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क्या मृतक के शरीर में जहर नहीं मिलने पर भी उसे दोषी करार दिया जा सकता है? ऐसे केस की कुछ खास बातें

LiveLaw News Network
29 Oct 2019 6:56 AM GMT
क्या मृतक के शरीर में जहर नहीं मिलने पर भी उसे दोषी करार दिया जा सकता है? ऐसे केस की कुछ खास बातें
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मनु सेबेस्टियन

इस आलेख में इस बात पर चर्चा की जा रही है कि जहर देकर मार देने के मामले में सिर्फ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर कैसे दोषी ठहराया जा सकता है। क्या किसी व्यक्ति को जहर देकर मारने के मामले में सिर्फ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर दोषी ठहराया जा सकता है जबकि यह पता नहीं है कि जहर कैसे दिया गया?

केरल पुलिस के इस आरोप के बाद कि उत्तरी केरल के कूदाथायी गांव की जॉली जोसफ नामक एक महिला ने अपने ही परिवार के छः लोगों की 17 साल की अवधि के दौरान जहर देकर हत्या कर दी, कानूनी क्षेत्र में इस मुद्दे पर बहस जारी है। अनंत चिंतामन लागू बनाम बॉम्बे राज्य (1959) नामक मामले में सुप्रीम कोर्ट इस प्रश्न का उत्तर दे चुका है।

आरोपी के व्यवहार के आधार पर सजा

इस मामले में अदालत को यह पता चल गया कि मामला जहर देकर मारने का है पर इसके लिए किस जहर का प्रयोग हुआ इसका पता नहीं चल पाया। इस मामले में आरोपी को सिर्फ उसके पिछले दिनों और बाद के आचरण के आधार पर दोषी ठहराया गया।

इस मामले में 45 साल की एक विधवा पुणे से बॉम्बे जा रही थी और उसे रात को अचेत हो गई और जब ट्रेन 13 नवंबर 1956 को सुबह 5.30 बजे बॉम्बे पहुंची तो उसी डिब्बे में पुणे से आ रहे डॉ. अनंत चिंतामन लागू ने इस महिला को बॉम्बे के जीटी अस्पताल में भर्ती कराया।

लागू ने डॉक्टरों को बताया कि वह इस यात्रा से पहले इस महिला को नहीं जानता था और यात्रा के दौरान हुई बातचीत में उसको पता चला कि महिला का नाम इंदुमती पानुशे है। डॉक्टर ने अस्पताल को अपने पुणे अस्पताल का नंबर भी संपर्क के लिए दिया।

इस महिला की दिन के 11.30 बजे इलाज के दौरान ही मौत हो गई। अस्पताल के डॉक्टरों को यह महिला गरीब लगी, जिसके पास कोई पैसा नहीं था, कोई सोने का गहना नहीं था। उन्होंने डॉ. लागू को टेलीग्राम भेजकर महिला का शव वहां से ले जाने को कहा, लेकिन डॉक्टर की और से कोई जवाब नहीं आया। दो दिन बाद, अस्पताल को डॉक्टर लागू का एक ख़त मिला कि इस महिला का एक भाई कलकत्ता में रह रहा है और वह उसका शव लेने के लिए अस्पताल आएगा।

शव को लेने कोई नहीं आया. फिर इस शव को मेडिकल कॉलेज के छात्रों को अध्ययन और विच्छेदन के लिए दे दिया गया। मेडिकल कॉलेज के एक क्लर्क को इस शव पर एक संदेहास्पद निशान दिखा जिसके बाद इस शव की ऑटोप्सी कराई गई। तब तक इस महिला की मौत को सात दिन हो गए थे। ऑटोप्सी में कुछ भी नहीं मिलने के बाद शव को दफना दिया गया।

इस बीच, पुणे में एक धनाढ्य परिवार अपनी एक रिश्तेदार के अचानक लापता हो जाने पर चिंता में था। एक दिन उनको एक पत्र मिला जिसे कथित रूप से उस महिला ने खुद लिखा था कि वह तीर्थाटन पर चली गई है और यात्रा के दौरान उसकी भेंट किसी जोशी से राठोदी में हुई जिससे अब उसने शादी कर ली है। लक्ष्मीबाई ने उन्हें और पत्र लिखा जिसमें उसने कहा था कि पुणे आने की उसकी कोई मंशा अब नहीं है और किसी को भी उसको ढूँढने की कोशिश करने की जरूरत नहीं है।

