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बलात्कार पीड़िताओं के अधिकारों व पहचान के संरक्षण के लिए जनहित याचिका पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य को नोटिस जारी किया

LiveLaw News Network
1 Feb 2020 3:45 AM GMT
बलात्कार पीड़िताओं के अधिकारों व पहचान के संरक्षण के लिए जनहित याचिका पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य को नोटिस जारी किया
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और महाराष्ट्र राज्य को नोटिस जारी किया है। इस जनहित याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों और 2013 से 2018 के बीच संशोधित मूलभूत और प्रक्रियात्मक आपराधिक कानूनों (जो पूरे देश भर की अदालतों में शीघ्रता से सुनवाई के अधिकार और बलात्कार पीड़ितों/जीवित बचे लोगों की पहचान के संरक्षण से संबंधित हैं) को लागू करने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।

न्यायमूर्ति रंजीत मोरे और न्यायमूर्ति एस.पी तवाडे की खंडपीठ ने मुंबई के एक चिकित्सक, डॉ.नॉयल कुरीकोस और 28 वर्षीय पुणे निवासी प्रियंका देवरे द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की, जो खुद यौन अपराधों की शिकार हैं।

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ हाईकोर्ट के कई फैसलों के बावजूद, देश में मीडिया हाउस बलात्कार पीड़ितों /जीवित बचे लोगों के नाम या पहचान को उजागर कर रहे हैं।

इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता माधवी तवंडी और हर्षद गरुड़ पेश हुए। उन्होंने तर्क दिया कि इस मामले में एक निश्चित तात्कालिकता थी क्योंकि विभिन्न वेबसाइटों ने 2019 के हैदराबाद सामूहिक बलात्कार मामले के साथ-साथ तमिलनाडु सामूहिक बलात्कार मामले में बलात्कार पीड़ितों की पहचान का खुलासा किया था।

जनहित याचिका में कहा गया है-

''बलात्कार के मामलों में पीड़ित या जीवित बचे हुए को मुकदमे का सामना करके अपनी पहचान की रक्षा करते हुए आरोपी की किसी भी आक्रामकता से अपनी व अपने परिवार के सदस्यों की रक्षा करने, समाज द्वारा उसके प्रति किए गए अपमानजनक व्यवहार आदि से बहुत पीड़ा या परेशानी उठानी पड़ती है। उसे खुद को छुपाना पड़ता है और सामान्य जीवन जीना छोड़कर, उसे सार्वजनिक रूप से उजागर होने से खुद को बचाना पड़ता है, जिससे उसके जीवन में और जटिलताएँ बढ़ जाती हैं।

ऐसे में बलात्कार के मुकदमे में होने वाली असाधारण देरी के कारण उसके सामान्य जीवन जीने का अधिकार छीन रहा है। अगर बलात्कार के मुकदमे में सुनवाई एक निश्चित अवधि में पूरी हो जाए तो यह पीड़ित/ उत्तरजीवी को उसके खिलाफ किए गए अपराध से पहले वाले उसके पुराने जीवन को जीने की अनुमति देगा या वो अपनी पहले वाली सामान्य जिदंगी फिर से जी पाएगी।''

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि आपराधिक कानून में विभिन्न संशोधनों के बावजूद, महाराष्ट्र राज्य ऐसी विशेष अदालतों का गठन करने में विफल रहा है, जो अनावश्यक स्थगन की अनुमति दिए बिना, समयबद्ध अवधि में बलात्कार के मुकदमों को निपटा सकें।

जनहित याचिका में 9 दिसंबर, 2019 को रिपोर्ट किए गए उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट के फैसले को भी संदर्भित किया गया है,जिसमें 218 फास्ट ट्रैक न्यायालयों को शुरू करने के लिए कदम उठाए गए हैं। इनमें से 144 फास्ट ट्रैक कोर्ट बलात्कार के मामलों की सुनवाई करेंगी और 74 पॉक्सो कोर्ट बच्चों के खिलाफ अपराधों से संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए बनाई गई हैं।

याचिकाकर्ताओं ने प्राथमिक रूप से यह निर्देश दिए जाने की मांग की है कि या तो वर्तमान कानूनों को लागू किया जाए और पुराने लंबित बलात्कार के मामलों के तेजी से निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने के लिए यूपी सरकार की तरह सीआरपीसी की धारा 309 के अनुसार कदम उठाए जाएं या फिर प्रक्रियात्मक कानूनों में नए संशोधन किए जाए ताकि इन मामलों के मुकदमों में तेजी लाई जा सकें।

याचिका प्रति डाउनलोड करें




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