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सर्वोच्च न्यायलय ने लिंग चयन और लड़कों को तरजीह देने को बताया संवैधानिक कर्तव्यों और महिला सम्मान के विरुद्ध [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
9 May 2019 8:20 AM GMT
सर्वोच्च न्यायलय ने लिंग चयन और लड़कों को तरजीह देने को बताया संवैधानिक कर्तव्यों और महिला सम्मान के विरुद्ध [निर्णय पढ़े]
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एक नर बच्चे को तरजीह देना संविधान के अनुच्छेद 39ए का उल्लंघन है और अनुच्छेद 51ए(ई) में दिए गए आदेश के खिलाफ है,जिसमें नागरिकों को यह संवैधानिक ड्यूटी दी गई है कि वह महिलाओं के मान-सम्मान को ठेस पहुंचाने वाले अपमानजनक चलनों का त्याग कर दे।

पूर्व-गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन पर रोक)अधिनियम 1994 की धारा 23 की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए जस्टिस अरूण मिश्रा व जस्टिस विनित सरन की खंडपीठ ने कहा कि कन्या भू्रण हत्या एक सबसे बड़ा अमानवीय काम है।
कोर्ट ने कहा कि यह अधिनियम एक सामाजिक कल्याण विधान है। जिसके बारे में भारत में बढ़ते लिंग अनुपात के कारण सोचना पड़ा, ताकि इसके परिणामों से बचा जा सके। इस संबंध में कोर्ट ने पाया कि-
''जिस क्षति को ठीक करने की कोशिश की जा रही है,वह बहुत गंभीर है और प्रयास किए जा रहे है ताकि लड़कियों को पैदा होने से रोकने की चुनौती से लड़ा जा सके। समाज में नर बच्चे को तरजीह दिया जाना एक गंभीर चिंता का मुद्दा है। यह अनुच्छेद 39 एक का उल्लंघन है और अनुच्छेद 51(ई) में दिए गए आदेश के खिलाफ है,जिसमें नागरिकों को यह संवैधानिक ड्यूटी दी गई है कि वह महिलाओं के मान-सम्मान को ठेस पहुंचाने वाले अपमानजनक चलनों का त्याग कर दे।''
कोर्ट ने यह भी कहा कि बढ़ता लिंग अनुपात महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों को बढ़ावा देगा,जिसमें महिलाओं की तस्करी,दुल्हन खरीदने आदि अपराध शामिल होंगे। कोर्ट ने कहा कि अधिनियम को कड़े तरीके से लागू करना जरूरी है ताकि कन्याओं को बचाने का काम किया जा सके।
लिंग न्याय विधान में है खुद को सही साबित करने की जिम्मेदारी
इस फैसले में एक अन्य महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा है कि लिंग न्याय के मामले में ऐसा वैधानिक प्रावधान हो सकता है जो खुद को सही साबित करने की जिम्मेदारी ड़ाले। कोर्ट ने उन कुछ कुछ कानूनों का भी उल्लेख किया,जिनमें खुद को सही साबित करने की जिम्मेदारी ड़ाली गई है। कोर्ट ने बताया कि पोक्सो एक्ट की धारा 29 व 30 व भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113ए,113बी व 114ए में इसी तरह के प्रावधान है।
''इन प्रावधानों में साफ दर्शाया गया है कि महिलाओं व बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों को विधान कितनी गंभीरता से लेता है। इन प्रावधानों से यह भी स्पष्ट है िकइस तरह के अपराध व्यापक स्तर पर फैलने वाली प्रकृति के है इसलिए विधानमंडल को यह भी उचित लगा िकइस तरह के मामले में खुद को सही साबित करने की जिम्मेदारी ड़ाल दी जाए। अधिनियम की धारा 4(3) के नियमों की उपधारणा को इस संबंध में देखा जा सकता है।''
धारा 4(3) के नियम को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि इसमें खुद को सही साबित करने की जिम्मेदारी ड़ाली गई है। इन नियम के तहत यह जरूरी कर दिया गया है कि जो व्यक्ति गर्भवती महिला का अल्ट्रासांउड करेगा,उसे निर्धारित नियमों के अनुसार सारे रिकार्ड पूरे रखने होंगे। अगर इनमें कोई कमी पाई जाती है तो इसे धारा 5 या धारा 6 के नियमों के खिलाफ माना जाएगा। बशर्ते अल्ट्रासांउड करने वाला व्यक्ति खुद इस बात को गलत साबित न कर दे।

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