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लॉकडाउन के दौरान वाइन की दुकानों को खुली रखने में कोई सार्वजनिक हित नहीं कर्नाटक हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

LiveLaw News Network
7 April 2020 3:15 PM GMT
लॉकडाउन के दौरान वाइन की दुकानों  को खुली रखने में कोई सार्वजनिक हित नहीं  कर्नाटक हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका
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कर्नाटक हाईकोर्ट ने मंगलवार को कहा है कि शराब की दुकानें खोलने की अनुमति देने में कोई सार्वजनिक हित शामिल नहीं है। खासतौर जब 21 दिनों की लॉकडाउन अवधि के दौरान बड़ी आबादी भोजन की प्राथमिक आवश्यकता से वंचित हो रही हो।

मुख्य न्यायाधीश अभय ओका और न्यायमूर्ति बी.वी. नागरथना की खंडपीठ ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से इस मामले की सुनवाई की। इस मामले में स्वर्गीय जी बी कुलकर्णी मेमोरियल लीगल ट्रस्ट ने अपने अध्यक्ष डॉ विनोद जी कुलकर्णी के माध्यम से याचिका दायर की थी।

याचिका में कहा गया था कि लॉकडाउन की अवधि के दौरान कुछ श्रेणी के लोग किसी भी रूप या मात्रा में शराब का सेवन करने से वंचित हो रहे हैं। भारत में प्राचीन काल से सामाजिक तौर पर पीने का अस्तित्व रहा है और हिंदू धर्मग्रंथों में इस बात का उल्लेख है कि उस काल के दौरान भी लोग नियमित रूप से सोम रस का सेवन करते थे।

अदालत ने जब याचिका पर सुनवाई करने से इंकार कर दिया तो डॉ. कुलकर्णी ने अपनी याचिका को वापिस ले लिया। साथ ही उसने मुख्यमंत्री राहत कोष में 10,000 रुपये की राशि का योगदान देने की पेशकश की। अदालत ने उसे दो सप्ताह के भीतर राशि का भुगतान करने के लिए कहा है। साथ ही निर्देश दिया है कि वह हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार न्यायिक को इसकी एक रसीद भी भेज दे।

डॉ.कुलकर्णी एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रसिद्ध मनोचिकित्सक हैं। उन्होंने अपनी याचिका में कहा था कि अगर सीमित मात्रा में शराब का सेवन किया जाए तो यह शरीर और दिमाग को आराम देती है। बहुत से लोग शराब का सामाजिक तौर पर सेवन करते हैं और उन्हें 'शराब के आदी' होने का नाम नहीं दिया जा सकता है।

लॉकडाउन के कारण जनता शराब खरीदने से वंचित हो रही है जिसके परिणामस्वरूप मानसिक अवसाद, चिंता, हिस्टीरिया का प्रकोप और असामान्य व्यवहार होता जा रहा है। शराब न पीने के परिणामस्वरूप एक खतरनाक स्थिति हो सकती है जिसे 'डेलिरियम या उन्माद' कहा जाता है, जो महत्वपूर्ण रुग्णदर और मृत्यु दर के साथ एक चिकित्सा आपातकाल है।

इसके अलावा, सामाजिक तौर पर इसे पीने वालों को शराब पीने से वंचित करना भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। याचिका में यह भी कहा गया था कि कर्नाटक में ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां शराब उपलब्ध नहीं होने के कारण लोगों ने आत्महत्या की है।

2 अप्रैल को, केरल हाईकोर्ट ने केरल सरकार के एक तीस मार्च को जारी आदेश पर रोक लगा दी थी। इस आदेश के अनुसार आबकारी विभाग उस व्यक्ति को शराब की आपूर्ति की अनुमति दे सकता है,जो चिकित्सा प्रमाण पत्र पेश करके यह दिखा दे कि वह शराब विद्ड्रॉल सिंड्रोम या नशीले पदार्थ के प्रतिकार सिंड्रोम से पीड़ित है।

जस्टिस एके जयशंकरन नांबियार ने कहा था,

''हम इस बात से चिंतित हैं कि राज्य सरकार ने अल्कोहल विदड्रॉल सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्तियों को अधिक अल्कोहल देने के लिए एकतरफा निर्णय लिया है। यह परेशान करने वाला है और यह आपदा के लिए एक नुस्खा है।''

केरल सरकार के आदेश के अनुसार, एक व्यक्ति को शराब पर निर्भरता के संबंध में डॉक्टर से प्रमाण पत्र प्राप्त लेना होगा।

दिशानिर्देशों में कहा गया था कि 'अल्कोहल विदड्रॉल के लक्षण' से ग्रसित व्यक्ति मेडिकल कॉलेजों सहित किसी भी सरकारी अस्पताल के आउट पेशेंट विभाग से संपर्क कर सकते हैं।

परामर्श देने वाला डॉक्टर यह प्रमाणित करने के लिए एक पर्ची या 'राय' जारी कर सकता है कि रोगी में विदड्रॉल के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। जिसके बाद इस पर्चे को निर्धारित प्रारूप वाली अर्जी और सरकार द्वारा प्रदान किए गए पहचान पत्र के साथ आबकारी विभाग के कार्यालय या सर्कल कार्यालय में जमा करना होगा। उसके बाद संबंधित प्राधिकारी द्वारा 'पास' जारी किया जा सकता है।

यह आबकारी कार्यालय का कर्तव्य होगा कि वह राज्य के प्रत्येक मरीज को दिए जाने वाले परमिट की सूचना केरल स्टेट बेवरेजेज कॉर्पोरेशन के प्रबंध निदेशक को दें। इसके बाद कॉर्पोरेशन भी केरल के 'आबकारी अधिनियम 'के अनुसार आईएमएफएल का निर्धारित स्तर या तय लेवल ही प्रदान करेगा।

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