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रेलवे कोच को आइसोलेशन वार्ड में परिवर्तित करना सरकार का नीतिगत निर्णय, न्यायालय इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता : मद्रास हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
14 April 2020 4:45 AM GMT
रेलवे कोच को आइसोलेशन वार्ड में परिवर्तित करना सरकार का नीतिगत निर्णय, न्यायालय इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता : मद्रास हाईकोर्ट
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‘‘इस गंभीर स्थिति में, डॉक्टरों द्वारा COVID रोगियों को दी जा रही योमन सेवाओं को कभी भी दिल-दिमाग या यादों से मिटने नहीं दिया जा सकता है। वास्तव में यह न्यायालय डॉक्टरों, नर्सों, पुलिस, निगम के अंतिम ग्रेड के कर्मचारियों और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के लिए अपनी अथाह प्रशंसा को व्यक्त करता है। ’

मद्रास हाईकोर्ट ने समयबद्ध कदम उठाने और ट्रेन के डिब्बों में मोबाइल आइसोलेशन वार्ड बनाने के लिए सरकार के काम की सराहना की। जबकि उस याचिका को खारिज कर दिया है,जिसमें मांग की गई थी कि सरकार को निर्देश दिया जाए कि वह कैरिज को अस्पताल में परिवर्तित न करें और कोरोना संक्रमित रोगियों को चिकित्सा सहायता प्रदान करने के लिए निजी अस्पतालों की संख्या बढाएं।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से मामले की सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति एस.वैद्यनाथन की एकल पीठ ने ट्रेन के डिब्बों को आइसोलेशन वार्ड में परिवर्तित करने के पीछे ''विशाल दृष्टिकोण'' की व्याख्या की और कहा कि-

''भविष्य में आपातकाल की स्थिति में, कोरोना प्रभावित रोगियों को अगर खुद को आइसोलेशन करने के लिए उपयुक्त स्थान या बिस्तर नहीं मिलेंगे तो उनको इसके लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर भागने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता है। इसलिए बड़े दृष्टिकोण के साथ, सरकार ने आकस्मिक स्थिति से निपटने के लिए कोच को मोबाइल आइसोलेशन वार्ड के रूप में परिवर्तित करने का फैसला किया है। ऐसा करके कुछ गलत नहीं किया गया है। पक्के निर्माण वाले भवन की तुलना में सामाजिक दूरी को बनाए रखने के लिए आइसोलेशन के उद्देश्य से कोचों को आसानी से अलग किया जा सकता है।''

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि निजी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाने की बजाय सरकार ने कोरोना प्रभावित व्यक्तियों को उपचार देने के लिए ट्रेन के डिब्बो को चुना है। जिनका रख-रखाव उचित स्वच्छता के साथ नहीं किया गया है। ऐसे में उन रोगियों के लिए स्वास्थ्य खतरा हो सकता है,जिनको इनमें रखा जाएगा।

इसका खंडन करते हुए, राज्य ने तर्क दिया कि इन डिब्बों का आइसोलेशन वार्ड के रूप उपयोग केवल उन मरीजों के लिए किया जाएगा,जो इस बीमारी से मामूली रूप से प्रभावित होंगे। उन्हें ही इनमें रखा जाएगा। वहीं द्वितीयक चरण से, रोगियों को अस्पतालों में स्थानांतरित कर दिया जाएगा या भेज दिया जाएगा।

इसके अलावा यह भी बताया गया कि जिन डिब्बों को आइसोलेशन वार्ड में बदला गया है, उनमें किसी में भी वेंटिलेटर की सुविधा नहीं दी गई है। इसलिए यह कहना या इस बात की आशंका निराधार है कि इन डिब्बों में रखने वाले मरीजों को उचित उपचार नहीं दिया जाएगा।

इन दलीलों की सराहना करते हुए, हाईकोर्ट ने मामले में कोई भी निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया और कहा कि-

''कोचों को परिवर्तित करने का सरकार का फैसला एक नीतिगत निर्णय है,जिसमें यह न्यायालय आंख मूंदकर हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। बशर्तें जब तक कि यह विकृत या अवैध न हो, क्योंकि इसमें बड़े पैमाने पर जनता का हित शामिल है। इसलिए यह न्यायालय प्रशासनिक पक्ष में बैठकर कोचों को परिवर्तित करने के संबंध में अपना विचार व्यक्त नहीं कर सकता है।''

