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अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम 1956 के तहत मुंबई पुलिस आयुक्त के पास ज़िला मजिस्ट्रेट की शक्तियां : बॉम्बे हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
11 Dec 2019 10:45 AM GMT
अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम 1956 के तहत मुंबई  पुलिस आयुक्त के पास ज़िला मजिस्ट्रेट की शक्तियां : बॉम्बे हाईकोर्ट
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में फैसला सुनाया है कि राज्य सरकार द्वारा 11 अगस्त, 2008 को जारी अधिसूचना को देखते हुए पुलिस आयुक्त के पास अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम 1956 (Immoral Traffic (Prevention) Act 1956) की धारा 18 और 20 के उद्देश्यों के लिए बृहन मुंबई महानगर के भीतर एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट और ज़िला मजिस्ट्रेट के बराबर शक्तियां हैं।

न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थीं, जो रवि यादव और केदार मंडल द्वारा दायर की गई थी, जो जुहू में एक परिसर के मालिक थे। इस परिसर को डिंडोशी के एक सत्र न्यायाधीश ने अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम 1956 की धारा 18 और 20 के तहत सील कर दिया था। उक्त अधिनियम की धारा 18 (1) वेश्यालय को बंद करने और परिसर से अपराधियों को बाहर निकालने के बारे में है।

केस की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता के वकील प्रभंजय दवे ने तर्क दिया कि धारा 18 (1) (2) के तहत अधिकार पुलिस यानि पुलिस आयुक्त के पास निहित है, न्यायालय के पास नहीं। उन्होंने पुलिस आयुक्त द्वारा उक्त अधिनियम की धारा 18 (1) के तहत जारी किए गए दो कारण बताओ नोटिस का हवाला भी दिया।

अतिरिक्त लोक अभियोजक वीरा शिंदे ने गृह विभाग द्वारा जारी 11 अगस्त 2006 की अधिसूचना की एक प्रति पेश की, जिसमें यह विशेष रूप से कहा गया था कि बृहन मुम्बई का पुलिस आयुक्त, बृहन मुम्बई के महानगरीय क्षेत्र का कार्यकारी मजिस्ट्रेट और बृहन मुम्बई के महानगरीय क्षेत्र का अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट होगा।

वहीं बृहन्न मुंबई के महानगरीय क्षेत्र में पीआईटीए की धारा 18 व 20 के संबंध जिला मजिस्ट्रेट की शक्तियों को पुलिस के आयुक्त को प्रदान किया जाता है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने जुहू इलाके में एक रवि मंडल को पट्टे और लाइसेंस के आधार पर अपना बंगला दिया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि उक्त परिसर में वेश्यावृत्ति की गतिविधियां चल रही हैं। छापेमारी की गई और आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया। याचिकाकर्ता उस मामले में आरोपी नहीं हैं जो जुहू पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता की धारा 370 (3) साथ में धारा 34 के तहत और पीआईटीए की धारा 3, 4, 5, 7 (1) (बी) के तहत दंडनीय अपराध का आरोप लगाते हुए दर्ज किया गया था।

मुकदमे की पेंडेंसी के दौरान अभियोजन पक्ष ने एक आवेदन दायर किया जिसमें कहा गया कि उक्त परिसर को बंद कर दिया जाए, जहां छापा मारा गया था। उक्त आवेदन में आगे कहा गया था कि उक्त परिसर एक सार्वजनिक स्थान से 200 मीटर की दूरी पर है और इसलिए, इसे बंद कर दिया जाना चाहिए।

निर्णय

11 अगस्त, 2006 की अधिसूचना को देखने के बाद , न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि यह अधिसूचना सुप्रीम कोर्ट द्वारा 4 जुलाई 2006 को 'ए.एन रॉय, पुलिस आयुक्त और अन्य बनाम सुरेश श्याम सिंह' मामले में दिए गए फैसले के अनुपालन में जारी की गई थी।

न्यायमूर्ति डेरे ने कहा कि-

''दिनांक 11.08.2006 की अधिसूचना के मद्देनजर, यह स्पष्ट है कि वह पुलिस आयुक्त है जो पीआईटीए की धारा 18 के तहत एक आदेश पारित कर सकता है और सत्र न्यायाधीश पीआईटीए की धारा 18 (1) के तहत परिसर को सील करने के लिए सक्षम नहीं था। अभियोजन पक्ष द्वारा दायर किया गया आवेदन स्वंय 11 अगस्त 2006 की अधिसूचना के संबंध में गलत था।''

डिंडोशी कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश को पलटते हुए न्यायमूर्ति डेरे ने पुलिस आयुक्त को निर्देश दिया है कि वह 11 अगस्त, 2006 को गृह विभाग, मंत्रालय, मुंबई द्वारा जारी अधिसूचना को फिर से सर्कुलेट करे ताकि सभी पुलिस को उसके बारें में सूचित किया जा सके।


आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहांं क्लिक करेंं



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