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मुख्यमंत्री के कहने पर बीबीएमपी के कर्मचारी के ट्रांसफ़र की कर्नाटक हाईकोर्ट ने की आलोचना, आदेश निरस्त किया

LiveLaw News Network
27 Dec 2019 3:45 AM GMT
मुख्यमंत्री के कहने पर बीबीएमपी के कर्मचारी के ट्रांसफ़र की कर्नाटक हाईकोर्ट ने की आलोचना,  आदेश निरस्त किया
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कर्नाटक हाईकोर्ट ने बृहत् बेंगलुरु महानगर पालिके (बीबीएमपी) के एक ट्रांसफ़र आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि आयुक्त ने एक बाहरी अथॉरिटी के निर्देश पर काम किया जिसे प्रशासनिक क़ानून के पहले सिद्धांत में नहीं मानने को कहा गया है। बीबीएमपी के आयुक्त ने मुख्यमंत्री से निर्देश मिलने पर एक कार्यपालक अभियंता का समय से पहले ही ट्रांसफ़र कर दिया।

न्यायमूर्ति कृष्णा दीक्षित ने केएम वासु की इस बारे में याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया। वासु को बीबीएमपी में मार्च 2020 तक का डेप्युटेशन मिला था पर 24 अक्टूबर 2019 को जारी एक आदेश के तहत उसका ट्रांसफ़र कर दिया गया और तीसरे प्रतिवादी को उनकी जगह नियुक्ति कर दी गई। इसके बाद 6 अक्टूबर को एक पत्र जारी हुआ जिसे एक केंद्रीय मंत्री ने मुख्यमंत्री को लिखा था और मुख्यमंत्री ने उसी पत्र पर 17.10.2019 को अपनी सम्मति दे दी थी जिसमें तीसरे प्रतिवादी को इस पर नियुक्ति का आदेश दिया गया था।

ट्रांसफ़र के इस आदेश को निरस्त करते हुए अदालत ने कहा,

"हालाँकि, यह इस मामले से संबंधित सभी व्यक्तियों की आलोचना का उचित मामला है और इसके लिए उन पर उपयुक्त जुर्माना भी लगाया जा सकता है, पर यह अदालत काफ़ी अनिच्छा से ख़ुद पर रोक लगाते हुए यह नहीं कर रहा है ताकि आगे इस तरह के ग़ैरक़ानूनी ट्रांसफ़र नहीं किए जाएं।"

अदालत ने कहा, "बीबीएमपी के आयुक्त को तर्क और न्याय के नियमों के अनुसार अपने क़ानूनी विवेक का प्रयोग करना चाहिए था न कि किसी बड़े और शक्तिशाली अधिकारी के कहने पर…।"

अदालत ने स्पष्ट किया, क़ानूनी रूप से ग़लत क़दम उठाकर मामले को बिगाड़ा गया है, तथ्यात्मक ग़लती को सुधारा नहीं गया क्योंकि ये मंत्रीगण अदालत के समक्ष पेश नहीं हुए क्योंकि उन्हें छूट मिली हुई है।"

अदालत ने बीबीएमपी की दलील को ख़ारिज करते हुए कहा,

"बीबीएमपी के वरिष्ठ वक़ील का यह कहना कि याचिकाकर्ता को अब 02.11.2019 को जारी एक आदेश के अनुसार नियुक्ति दे दी गई है, यह एक पीड़ित कर्मचारी को बेकार सांत्वना है; यह नियुक्ति इस आदेश के बाद इस मामले में याचिकाकर्ता की स्थिति को कमज़ोर करने के लिए किया गया है; बाद में जो नियुक्ति हुई है वह इस आदेश की कमी का क़ानूनी उपचार नहीं है, यहां भी इस बात का कोई ज़िक्र नहीं है कि अगर इस ट्रांसफ़र आदेश पर अमल नहीं हुआ तो तीसरे प्रतिवादी को कितनी मुश्किल उठानी पड़ सकती ह; इसलिए इस बारे में सफ़ाई देने का यह आधार भी विफल रहा।"




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