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न तो लोगों को और न ही आपराधिक न्याय व्यवस्था को ही पुलिस में विश्वास है : दिल्ली बार काउंसिल ने आपराधिक क़ानून में सुधार मेंं उसके प्रतिनिधित्व को शामिल करने की मांग की

LiveLaw News Network
1 July 2020 3:15 AM GMT
न तो लोगों को और न ही आपराधिक न्याय व्यवस्था को ही पुलिस में विश्वास है : दिल्ली बार काउंसिल ने आपराधिक क़ानून में सुधार मेंं उसके प्रतिनिधित्व को शामिल करने की मांग की

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को लिखे पत्र में दिल्ली बार काउंसिल ने आपराधिक क़ानून में सुधार के लिए बनी केंद्रीय समिति में बार के प्रतिनिधित्व को शामिल करने का आग्रह किया है।

बार काउंसिल ने आपराधिक क़ानूनों में विभिन्न कमियों की ओर संकेत किया है, जिनमें धीमी जांच से लेकर गली के न्याय का ज़िक्र है जिसकी वजह से पुलिस में लोगों का विश्वास कम हो गया है। पत्र में कहा गया है कि पुलिस का जो वर्तमान मॉडल है वह शीघ्रता से लोगों को निष्पक्ष न्याय नहीं दिला सकता इसलिए व्यापक पुलिस सुधार की ज़रूरत है।

"भारत के क़ानूनी समुदाय में आपराधिक क़ानून के बहुत सारे विशेषज्ञ हैं और उनको व्यापक स्तर पर आपराधिक मामलों से निपटने के अनुभव हैं और वे सरकार को इस व्यवस्था को बेहतर बनाने में समुचित संशोधन का सुझाव दे सकते हैं…।"

अपने व्यापक अनुभव की वजह से बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया और राज्य बार काउंसिल्स के सदस्य एवं अन्य विशेषज्ञ बेहतर राय दे सकते हैं, लेकिन अभी तक इन्हें उच्च अधिकारप्राप्त समिति में शामिल नहीं किया गया है।

बीसीडी ने कहा,

"हमें उम्मीद है कि भारत सरकार उन्हें इस समिति में प्रतिनिधित्व देगी ताकि वे बेहतर व्यवस्था बनाने में योगदान दे सकें।"

निर्भया सामूहिक बलात्कार और हैदराबाद बलात्कार मामले सहित महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों का ज़िक्र करते हुए काउंसिल ने कहा कि पुलिस के व्यवहार पर आम लोगों में असंतोष है।

काउंसिल ने प्रक्रियात्मक क़ानून में भारी संशोधन का सुझाव दिया है, ताकि एक प्रभावी रोकथाम व्यवस्था बनाई जा सके और निष्पक्ष और ईमानदार जांच की जा सके।

काउंसिल ने कहा,

"किसी भी स्तर पर किसी तरह की गलती के परिणाम भयंकर होने चाहिए। यहां तक कि इसके लिए जेल की सज़ा का प्रावधान किया जाना चाहिए।

जांच और आपराधिक मामलों की सुनवाई की हमेशा से आलोचना होती रही है, भले ही वह महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध हो या कोई अन्य अपराध। तथ्य यह है कि बार बार प्रयास के बावजूद एक विश्वसनीय न्याय व्यवस्था क़ायम नहीं की जा सकी है। आपका ध्यान हम न्यायमूर्ति मलिमथ आयोग की रिपोर्ट की ओर खींचना चाहते हैं, जिसमें आपराधिक क़ानून के विभिन्न पक्षों की जांच की गई है और काफ़ी पहले कई सारे सुझाव दिए पर इनपर कोई निर्णय नहीं लिया गया।

अब समय आ गया है जब सरकार को चाहिए कि वह इस व्यवस्था में व्यापक बदलाव करे।"

काउंसिल ने सूचना तकनीक अधिनियम में उपयुक्त संशोधन और हर थाने में साइबरक्राइम प्रकोष्ठ की स्थापना की बात कही है।

काउंसिल ने कहा,

"वेबसाइट्स और अन्य इंटरनेट सेवाप्रदाता बड़ी आसानी से पॉर्नोग्राफी मटेरियल उपलब्ध करा रहे हैं, जिस पर लगाम लगाने और रोकने की ज़रूरत है भले ही वह कोई भी हो। उन्हें कड़ी सजा – न्यूनतम 3 साल की क़ैद और जुर्माने की सजा दी जाए।"

काउंसिल ने कहा कि बेहतर सामाजिक वातावरण पर गंभीर चर्चा की ज़रूरत है ताकि सामाजिक-आर्थिक स्थिति में गिरावट और इंटरनेट के दुरुपयोग को रोका जा सके जो कि महिलाओं और बच्चों के ख़िलाफ़ अपराध का बड़ा कारण है।

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