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आत्महत्या के लिए उकसाने को स्थापित करने के लिए कोई साक्ष्य नहीं, एमपी हाईकोर्ट ने 23 साल पहले मिली सज़ा के खिलाफ दायर अपील स्वीकार की

LiveLaw News Network
12 Jan 2020 9:30 AM GMT
आत्महत्या के लिए उकसाने को स्थापित करने के लिए कोई साक्ष्य नहीं, एमपी हाईकोर्ट ने 23 साल पहले मिली सज़ा के खिलाफ दायर अपील स्वीकार की
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की प्रिंसिपल बेंच, जबलपुर ने आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में एक अपीलार्थी-अभियुक्त को मिली सज़ा के फैसले को पलट दिया। इस मामले में 23 साल पहले अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने इस अपीलार्थी को उसकी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में दोषी पाया था, जो आईपीसी की धारा 306 के तहत दंडनीय है।

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने कहा कि,

''रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य निर्णायक रूप से उकसाने को साबित नहीं करते, जो कि आईपीसी की धारा 107 के तहत आवश्यक है। किसी भी गवाह द्वारा यह आरोप नहीं लगाया गया है कि अपीलकर्ता ने उकसाव या साजिश के रूप में कार्य किया था ताकि उसे मृतका को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराया जा सके।''

अदालत ने पाया कि शारीरिक हमले या मारपीट की किसी एक घटना (जिसे साबित माना जाता है) के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता है कि मृतका के खिलाफ निरंतर क्रूरता हो रही थी या यह घटना इस तरह की प्रकृति की थी कि उसके पास आत्महत्या करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

अदालत ने कहा कि अलग-अलग कारणों के बावजूद, ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को आईपीसी की धारा 498 ए के तहत दंडनीय क्रूरता के आरोप से बरी करके सही किया है। हालांकि, इस संबंध में एक सुझाव पर चर्चा की गई थी कि क्या आईपीसी धारा 498-ए में जिस''पत्नी'' शब्द का इस्तेमाल किया गया है, उसमें केवल कानूनी रूप से विवाहित पत्नी शामिल है?

इस मामले में, अपीलकर्ता ने पहले से ही एक अन्य महिला से विवाह कर रखा था और उसने अपनी पहली पत्नी को तलाक दिए बिना मृतका के साथ दूसरी शादी की थी।

इस प्रस्ताव या वाक्य के पक्ष में जोर देते हुए अपीलकर्ता ने तर्क दिया था कि आईपीसी एक दंडात्मक कानून है और न कि सामाजिक कल्याण कानून, जिसकी इस तरह से व्यापक व्याख्या नहीं की जा सकती है कि उसमें एक ऐसे व्यक्ति को शामिल किया जा सके है जो कानूनी तौर पर अपीलकर्ता की पत्नी नहीं थी, बल्कि इस विश्वास के साथ उसके साथ रह रही थी कि वह कानूनी रूप से उसकी पत्नी है।

एस तर्क के विपरीत अवलोकन करते हुए, हाईकोर्ट ने रीमा अग्रवाल बनाम अनूप एंड अदर्स (2004) 3 एससीसी 199 मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन किया, जिसमें यह माना गया था कि अमान्य विवाह की दलील एक पति को धारा 498-ए के तहत क्रूरता के अपराध के लिए आरोपित होने से छूट नहीं दे सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि

'' ऐसे व्यक्ति को कवर करने के लिए 'पति'शब्द की व्याख्या में बाधा ड़ालना उचित होगा ,जो वैवाहिक संबंध में प्रवेश करता है और ऐसे घोषित या विवादित पति की स्थिति के रंग के तहत महिला से क्रूरता करता है या किसी भी तरह से उसे प्रताड़ित करता है या कुछ ऐसा करता है जो आईपीसी की धारा 304 बी और 498 ए के संबंधित प्रावधान के तहत आता हो, भले ही आईपीसी की धारा 498 ए और 304 बी के सीमित प्रयोजन के तहत विवाह की वैधता कैसी भी हो।

इस तरह की व्याख्या, जिसे उद्देश्यपूर्ण निर्माण के रूप में जाना और पहचाना जाता है, उसे इस प्रकृति के मामलों में लागू करना पड़ता है। ''पति'' शब्द की परिभाषा, जिसमें विशेष रूप से ऐसे व्यक्तियों को शामिल नहीं किया गया है, जो अनुबंधित रूप से किसी महिला के साथ विवाह और सहवास करते हैं, अपनी भूमिका और स्थिति को पति के रूप में दर्शाते हैं, उन्हें धारा 304 बी या 498ए के दायरे से बाहर करने का कोई आधार नहीं है। इन मामलों को ऐसे प्रावधानों को पेश करने वाले विधानों के लक्ष्य और उद्देश्य के संदर्भ में देखा जाता है।''

रीमा अग्रवाल के मामले में निष्कर्षों के मद्देनजर, हाईकोर्ट ने कहा,

''यह मुद्दा अब पूर्णांक नहीं है। चूंकि, इस मामले में अपीलकर्ता को धारा 498 ए और 304 बी आईपीसी के तहत अपराधों से बरी कर दिया गया है। इस बात के कोई सबूत नहीं है कि अभियुक्त ने मृतक पत्नी के खिलाफ क्रूरता की थी या क्रूरता से पेश आया था।

ट्रायल कोर्ट ने उसे आईपीसी की धारा 498-ए के तहत इस आधार पर अपराध से बरी कर दिया था कि जब उसे आईपीसी की धारा 306 के तहत दोषी ठहराया जा रहा था तो आईपीसी की धारा 498-ए के तहत मामले पर विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं थी।''

मामले का विवरण

केस शीर्षक- दिनेश कुमार सोनी बनाम मध्य प्रदेश राज्य

केस नंबर-सीआरएल,अपील नंबर 1936/1997

कोरम- न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन

प्रतिनिधित्व-अधिवक्ता प्रियंका मिश्रा (अपीलकर्ता के लिए), पैनल अधिवक्ता पीयूष भटनागर (राज्य के लिए)



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