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मां को बच्चे और करियर के बीच चयन करने के लिए नहीं कहा जा सकताः बॉम्बे हाईकोर्ट ने महिला को बेटी के साथ विदेश जाने की अनुमति दी

Manisha Khatri
13 July 2022 3:30 PM GMT
बॉम्बे हाईकोर्ट, मुंबई
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बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह कहते हुए कि एक महिला को अपने करियर और बच्चे के बीच चयन करने के लिए नहीं कहा जा सकता है,उसके पति को निर्देश दिया है कि वह बेटी के साथ महिला को पोलैंड की यात्रा करने के लिए अपनी अनापत्ति दे दे।

जस्टिस भारती डांगरे ने कहा कि महिला को अपना विकास करने का अधिकार है और पुणे फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पत्नी को अपनी बेटी के साथ क्राको,पोलैंड में दो साल रहने के लिए जाने की अनुमति नहीं दी थी।

''... आक्षेपित आदेश विकास के अधिकार के महत्वपूर्ण पहलू पर विचार करने में विफल रहा है, जो याचिकाकर्ता में निहित है,इसलिए उसे अपने बच्चे और उसके करियर के बीच चयन करने के लिए नहीं कहा जा सकता है, ऐसे में आक्षेपित आदेश रद्द किया जाता है।''

न्यायाधीश ने कहा, ''मुझे नहीं लगता कि अदालत उस मां को नौकरी की संभावनाओं से इंकार कर सकती है, जो नौकरी लेने की इच्छुक है और उसे इस अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता है।''

अदालत ने, हालांकि, महिला को तीनों छुट्टियों के दौरान अपनी बेटी के साथ भारत आने का निर्देश दिया है,ताकि वर्चुअल पहुंच के अलावा पिता उससे फिजिकल तौर पर भी मिल पाए।

मामले के तथ्य

याचिकाकर्ता, जो अपने पति (प्रतिवादी) को तलाक देना चाहती है, ने पुणे के फैमिली कोर्ट में अपनी नाबालिग बेटी की कस्टडी अकेले उसे देने की मांग की थी। कस्टडी के लिए दायर अपनी याचिका में, याचिकाकर्ता ने एक अन्य आवेदन दायर कर अपनी बेटी के साथ पोलैंड की यात्रा करने और वहां शिफ्ट होने की अनुमति मांगी थी। याचिकाकर्ता के पति ने एक अर्जी दाखिल कर उसे अपनी बेटी को पोलैंड ले जाने से रोकने के लिए एक निरोध आदेश जारी करने की मांग की थी।

फैमिली कोर्ट ने पति को आंशिक राहत दी और पत्नी को अपनी बेटी को भारत से बाहर ले जाने से रोक दिया। इसके अलावा, कोर्ट ने पत्नी को अपने पति की सहमति के बिना बेटी के स्कूल को बदलने से भी रोक दिया। याचिकाकर्ता ने इस आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

एडवोकेट अभिजीत सरवटे ने पत्नी की ओर से तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट पोलैंड में नौकरी लेने के लिए याचिकाकर्ता के लिए उपलब्ध संभावनाओं को ध्यान में रखने में विफल रही है, जिससे वह अपने करियर में आगे बढ़ेगी। उन्होंने प्रस्तुत किया कि उनकी मुवक्किल केवल एक सीमित अवधि के लिए पोलैंड जा रही है और उसने पिता तक बच्ची की पहुंच बनाए रखने का आश्वासन दिया है। उन्होंने आगे कहा कि पत्नी ने अकेले ही बच्चे को पाला है और पति जिम्मेदारी लेने में विफल रहा है। सरवटे ने कहा, ''विकास का अधिकार एक बुनियादी मानव अधिकार है, जिसे इस देश के सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा मान्यता प्राप्त है और इसलिए याचिकाकर्ता को यह अधिकार देने से इनकार नहीं किया जा सकता है।''

एडवोकेट मयूर खांडेपारकर पति के लिए पेश हुए और तर्क दिया कि पत्नी ने बच्चे को उससे और उसके परिवार से अलग करने के लिए पहले भी कई प्रयास किए थे और उसका इरादा पिता और बेटी के बीच संबंधों को तोड़ना है। इसके अलावा, उन्होंने तर्क दिया कि यूरोप में वर्तमान युद्ध जैसी स्थिति बेटी के लिए पोलैंड जाने के लिए उपयुक्त नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि बेटी को भाषा की बाधा और अत्यधिक जलवायु का सामना करना पड़ेगा जिसके परिणामस्वरूप अवसाद और अकेलापन हो सकता है।

जस्टिस भारती डांगरे ने पति और पत्नी दोनों की चिंताओं पर ध्यान से विचार किया और विक्रम वीर वोहरा बनाम शालिनी भल्ला मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले पर भरोसा करते हुए कहा कि दोनों पक्षों के हितों के बीच संतुलन बनाना होगा और बच्चे के कल्याण पर सर्वाेपरि विचार करना होगा। अदालत ने कहा कि वह पत्नी को अपने करियर को आगे बढ़ाने के अवसर से वंचित नहीं कर सकती। मां को अलग करने का विकल्प भी व्यवहार्य नहीं है क्योंकि बेटी हमेशा अपनी मां के साथ रही है। कोर्ट ने कहा कि बच्ची अभी छोटी है और नए माहौल को अपना सकती है, इसलिए वह उखड़ी हुई महसूस नहीं करेगी। इसके अलावा, रहने की अवधि दो साल तक सीमित है, जो कि बहुत लंबी अवधि नहीं है और यह नहीं कहा जा सकता है कि बच्ची अपने पिता और अपने देश से अलग हो जाएगी।

कोर्ट ने ऋतिका शरण बनाम सुजॉय घोष के सुप्रीम कोर्ट के मामले पर भरोसा किया, जिसमें इसी तरह के तथ्यों पर विचार किया गया था और पार्टियों ने अदालत में ही बच्चे से मुलाकात करने की व्यवस्था कर ली थी। उसी तर्ज पर, वर्तमान मामले में अदालत ने यह फैसला दिया कि पिता के लिए बेटी के पोलैंड में रहने के दौरान उस तक अपनी पहुंच बनाए रखने की व्यवस्था की जाए। पत्नी ने हलफनामा प्रस्तुत किया था, जिसमें कहा गया था कि पिता की बेटी तक वर्चुअल और शारीरिक पहुंच होगी। अदालत ने पिता को मिली शारीरिक या फिजिकल पहुंच को संशोधित किया और ओवरनाइट पहुंच के प्रावधान को भी जोड़ दिया। अदालत ने यह भी कहा कि स्कूल की तीन छुट्टियों के दौरान बच्चे को भारत लाने का खर्च पत्नी को वहन करना होगा।

अदालत ने पिता को बेटी की शिक्षा के लिए अपना वर्तमान योगदान जारी रखने और वीजा आवेदन, या किसी अन्य दस्तावेज, जिसमें उसके हस्ताक्षर की आवश्यकता होती है, पर कोई आपत्ति नहीं देने का निर्देश दिया है।

फैमिली कोर्ट के आक्षेपित आदेश को इस आधार पर रद्द किया जा रहा है कि यह याचिकाकर्ता के विकास के अधिकार के महत्वपूर्ण पहलू पर विचार करने में विफल रहा है क्योंकि उसे बच्चे और करियर के बीच चयन करने के लिए नहीं कहा जा सकता है।

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