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"लाॅकडाउन की आड़ में कोई गैरकानूनी सजा नहीं", बॉम्बे हाईकोर्ट ने चेताया, जनहित याचिका मेंं लाॅकडाउन का उल्लंघन करने वालों को अपमानित करने का आरोप

LiveLaw News Network
10 May 2020 6:45 AM GMT
लाॅकडाउन की आड़ में कोई गैरकानूनी सजा नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट ने चेताया, जनहित याचिका मेंं लाॅकडाउन का उल्लंघन करने वालों को अपमानित करने का आरोप
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा है कि लाॅकडाउन को लागू कराने की आड़ में पुलिस गैर कानूनी तरीकों व दंडों का सहारा नहीं ले सकती है। इस मामले में दायर जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि कुछ पुलिस कर्मी मानवाधिकारों का पूरी तरह से उल्लंघन करने के दोषी हैं क्योंकि उन्होंने वरिष्ठ नागरिकों सहित लॉकडाउन का उल्लंघन करने वालों के साथ 'अमानवीय व्यवहार' किया है।

नागपुर पीठ के न्यायमूर्ति रोहित बी. देव की पीठ इस मामले में एक संदीप मधु नायर की तरफ से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने माना कि पुलिस बल बड़े पैमाने पर इस समय समय अपने कर्तव्यों का अनुकरणीय तरीके से निर्वहन कर रहा है। ऐसे में याचिका में जिन उदाहरणों पर प्रकाश डाला गया है वो पुलिस तंत्र द्वारा किए जा रहे प्रशंसनीय प्रदर्शन पर एक धब्बा हैं।

याचिकाकर्ता का कहना है कि कुछ लोगों ने लाॅकडाउन के निर्देशों का कथित रूप से उल्लंघन किया था, जिनमें सुबह की सैर पर जाने वाले वरिष्ठ नागरिक भी शामिल हैं। इन सभी के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया। इन कथित उल्लंघनकर्ता के हाथ में प्लेकार्ड देकर फोटो खींची गई। इस प्लेकार्ड पर लिखा गया था कि यह उल्लंघनकर्ता राष्ट्र, समाज, परिवार और मानवता का दुश्मन हैं क्योंकि इसने कानून तोड़ा है। इसके अलावा, लॉकडाउन उल्लंघनकर्ताओं की यह तस्वीरें, जिनमें बुजुर्ग नागरिक और सम्मानित पेशेवर भी शामिल हैं, प्रमुख अखबारों में प्रकाशित की गई और सोशल मीडिया पर वायरल भी हो गई।

याचिकाकर्ता के वकील अनिल कामले ने कहा कि इस समय पुलिस को हक मिला हुआ है और वास्तव में वह बाध्य भी है कि लाॅकडाउन को लागू करवाने के लिए कानून के चार कोनों के भीतर हर संभव उपाय करे, परंतु इसका उल्लंघन करने वालों का अपमानजनक तमाशा करना मानव अधिकारों और अनुच्छेद 21 के तहत मिले संवैधानिक अधिकारों का का गंभीर उल्लंघन हैं।

यह देखते हुए कि उक्त याचिका में लगाए गए आरोप 'बेहद परेशान' करने वाले हैं, अदालत ने अतिरिक्त सरकारी प्लीडर के.एस जोशी से कहा कि वह यह पता लगाएं कि पीआईएल में जो आरोप लगाए हैं,क्या ऐसी घटनाएं सच में हुई हैं।

एजीपी जोशी ने पुलिस कमिश्नर बी.के उपाध्याय और जेसीपी रवींद्र कदम से निर्देश लेने के बाद बताया कि लॉकडाउन के पहले चरण में कुछ घटनाएं हुई हैं और अपमानजनक तस्वीरें पुलिस द्वारा प्रकाशित नहीं की गई हैं।

हालांकि, एजीपी अभी तय बताने की स्थिति में नहीं थे कि क्या यह तस्वीरें पुलिस कर्मियों द्वारा ली गई थीं ? उन्होंने अदालत को आश्वासन दिया कि मामले की अगली सुनवाई पर इस संबंध में सूचना दे दी जाएगी।

जस्टिस रोहित देव ने कहा कि-

'' मैंने लॉकडाउन निर्देशों को लागू करवाने की आड़ में पुलिस कर्मियों द्वारा दिए गए असामान्य और अपमानजनक दंडों को उजागर करने वाली कई समाचार रिपोर्टों को देखा है। इस न्यायालय के पास इसके पीछे के इरादे पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। हालांकि, जरूरी नहीं है कि अंत इन साधनों को सही ही ठहराए। जिन पुलिस कर्मियों ने मानवीय गरिमा का घोर उल्लंघन किया है, उनसे उम्मीद की जा रही थी कि वह हमारे समाज को ऐसे सभ्य समाज के रूप में जीवित रखेंगे ,जो कानून के शासन द्वारा संचालित हो।

जबकि यह बात सही है कि असाधारण स्थितियों में असाधारण उपायों से ही निपटान होता है। परंतु उन सभी उपायों के लिए कानून की मंजूरी होनी चाहिए। मानवीय गरिमा और अधिकारों को असाधारण स्थितियों की वेदी पर नहीं चढ़ाया जा सकता है और न ही गरिमापूर्ण जीवन के संवैधानिक अधिकार को इन कथित इरादों के लिए बंधक बनाया जा सकता है। यह न्यायालय पुलिस आयुक्त से अनुरोध कर रहा है कि वह अपनी कमांड या आदेश के तहत पुलिसकर्मियों को संवदेनशील बनाए ताकि सुनिश्चित हो सकें कि इस तरह की घिनौनी घटनाएं दोबारा न हों।''

इसके अलावा, अदालत ने पुलिस को यह भी निर्देश दिया है कि लॉकडाउन के उल्लंघनकर्ताओं के लिए कोई अतिरिक्त कानूनी उपाय न अपनाएं या इस तरह की सजा न दें।

कोर्ट ने कहा-

''पुलिस तंत्र के पास कानून के प्रावधानों के तहत पर्याप्त शक्ति है, जो उनको लॉकडाउन निर्देशों का सख्ती से पालन करवाने में सक्षम बनाती है। हालांकि इस अदालत को भरोसा है कि पुलिस तंत्र के शीर्ष अधिकारी यह सुनिश्चित कर देंगे कि आगे से लॉकडाउन लागू करने के दौरान मानव अधिकारों का उल्लंघन न किया जाए। इस तरह की हर घटना पर ध्यान दिया जाना चाहिए। यह न्यायालय पुलिस आयुक्त से अपेक्षा करता है कि वह इन मामलों में उस वरिष्ठ अधिकारी को इसके लिए जिम्मेदार ठहराएंगे, जिनके अधिकार क्षेत्र में इस तरह ही घटना पाई जाएं।''

राज्य के गृह विभाग और अन्य प्रतिवादियों को 21 मई के लिए नोटिस जारी किया गया है।


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