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पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का वैवाहिक मामलों में आय और संपत्ति के शपथपत्र पर ज़ोर, भरण पोषण के मामलों में अनावश्यक बोझ न बढ़े

LiveLaw News Network
12 Jan 2020 11:30 AM GMT
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का वैवाहिक मामलों में आय और संपत्ति के शपथपत्र पर ज़ोर, भरण पोषण के मामलों में अनावश्यक बोझ न बढ़े

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य के सभी फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि वे सभी वैवाहिक मामलों में संपत्ति, आय और व्यय के शपथ पत्र पर जोर दें, ताकि भरण पोषण की मांग करने की इच्छुक पत्नियों को अनावश्यक बोझ से बचाया जा सके।

जस्टिस गुरविंदर सिंह गिल ने कहा कि-

''सर्वोत्तम प्रथाओं का हमेशा पालन किया जाना चाहिए विशेष रूप से यदि यह प्रथाएं आगे के समय में कुशल और प्रभावी न्याय वितरण के लिए हों। इस तरह के (आय) हलफनामों को दायर करने से ऐसे मामलों में ''लुका-छुपी'' के खेल खेलने की प्रथा की जांच होगी जहां एक पक्ष द्वारा प्रयास किया जाता है और आय को छुपाने का और सारे संसाधनों की जानकारी नहीं दी जाती है, जिस कारण दूसरे पक्ष को संसाधनों की सूचना एकत्रित करने के लिए बहुत प्रयास करने पड़ते हैं।''

यह निर्देश जारी करने से पहले , न्यायमूर्ति गिल ने यह कहा कि असहाय पत्नियों के भरणपोषण का आकलन करने के लिए आवश्यक जानकारी से वंचित किया जा रहा है। उन्हें अपने जीवनसाथी या पति की वित्तीय स्थिति के दस्तावेज और सबूत एकत्रित करने पड़ते हैं।

जस्टिस गिल ने कहा कि-

''वास्तव में, रखरखाव से संबंधित मामलों के निपटान में बहुत विलंब होता है। बड़ी संख्या में मामलों में यह देखा जाता है कि देरी तब होती है जब असहाय पत्नी को उचित रख-रखाव पाने के लिए कहा जाता है कि वह खुद अपने पति की आय या उसकी वित्तीय स्थिति से संबंधित दस्तावेजों और सबूतों को इकट्ठा करे।''

निर्णय स्पष्ट रूप से बताता है कि आय संबंधी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश उन लंबित मामलों में भी जारी किया जा सकता है, जिनमें पक्षकार उचित जानकारी उपलब्ध नहीं करवा रहे हैं। हालांकि, यह निर्देश उन पक्षकारों पर लागू नहीं होगी जो समाज के सबसे निचले स्तर से संबंधित हैं और जिनके पास प्रारूप के रूप में विस्तृत स्रोतों की जानकारी नहीं है।

जस्टिस गिल ने निर्देश दिए कि-

''असाधारण या विशेष मामलों में, अदालत विशेष रूप से उन मामलों में हलफनामा प्रस्तुत करने की पूर्व आवश्यकता को छोड़ सकती है, जहां पक्षकार समाज के सबसे निचले तबके से संबंधित हैं और जिनके पास प्रारूप के रूप में विस्तृत स्रोतों की जानकारी न होने की संभावना है। साथ ही अदालत को यह लगे कि इस तरह के हलफनामे को प्रस्तुत करने का पक्षकार को निर्देश देने से पक्षकार को अनावश्यक असुविधा होगी और इससे कोई फलदायी उद्देश्य पूरा होने की संभावना भी नहीं है।''

हालांकि, इस तरह की छूट के दुरुपयोग को विफल करने के लिए, हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि महत्वपूर्ण जानकारी को छुपाने या अदालत को गुमराह करने का कोई भी जानबूझकर किया गया प्रयास, न केवल दंडात्मक कार्रवाई को आमंत्रित करेगा, बल्कि अदालत को इस बात की पूरी छूट होगी कि वह इसके लिए जिम्मेदार पक्षकार के लिए खिलाफ ''प्रतिकूल प्रभाव'' निकाल सकती है।

विशेष रूप से, दिल्ली हाईकोर्ट पहले से ही वैवाहिक मामलों में आय के हलफनामों दायर करने के लिए कह रहा है और इस तरह के हलफनामे दाखिल करने के संबंध में निर्देश ''कुसुम शर्मा बनाम नरिंदर कुमार शर्मा, 2011 (30) आरसीआर (सिविल)'' में जारी किए गए थे। हालांकि, इन दिशा-निर्देशों को समय-समय पर ट्रायल कोर्ट सहित विभिन्न तिमाहियों से प्राप्त प्रतिक्रियाओं और सुझावों के अनुसार संशोधित किया गया है। नवीनतम निर्देश 6 दिसंबर, 2017 को कुसुम शर्मा बनाम महिंदर कुमार शर्मा, 2018 (246) डीएलटी 1 में जारी किए गए थे।

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने माना है कि अदालतें आमतौर पर इन निर्देशों का पालन करेंगी, हालांकि अगर उनको जरूरी लगता है तो मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार वे प्रारूप और निर्देशों को संशोधित करने के लिए स्वतंत्रत हैं।

उपर्युक्त दिशानिर्देशों के अलावा हाईकोर्ट ने आगे यह भी कहा कि भरण पोषण देने के मामले में अगर न्यायिक निर्णय तक पहुंचने के लिए इस तरह की जानकारी आवश्यक हो तो फैमिली कोर्ट किसी भी पक्ष को कार्यवाही के किसी भी चरण में निर्देश जारी करने के लिए सक्षम होगी।

इसके अलावा, अगर यह पाया जाए कि किसी भी पक्ष के संसाधनों के संबंध में अपेक्षित जानकारी सामने नहीं आ रही है तो कोर्ट किसी भी पक्षकार के जीवन स्तर व सामाजिक स्थिति का आकलन करने के लिए उसके निवास स्थान या व्यवसाय के स्थान पर जाने के लिए स्थानीय आयुक्त की नियुक्ति पर भी विचार कर सकती हैं।

इन दिशा-निर्देशों का पालन सभी वैवाहिक मामलों में किया जाएगा, जिनमें हिंदू विवाह अधिनियम, 1955(Hindu Marriage Act, 1955) के तहत मामले, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005(Protection of Women From Domestic Violence Act, 2005), सीआरपीसी की धारा 125(Section 125 Cr.P.C), हिंदू दत्तक और रखरखाव अधिनियम, 1956(Hindu Adoption and Maintenance Act, 1956), विशेष विवाह अधिनियम, 1954(Special Marriage Act, 1954), भारतीय तलाक अधिनियम, 1869(Indian Divorce Act, 1869), संरक्षक और वार्ड अधिनियम, 1890 (Guardians and Wards Act, 1890) और हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956(Hindu Minority and Guardianship Act, 1956) शामिल हैं।

मामले का विवरण-

केस का शीर्षक- जसप्रीत सिंह बनाम गुरलीन कौर

केस नंबर- सीआरएम-एम 36522/2019 (क्यू एंड एम)

कोरम- न्यायमूर्ति गुरविंदर सिंह गिल

प्रतिनिधित्व- वकील नवीन बावा (याचिकाकर्ता के लिए), वकील

जयदीप वर्मा (प्रतिवादी के लिए)


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