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माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 को लागू कराने के लिए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका

LiveLaw News Network
31 May 2020 4:32 PM GMT
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 को लागू कराने के लिए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका
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राज्य के क़ानून की सीमा को देखते हुए माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 को लागू कराने के लिए तत्काल अधिसूचना जारी करने के आग्रह वाली याचिका पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में कहा गया है कि COVID-19 महामारी की वजह से लागू राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की वजह से इस बारे में राज्य के क़ानून का दायरा सीमित है।

न्यायमूर्ति सुरेश्वर ठाकुर और न्यायमूर्ति चंदर भूषण बरोवलिया की पीठ ने केंद्र और राज्य सरकार से दो सप्ताह के भीतर इस पर जवाब मांगा है।

याचिका शिमला के अजय कुमार श्रीवास्तव ने दायर की है जो हिमाचल विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। उन्होंने याचिका में कहा है कि हिमाचल प्रदेश सरकार ने अभी तक माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 को अधिसूचित नहीं किया है।

श्रीवास्तव ने या याचिका वक़ील अर्जुन लाल और श्रद्धा करोल के माध्यम से दायर किया है। हिमाचल प्रदेश ने अपना हिमाचल प्रदेश माता पिता और आश्रितों का भरण पोषण अधिनियम, 2001 पास कर चुका है। इस क़ानून का दायरा कम है और यह केंद्रीय क़ानून और संविधान के अनुच्छेद 254 के विरुद्ध है।

याचिका में कहा गया है कि

"(राज्य के) अधिनियम 2001 में कहा गया है कि मां-बाप, पत्नी और बच्चों और उनसे जुड़े लोगों के भरण-पोषण का प्रावधान है। इस अधिनियम का उद्देश्य मां-बाप, पत्नियों और बच्चों को सहयोग देना है और लोगों पर इन लोगों के भरण पोषण का नैतिक दायित्व डालना है।"

...अधिनियम 2007 का क्षेत्र व्यापक है और यह ज़्यादा लाभकारी और विस्तृत है और अधिनियम 2001 की तुलना में ज़्यादा बड़ी राहत दिलाने वाला है…।"

कहा गया है कि देश में COVID-19 महामारी के फैलने की वजह से राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन को देखते हुए अधिनयम 2007 और महत्त्वपूर्ण हो गया है।

"सरकार ने जो लॉकडाउन घोषित किया है उसकी वजह से बुजुर्ग नागरिकों घर पर रहने के लिए बाध्य हैं। इस अवधि के दौरान, ऐसे बुजुर्ग नागरिक जो विभिन्न कारणों से अकेले रह रहे हैं, उनकी मदद करनेवाला कोई नहीं है और वे बैंकिंग और मेडिकल सुविधा प्राप्त नहीं कर सकते।

उन्हें आवश्यक वस्तुएं जैसे किराना का सामान, दूध, दवा ख़रीदने और बैंक से पैसे निकालने के लिए घर से निकलने के लिए बाध्य होना पड़ता है। इन लोगों को COVID-19 से जिस तरह का ख़तरा है उसको देखते हुए, COVID-19 से संक्रमित हो जाने का ख़तरा इनको ज़्यादा होता है और यह उनके लिए जानलेवा साबित हो सकता है।"

याचिका में अदालत से अनुरोध :

याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि वह हिमाचल सरकार के 2001 के अधिनियम को केंद्र सरकार के अधिनियम 2007 का विरोधी करार दे और इस तरह उसे संविधान के अनुच्छेद 254(1) और (2) का उल्लंघन करने की वजह से अवैध ठहराए।

यह भी अनुरोध किया कि अदालत न्यायदेश जारी करे कि उसने हिमाचल प्रदेश माता पिता और आश्रितों का भरण पोषण अधिनियम, 2001 को निरस्त कर दिया है और उसकी जगह माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 प्रभावी होगा।

याचिका डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें




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