रिश्तेदारों को यह सारा वाकया अजीब लगा। वे जानते थे कि इस महिला लक्ष्मीबाई कर्वे को मधुमेह की बीमारी थी और डॉ. अनंत चिंतामन उसका इलाज कर रहे थे। उन्हें इस बात का पता चला कि डॉ. लागू और लक्ष्मी एक ही साथ उस ट्रेन में बॉम्बे जाने के लिए चढ़े क्योंकि उन्हें वहां किसी डॉक्टर से मिलना था।

आगे की जांच के बाद पता चला कि लक्ष्मी कर्वे की काफी संपत्ति और बैंक खाते से पैसे डॉ. लागू को फर्जी दस्तावेज के आधार पर हस्तांतरित कर दिए गए थे और इसका उद्देश्य संपत्ति को हड़पना था।

हत्या का सबूत

निचली अदालत ने डॉक्टर लागू को लक्ष्मी की हत्या का दोषी मानते हुए उसे मौत की सजा सुनाई। हाईकोर्ट ने इस सजा की पुष्टि की और अपील के माध्यम से यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनौती यह थी कि जब जहर देकर मारने को लेकर कोई साक्ष्य नहीं है तो उस व्यक्ति को सजा कैसे दी जाए जिसे दोषी पाया गया है।

कोर्ट के समक्ष डॉक्टर मेहता का गहरा अध्ययन था। उन्होंने लक्ष्मीबाई के ऑटोप्सी रिपोर्ट और उसके मेडिकल रिकॉर्ड का अध्ययन किया था। डॉक्टर मेहता ने स्पष्ट राय व्यक्त की थी लक्ष्मीबाई की मौत मधुमेह की बीमारी के कारण नहीं हुई।

तीन जजों की पीठ में न्यायमूर्ति एम हिदायतुल्लाह और एसके दास ने निम्न बातों पर गौर किया -

जीटीएच अस्पताल में डॉक्टर लागू ने बताया था कि वह लक्ष्मीबाई को नहीं जानता है।

लागू ने इस बात को छिपाया कि वह लक्ष्मी को बहुत दिनों से जानता था।

आरोपी ने अस्पताल में महिला के मूल नाम को छिपा लिया था जबकि वह उसका सही नाम जनता था।

उसने झूठ बोला कि इस महिला का कोई भाई कलकत्ता में है।

उसने लक्ष्मीबाई को अस्पताल में अकेला छोड़ दिया था।

उसने लक्ष्मीबाई को अस्पताल में भर्ती कराने से पहले उसका गहना, पैसा सब ले लिया था।

उसने अस्पताल में डॉक्टरों को पोस्ट मोर्टेम नहीं करने को लेकर अपना प्रभाव डाला था।

इन बातों पर गौर करते हुए अदालत ने कहा,

"अगर लक्ष्मीबाई की इसी स्थिति में मौत हुई तो यह इशारा करता है कि या तो उसकी मौत बीमारी से हुई है या फिर उसकी हत्या हुई है, और इसलिए हमें अपीलकर्ता के आचरण पर गौर करना होगा जिसने उसको अस्पताल पहुंचाया। अपीलकर्ता अगर एक अच्छे डॉक्टर के रूप में लक्ष्मीबाई को अस्पताल तक पहुंचाया, और उसकी मौत बीमारी के कारण हुई तो उसका व्यवहार एकदम ही अलग होता।

