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एनसीडीआरसी में 11 मार्च के सर्कुलर के आधार पर केंद्र ने जो नियुक्ति की है उसका भाग्य अदालत के फ़ैसले पर निर्भर : बॉम्बे हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
5 April 2020 4:30 AM GMT
एनसीडीआरसी में 11 मार्च के सर्कुलर के आधार पर केंद्र ने जो नियुक्ति की है उसका भाग्य अदालत के फ़ैसले पर निर्भर : बॉम्बे हाईकोर्ट
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बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने केंद्र सरकार के वित्त, विधि और उपभोक्ता मामला मंत्रालयों और महाराष्ट्र सरकार को नए अधिकरण नियम, 2020 को दी गई चुनौती पर नोटिस जारी किया है। इस नियम को पिछले महीने केंद्र सरकार ने अधिसूचित किया और इसमें राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीरसी) में नियुक्ति को लेकर ज़रूरी योग्यता और अर्हता का ज़िक्र है।

सिटिज़न फ़ोरम फ़ॉर इक्वालिटी के अध्यक्ष मधुकर गणपत कुकडे और उपभोक्ता फ़ोरम बार एसोसिएशन, नागपुर के अध्यक्ष वक़ील केएम क़ाज़ी ने यह याचिका दायर की है। इसमें आरोप लगाया गया है कि इसमें जिन प्रक्रियाओं की बात की गई है उससे रोज़र मैथ्यू बनाम साउथ इंडियन बैंक लिमिटेड एवं अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन होता है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में "अधिकरणों के न्यायिक प्रभाव के आकलन" की बात कही थी और यह भी कि नियुक्ति के इस तरीक़े से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर असर होगा।

इस मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वक़ील डॉक्टर तुषार मंडलेकर ने कहा कि यह नियम संवैधानिक सिद्धांतों के प्रति अपमानजनक है जिसका आधार 'शक्तियों का विभाजन' और 'न्यायपालिका की स्वतंत्रता' है।

उन्होंने कहा कि यह नियम यह कहता है कि अधिकरण के सदस्य के पद पर नियुक्ति के लिए वाणिज्य, शिक्षा, अर्थशास्त्र, व्यवसाय, क़ानून प्रशासन आदि के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव होना अनिवार्य किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि अधिकरण में एक महिला सदस्य की आवश्यक नियुक्ति से भी हाथ झाड़ लिया गया है।

जिन बातों पर आपत्ति ज़ाहिर की गई है वे हैं -

i) ये नियम हर अधिकरणों के मूल क़ानून के ख़िलाफ़ है जिनमें सदस्यों की नियुक्ति के लिए विशेष प्रावधान हैं।

ii) इस नियम में 10 से 25 साल की योग्यता रखनेवाले वकीलों को नज़रंदाज़ किया गया है जबकि इतने वर्ष की प्रैक्टिस से वह हाईकोर्ट में नियुक्ति की योग्यता रखता है।

iii) क़ानून के मुताबिक़ इस नियुक्ति के लिए किसी शैक्षिक योग्यता की ज़रूरत नहीं है।

iv) अधिकरण के जजों की रिटायर होने की उम्र 65 साल करना उपभोक्ता संरक्षण क़ानून, 1986 के ख़िलाफ़ है। यह वित्त अधिनियम 2017 के भी ख़िलाफ़ है जिसमें रिटायर होने की उम्र 67 निर्धारित की गई है।

v) 'न्यायिक सदस्य' और 'ग़ैर-न्यायिक सदस्य' को श्रेणीबद्ध नहिं किया गया है और सदस्य की एक परिभाषा बताकर हाईकोर्ट के जजों, ज़िला अदालत के जजों और आम नागरिकों के आवेदनों का 'अनर्गल वर्गीकरण' किया गया है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

vi) जजों के अलावा इसमें नियुक्त के योग्य तीसरी श्रेणी के जो लोग हैं उनको 25 साल का कार्य अनुभव ज़रूरी है पर 'फ़ैसला देने या शैक्षिक योग्यता' की ज़रूरत नहीं है। याचिकाकर्ता ने 11 मार्च 2020 के नियुक्तिवाली सर्कुलर को चुनौती दी है जिसमें एनसीडीआरसी में छह सदस्यों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन पर सवाल उठाया गया है।

नोटिस जारी करते हुए पीठ ने कहा कि इस सर्कुलर के आधार पर अगर कोई नियुक्त हुई है तो उसका भविष्य इस याचिका पर अदालत के निर्णय पर निर्भर करेगा। मामले की अगली सुनवाई अब 21 अप्रैल को होगी।



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