस्ट्रेट की संतुष्टि के साथ प्रस्तुत करना होगा और इस शर्त के साथ कि वह धारा 437 (3) के तहत निर्धारित सभी शर्तों का पालन करेगा।

इसके अलावा, अदालत ने इस आदेश की एक प्रति को न्यायाधीश, विशेष न्यायालय (POCSO मामले), सवाई माधोपुर को भेजे जाने का भी आदेश दिया।

आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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