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दिल्ली विश्वविद्यालय के अनुदेशकों को 'शिक्षकों' की सेवा निवृत्ति की उम्र में वृद्धि का लाभ नहीं मिल सकता : दिल्ली हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
13 Feb 2020 4:15 AM GMT
दिल्ली विश्वविद्यालय के अनुदेशकों को

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में जिन लोगों की नियुक्ति 'Instructor'(अनुदेशक) के रूप में हुई है, उन्हें सेवा निवृत्ति के लाभ कि लिए शिक्षक नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति विपिन सांघी और न्यायमूर्ति संजीव नरूला की पीठ ने कहा कि सेवा निवृत्ति की अवधि को बढ़ाने से बजट की ज़रूरतों को पूरा करने का काम सरकार का है और सरकार ने जो सुझाव दिए हैं उन्हीं के अनुरूप 'शिक्षक' के अर्थ पर अदालत ग़ौर करेगी।

अदालत का यह आदेश एकल जज के फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर अपील पर आया है, जिसमें शिक्षकों की श्रेणी में रखे जाने की अपील अदालत ने ठुकरा दी थी।

इस आदेश को दिए अपनी चुनौती में अपीलकर्ताओं ने दिल्ली विश्वविद्यालय अधिनियम, 1922 पर भरोसा किया जिसमें 'शिक्षक' को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि -

"शिक्षकों में प्रोफ़ेसर, रीडर, लेक्चरर्स और अन्य ऐसे व्यक्ति आते हैं जो विश्वविद्यालय में या कॉलेज या हॉल में आदेश देते हैं।"

इसलिए यह दलील दी गई कि शिक्षकों की सेवानिवृत्ति की आयु को बढ़ाने के बारे में सरकार जो सूचना भेजती है, उसमें दिल्ली विश्वविद्यालय अधिनियम की धारा 2(g) में 'शिक्षक' की जो परिभाषा दी गई है उसको माना जाए।

अपीलकर्ताओं, जिन्हें 'अनुदेशक' के रूप में नौकरी दी गई थी, चाहते थे कि भारत सरकार के मानव संसाधन विकास विभाग ने जो शिक्षकों की सेवा निवृत्ति की आयु को 62 से 65 कर दिया है उसका लाभ उन्हें भी दिया जाए।

फिर, अपीलकर्ताओं ने इस बात पर भी भरोसा जताया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 15/02/2019 को जो नोटिस जारी किया, उसमें कहा कि स्टेनोग्राफ़ी और टाइपराइटिंग में अनुदेशकों के पद को अकादमिक स्टाफ़ के तहत माना जाए क्योंकि वे शिक्षण के असाइनमेंट और अकादमिक कार्यों को अंजाम देते हैं।

केंद्र सरकार ने इस पर कहा है कि आयु बढ़ाने का उसका निर्णय सभी "शिक्षकों" पर लागू नहीं होता जैसा की आम तौर पर समझा जा रहा है। इस तरह स्टेनोग्राफ़ी के "अनुदेशक" सेवा निवृत्ति की आयु में बढ़ोतरी का फ़ायदा नहीं उठा सकते भले ही दिल्ली विश्वविद्यालय के अधिनियम में उन्हें "शिक्षक" क्यों न माना गया है।

सरकार ने इस बारे में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने यूजीसी को 19/04/2007 को जो पत्र भेजा था, उसका भी हवाला दिया। इसमें स्पष्ट किया गया है कि सेवा निवृत्ति की आयु में वृद्धि सिर्फ़ केंद्र से अनुदान पाने वाले उच्च्तर और तकनीकी शिक्षा संस्थान में काम करने वाले शिक्षकों पर ही लागू होगा, जहां पर अध्ययन के लिए क्लास, कोर्स/प्रोग्राम चलाए जाते हैं ।

इस बारे में 31/12/2008 को लिखे गए एक दूसरे पत्र का भी हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया कि जहां तक शिक्षकों के वेतनमान की बात है तो उसमें "शिक्षक" की श्रेणी में विश्वविद्यालय और कॉलेज के सिर्फ़ तीन पद – सहायक प्राध्यापक, एसोसियट प्रोफ़ेसर और प्रोफ़ेसर ही आएंगे।

अदालत ने इन दलीलों पर ग़ौर किया और कहा कि सिर्फ़ शिक्षकों की सेवानिवृत्ति की उम्र बधाई गई है, जो क्लास में ऐसे विषय पढ़ाते हैं जिनमें विश्वविद्यालय स्नातक और स्नातकोत्तर की डिग्री देता है।

इसलिए, अपने सूचना में केंद्र सरकार ने जिस "शिक्षक" की बात की है उनकी सेवा निवृत्ति की उम्र को बढ़ाकर 65 कर दिया गया है और यह 'शिक्षक" दिल्ली विश्वविद्यालय अधिनियम में इसकी जो परिभाषा दी गई है वह नहीं है।

इन बातों के आलोक में अदालत ने एकल जज के इस इस फ़ैसले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया और अपील को ख़ारिज कर दिया।

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