अदालत ने निजी अस्पतालों पर भरोसा करने से संबंधित मुद्दों को भी इंगित किया-

-यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि सभी निजी अस्पताल हमेशा सेवा उन्मुख या सेवा के लिए तत्पर होते हैं, क्योंकि कुछ निजी अस्पतालों का प्रशासन पहले से ही कॉर्पोरेट एजेंट/ मनी मैनेजर के हाथों में चला गया है। ऐसे में वर्तमान परिदृश्य का उपयोग करके, वे मरीजों की उचित व अच्छी देखभाल करने की बजाय निश्चित रूप से पैसे कमाने का ही प्रयास करेंगे।

-हो सकता है कि कई निजी अस्पतालों का निर्माण स्वीकृत योजना का उल्लंघन करके किया गया हो। ऐसे में अगर सरकार इन अस्पतालों में कोरोना के मरीजों के इलाज की अनुमति दे देती है तो बाद में यह अस्पताल इसे आधार बनाकर इन योजना के नियमितीकरण की मांग कर सकते हैं।

अदालत ने निजी कॉलेजों और छात्रावासों को प्रवासी श्रमिकों और सड़क किनारे रहने वालों लोगों के लिए आइसोलेशन वार्डों में परिवर्तित करने के मामले में भी अपनी चुप्पी को बनाए रखा क्योंकि यह मामला हाईकोर्ट की डिविजन बेंच के समक्ष पहले से ही लंबित है।

न्यायमूर्ति वैद्यनाथन ने हालांकि टिप्पणी की है कि-

''इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि सामान्य स्थिति बहाल होने के बाद, माता-पिता यह सोचकर अपने बच्चों को इन कॉलेजों में पढ़ने या छात्रावास में रहने की अनुमति देने से हिचकेंगे क्योंकि इन स्थानों का इस्तेमाल कोरोना प्रभावित व्यक्तियों को अलग करने के लिए किया गया था।

उस स्थिति में निजी कॉलेजों को वित्तीय नुकसान होगा और इस नुकसान को किसी से भी वसूला नहीं जा सकता है। सरकार से भी नहीं क्योंकि अप्रत्याशित महामारी के प्रकोप के कारण सरकार स्वयं गंभीर वित्तीय संकट में है। इसके अलावा, संरचित इमारतों को सुवासित या फ्यूमगेट करना बहुत मुश्किल है, जबकि रेलवे के डिब्बों को फ्यूमगेट करना बहुत आसान है। क्योंकि यह डिब्बे एम्बुलेंस प्रकृति के हैं और जो लोग बहुत बीमार हैं, उन्हें आसानी से उच्च केंद्रों में स्थानांतरित किया जा सकता है।''

इस प्रकार मामले में दायर याचिका को खारिज कर दिया गया। साथ ही याचिकाकर्ता से कहा गया कि वह इस तरह की याचिका दायर करने में सावधानी बरतें, जो सरकारी तंत्र में एक प्रकार की ''हताशा और शिथिलता''पैदा करने वाली हों और काम की प्रक्रिया को धीमा करती हों।

मामले का विवरण-

केस का शीर्षक-एम. मुनुसामी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एंड अदर्स

केस नंबर-डब्ल्यूपी नंबर 7431/2020

कोरम-न्यायमूर्ति एस. वैद्यनाथन

प्रतिनिधित्व- वकील कृष्णा मूर्थि (याचिकाकर्ता के लिए)व सीनियर पैनल के वकील वी.चंद्रशेखरन और के. श्रीनिवास मूर्थि (प्रतिवादी नंबर एक व दो के लिए),पी.टी रामकुमार व पी. श्रीनिवासन (प्रतिवादी नंबर तीन के लिए),एडीशनल एडवोकेट जनरल एस.आर राजगोपाल साथ में सरकारी वकील वी. जयप्रकाश नारायणन (प्रतिवादी नंबर चार व पांच के लिए)



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