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न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी अभियुक्त को उसकी सहमति के बिना भी जांच के लिए उसकी आवाज के नमूने देने का आदेश दे सकता है : SC

LiveLaw News Network
7 Aug 2019 1:46 AM GMT
न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी अभियुक्त को उसकी सहमति के बिना भी जांच के लिए उसकी आवाज के नमूने देने का आदेश दे सकता है : SC
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एक महत्वपूर्ण फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि एक न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी अभियुक्त को उसकी सहमति के बिना भी जांच के लिए उसकी आवाज के नमूने प्रदान करने का निर्देश दे सकता है। CJI की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने शुक्रवार को उस भ्रम की स्थिति को सुलझा दिया जो 2012 के यूपी के रितेश सिन्हा बनाम राज्य में दो जजों की बेंच द्वारा दिए गए अलग- अलग फैसले से उत्पन्न हुई थी।

CJI के नेतृत्व वाली पीठ ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता में विशिष्ट शक्तियों की अनुपस्थिति में संविधान की धारा 142 के तहत निहित शक्तियों का आह्रान कर मजिस्ट्रेट को ऐसी शक्ति प्रदान की जानी चाहिए।

रितेश सिन्हा मामले में इस बिंदु पर फैसले में दो जजों के बीच मतभेद था कि क्या मजिस्ट्रेट में आरोपियों को आवाज के नमूने देने के निर्देश देने की शक्तियां निहित हैं। न्यायमूर्ति आरपी देसाई ने कहा था कि मजिस्ट्रेट के पास सीआरपीसी की धारा 53 के अनुसार सहायक या अंतर्निहित शक्ति है जो आवाज के नमूने देने के आदेश के लिए आइडेंटिफिकेशन ऑफ प्रिजनर्स एक्ट, 1920 की धारा 5 के साथ पढ़ी जाती है। हालांकि न्यायमूर्ति आफताब आलम ने इस बिंदु पर असहमति व्यक्त की और कहा कि ऐसी कोई सहायक या अंतर्निहित शक्ति नहीं है। फैसले में मतभेद को देखते हुए मामले को बड़ी बेंच के पास भेजा गया था जिसका जवाब अब दिया गया है।

गौरतलब है कि सीआरपीसी की धारा 53 एक पंजीकृत चिकित्सक द्वारा आरोपी की चिकित्सा जांच का आदेश देने की शक्ति देती है जिसमें शारीरिक तरल पदार्थ, बालों के नमूने, नाखून की कतरन आदि की पहचान शामिल है जबकि आइडेंटिफिकेशन ऑफ प्रिजनर्स एक्ट, 1920 की धारा 5 हिरासत में व्यक्तियों की तस्वीरें और माप लेने से संबंधित है। इन प्रावधानों में से कोई भी आवाज के नमूनों का स्पष्ट संदर्भ नहीं देता है।

उच्च न्यायालयों द्वारा अलग-अलग विचार

बॉम्बे हाई कोर्ट ने CBI, नई दिल्ली बनाम अब्दुल करीम तेलगी (Crl WP No.157 / 04 में फैसला) में कहा है कि 1920 अधिनियम की धारा 5 से आवाज के नमूने लिए जा सकते हैं। राकेश बिष्ट बनाम सीबीआई में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि आवाज के नमूने केवल तभी दिए जा सकते हैं जब कार्यवाही अदालत में लंबित हो, न कि जाँच के प्रयोजनों के लिए। गुजरात उच्च न्यायालय ने माना कि अभियुक्तों को वॉयस स्पेक्ट्रोग्राफी परीक्षण के अधीन नहीं किया जा सकता। केरल उच्च न्यायालय ने भी माना कि जांच के उद्देश्यों के लिए वॉयस सैंपल देने के लिए अभियुक्त को निर्देश देने के लिए विधानमंडल द्वारा प्रदत्त कोई व्यक्त या निहित शक्ति नहीं है।हालांकि मद्रास उच्च न्यायालय ने दो निर्णयों में धारा 53, 53 ए और सीआरपीसी के 311 ए के आधार पर वॉयस सैंपल देने के निर्देश को मंजूरी दे दी।


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