अपने घर से जो संपत्ति लेकर लक्ष्मीबाई निकली थी वह अगर उसके पास नहीं होती तो यह डॉक्टर उसे अस्पताल नहीं ले जाता; वह उस महिला की पहचान को छिपाने के लिए उसका गलत नाम नहीं बताता; वह उसकी गलत उम्र और उसकी बीमारी के बारे में गलत नहीं बताता; वह यह नहीं बताया होता कि कलकाता में उसका कोई भाई भी है जो कि गलत था। वह उसके शव को लावारिस स्थिति में अस्पताल के भरोसे छोड़कर नहीं चला जाता; और दुनिया को यह बताने की कोशिश नहीं करता कि वह जीवित है और शादीशुदा है; वह फर्जी दस्तावेजों के बल पर उसके मरने से पहले और उसके बाद संपत्ति हड़पने के लिए इस तरह के हथकंडे नहीं अपनाता; बल्कि वह उसके रिश्तेदारों को इस बारे में बताता और उसके इलाज के लिए हर कुछ करता जो वह कर सकता था और अस्पताल की और से होने वाले किसी भी तरह की जांच के लिए वहाँ मौजूद रहता और पोस्ट मोर्टेम की जांच रिपोर्ट से बचने की कोशिश नहीं करता और गायब नहीं हो जाता।"

ज़हर का पता लगना हमेशा जरूरी नहीं

अदालत ने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि जहर के बारे में हर बार पता लग ही जाए यह संभव नहीं है क्योंकि यह जहर गुप्त रूप से दिया जाता है।

अदालत ने कहा कि विशेषज्ञों की मेडिकल राय और इस मामले की परिस्थिति इस बात का निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त है कि जहर देकर मारा गया है। अगर अदालत यह समझती है कि मौत अस्वाभाविक है तो परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर दोषी ठहराया जा सकता है।

"मेडिकल साक्ष्य और अपीलकर्ता का व्यवहार इस निष्कर्ष की ओर इशारा कर रहा है कि मृतक की मौत किसी अज्ञात जहर या दवा की वजह से हुई जिसका असर जहर की तरह था और अपीलकर्ता वह व्यक्ति है जिसने उसे यह दिया।"

अदालत ने कहा कि जहर देकर मारने के लिए तीन बातों को साबित करना जरूरी है -

मौत का कारण ज़हर है।

आरोपी के पास ज़हर था।

आरोपी के पास मृतक को ज़हर देने का मौक़ा था।

मेडिकल एक्सपर्ट डॉक्टर मेहता की राय है कि उसको ज़हर दिया गया, लेकिन इसका कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है। आरोपी और मृतक का एक साथ यात्रा करने को एक ऐसा मौक़ा माना गया जब जहर दिया जा सकता है।

"अगर परिस्थितिजन्य साक्ष्य प्रत्यक्ष प्रमाण कि अनुपस्थिति में इतना ज्यादा निर्णायक है कि अदालत बेहिचक यह कह सकता है की मौत जहर देने के कारण हुआ (यद्यपि इसका पता नहीं चला) और आरोपी ने ही जहर दिया होगा तो इस स्थिति में इस आधार पर दोषी करार दिया जा सकता है।"

दिलचस्प बात यह है कि न्यायमूर्ति एके सरकार ने इसके खिलाफ राय व्यक्त की और कहा की परिस्थिति से किसी आरोपी के दोष को निर्धारित करना पर्याप्त नहीं है। न्यायमूर्ति सरकार ने माना कि लागू का व्यवहार ऐसा नहीं था जो उसको संदेह से परे रख सके और यह इस ओर इशारा करता है कि उसके दिमाग में बेईमानी भरी थी. पर सरकार के मुताबिक़ उसको दोषी करार देने के लिए यह पर्याप्त नहीं था।

अगर मान लिया जाए कि अपीलकर्ता लक्ष्मीबाई के जीते-जी ही उसकी संपत्ति पर अपनी दांत गड़ाए हुए था, तो क्या यह इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त होगा कि उसकी मौत अस्वाभाविक थी?मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा। यह डिजाइन हत्या का उद्देश्य हो सकता है, पर इससे उसको साबित नहीं किया जा सकता है. यह डिजाइन इस बात की आशंका को खारिज नहीं करता कि लक्ष्मीबाई की मौत स्वाभाविक थी अपीलकर्ता ने इस मौके का पूरा फ़ायदा उठाते हुए अपनी योजना को अंजाम दिया,"

न्यायमूर्ति सरकार ने कहा,

"यह फैसला यह बताता है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर किस तरह सजा दिलाई जा सकती है. जैसा कि फैसले में कहा गया है, हत्या बोल सकता है, और कई बार वह परिस्थितियों की जुबान में बोलता है।"

"गवाह झूठ बोल सकते हैं, परिस्थितियाँ नहीं"

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