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केंद्रीय मंत्रियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोप की सूचना देने के बारे में व्हिसिलब्लोअर की अपील पर पीएमओ को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

LiveLaw News Network
2 Feb 2020 5:33 AM GMT
केंद्रीय मंत्रियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोप की सूचना देने के बारे में व्हिसिलब्लोअर की अपील पर पीएमओ को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
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केंद्रीय मंत्रियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोप की सूचना देने के बारे में व्हिसिलब्लोअर की अपील पर पीएमओ को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने पीएमओ को एक व्हिसलब्लोअर की याचिका पर नोटिस जारी किया है। व्हिसिलब्लोअर आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने एक विशेष अनुमति याचिका दायर की है जिसमें उन्होंने केंद्रीय मंत्रियों के ख़िलाफ़ 1 जून 2014 से 5 अगस्त 2017 के बीच लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों के बारे में सूचना माँगी है।

याचिका में यह भी माँग की गई है कि सरकार देश में कितना काला धन वापस लाने में सफल रही है और कितना भारतीय जनता के खाते में आया है।

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने पीएमओ के केंद्रीय आम सूचना अधिकारी को इस बारे में चार सप्ताहों के भीतर जवाब देने को कहा है।

चतुर्वेदी की पैरवी वरिष्ठ वक़ील प्रशांत भूषण और रोहित कुमार सिंह ने की। चतुर्वेदी ने दिल्ली हाईकोर्ट की एक खंडपीठ के फ़ैसले के ख़िलाफ़ एसएलपी दायर किया है। इस फ़ैसले में खंडपीठ ने एकल जज के फ़ैसले को सही ठहराया था जिसमें उन्हें सूचना नहीं देने के मुख्य सूचना आयुक्त के फ़ैसले को सही ठहराया गया था।

चतुर्वेदी ने भारी घोटाले का पर्दाफ़ाश किया था जिसमें नेता और नौकरशाह दोनों शामिल हैं।

चतुर्वेदी ने अगस्त 2017 में पीएमओ में एक आवेदन देकर प्रधानमंत्री को केंद्रीय मंत्रियों के ख़िलाफ़ 1 जून 2014 से 5 अगस्त 2017 के बीच भ्रष्टाचार की सभी शिकायतों और उस पर की गई कार्रवाई की एक प्रमाणित प्रति माँगी थी।

उन्होंने यह सूचना भी माँगी थी कि देश में कितना काला धन वापस लाया गया और 01.06.2014 से इसकी कितनी राशि आम लोगों के खातों में डाली गई।

इसके अलावा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने प्रधानमंत्री कार्यालय को जो झूठी और भ्रामक रिपोर्ट भेजी थी उस पर अधिकारियों के ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई हुई इस बारे में भी दस्तावेज़ों की प्रमाणित प्रति माँगी थी।

पीएमओ ने मंत्रियों के ख़िलाफ़ सूचना को आम और अस्पष्ट होने के कारण इस बारे में कोई जानकारी देने से मना कर दिया था। काले धन के बारे में सूचना के बारे में बताया गया कि यह आरटीआई अधिनियम की धारा 2f के तहत नहीं आता। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के बारे में कहा गया कि उचित समय पर बता दिया जाएगा।

इसके बाद चतुर्वेदी ने मुख्य सूचना आयुक्त से अपील की जिसने पीएमओ को यह सूचना देने को कहा।

पर पीएमओ ने आरटीआई की धारा 7(9) के तहत सीआईसी को नज़रंदाज़ कारने की कोशिश की और कहा कि इससे सार्वजनिक अथॉरिटी का संसाधन ग़ैर सामानुपातिक रूप में ट्रांसफ़र हो जाएगा।

काले धन के बारे में पीएमओ ने कहा कि यह सूचना देने से इस बारे में चल रही जाँच प्रभावित होगी।

जब चतुर्वेदी ने आदेश का पालन नहीं होने के बारे में सीआईसी में दुबारा अपील की तो सीआईसी ने अपने ही पूर्व के आदेश की समीक्षा की और एसएलपी में कहा है कि अब याचिकाकर्ता के बजाय प्रतिवादी की आपत्तियों को जायज़ ठहरा दिया है।

सीआईसी ने चतुर्वेदी की दूसरी अपील को ख़ारिज कर दिया।

इसके बाद चतुर्वेदी ने सीआईसी द्वारा अपने ही आदेश की समीक्षा करने के ख़िलाफ़ दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की और हाईकोर्ट की एकल पीठ ने सीआईसी के निर्णय का समर्थन करते हुए अपील ख़ारिज कर दी।

एसएलपी में चतुर्वेदी ने कहा है कि यह फ़ैसला लोकतंत्र की जड़ पर हमला है क्योंकि आम जनता को यह जानने का हक़ है कि सरकार में किस तरह से काम हो रहा है।

सीआईसी अपने ही आदेश की समीक्षा कर सकती है, इस बात पर भी उन्होंने सवाल उठाया है।

चतुर्वेदी ने कहा है कि हाईकोर्ट का यह कहना ग़लत है कि सीआईसी ने धारा 18 के तहत अपील ख़ारिज की है।

चतुर्वेदी ने कहा कि सही बात यह है कि सीआईसी के आदेश में जो शब्द प्रयुक्त हुआ है वह है 'डिस्पोज़्ड' न कि 'डिसमिस्ड' जैसा कि हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश से यह आभास होता है कि आदेश नहीं मानने के बारे में दिए गए आवेदन को ख़ारिज कर दिया गया क्योंकि यह उचित उपचार नहीं था जबकि सीआईसी ने सभी मुद्दों पर व्यापक आधार पर निर्णय लिया था।

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