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दिल्ली हाईकोर्ट ने आर्म एक्ट में दर्ज हुई एफआईआर रद्द की कहा, आरोपी को अपने पास कारतूस होने की जानकारी नहीं थी

LiveLaw News Network
31 Jan 2020 3:45 AM GMT
दिल्ली हाईकोर्ट ने आर्म एक्ट में दर्ज हुई एफआईआर रद्द की कहा, आरोपी को अपने पास कारतूस होने की जानकारी नहीं थी
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दिल्ली हाईकोर्ट ने माना है कि अगर एफआईआर में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो यह दर्शाता है कि फायरआर्म कब्जे में होने की जानकारी थी, तो शस्त्र अधिनियम की धारा 25 के तहत कोई मामला आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

जस्टिस अनु मल्होत्रा की सिंगल बेंच ने याचिकाकर्ता के खिलाफ एफआईआर को खारिज करते हुए कहा कि शस्त्र अधिनियम के तहत फायर आर्म कब्जे में होने के अपराध के लिए आरोपी व्यक्ति में आर्म रखने की जानकारी का तत्व होना चाहिए, परंतु जब कोई वास्तविक कब्जा न हो तो उसका हथियार पर आधिपत्य या नियंत्रण हो।

याचिकाकर्ता के खिलाफ आर्म एक्ट की धारा 25 के तहत शिकायत दर्ज की गई थी, क्योंकि उसके हैंडबैग में उस समय तीन कारतूस पाए गए थे, जब आईजीआई एयरपोर्ट पर नियमित प्रक्रिया के तहत उसकी तलाशी ली जा रही थी।

याचिकाकर्ता कारतूस के कब्जे में होने के बावजूद, इस तरह के कब्जे को वैध साबित करने के लिए लाइसेंस पेश नहीं कर पाई थी। हालांकि, उसने बताया किया कि उसे इस तरह की वस्तु का उसके बैग में होने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

उसने यह भी कहा कि उक्त यात्रा में उसके पति भी उसके साथ थे, जिसके पास वैध हथियार लाइसेंस था और उसके पति द्वारा एसएचओ, आईजीआई एयरपोर्ट को एक लिखित बयान भी दिया गया था।

यह भी कहा गया कि उसके पति और ससुर दोनों के पास पंजाब के शस्त्र लाइसेंस हैं। इसके अलावा, 16.08.2015 को, जब वह अपने पति के साथ भोपाल से अमृतसर लौट रही थी, ट्रांजिट फ्लाइट में सवार होने के समय, जीएमआर सिक्योरिटी के श्री प्रकाश चैहान ने उसका सामान चेक किया और एक बैग में उसके पास तीन कारतूस पाए गए, जिसका उसे कोई ज्ञान नहीं था।

उसने आगे दावा किया कि उसके पति को भी इन कारतूसों के बारे में जानकारी नहीं थी, जो अनजाने में उनको भोपाल ले गए थे।

अदालत ने अपने आदेश में याचिकाकर्ता के दावों को स्वीकार किया और माना कि-

" जहां याचिकाकर्ता को उसके सामान में तीन जिंदा कारतूसों की मौजूदगी के बारे में पता नहीं था और उसे तब तक इसकी कोई जानकारी नहीं थी, जब तक कि सुरक्षा जांच में सामान की स्क्रीनिंग के दौरान सुरक्षाकर्मियों द्वारा इसका पता नहीं लगा लिया गया था। यह सुरक्षित रूप से अनुमान लगाया जा सकता है कि उक्त कब्जा सचेत कब्जे के दायरे में नहीं आता है।'

यह भी ध्यान दिया जाता है कि याचिकाकर्ता के पास से कोई बन्दूक या हथियार बरामद नहीं हुआ था और न ही उसने पुलिस अधिकारी के किसी व्यक्ति के लिए कोई खतरा बढ़ाया था और मामले की परिस्थितियों से यह भी स्पष्ट है कि उसके खिलाफ कार्रवाई जारी रखने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा।"

एफआईआर को खारिज करते हुए अदालत ने उल्लेख किया कि एफआईआर या आरोप पत्र में ऐसा कोई संकेत नहीं है, जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि याचिकाकर्ता को उसके कब्जे में कारतूस होने की कथित जानकारी थी।

आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें




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