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'भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश, एक धार्मिक समूह अन्य समुदायों के धार्मिक जुलूसों, समारोहों को आयोजित करने के मौलिक अधिकार का विरोध नहीं कर सकता': मद्रास हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
10 May 2021 3:18 AM GMT
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश, एक धार्मिक समूह अन्य समुदायों के धार्मिक जुलूसों, समारोहों को आयोजित करने के मौलिक अधिकार का विरोध नहीं कर सकता: मद्रास हाईकोर्ट
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मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि, "अगर धार्मिक असहिष्णुता की अनुमति दी जा रही है तो यह एक धर्मनिरपेक्ष देश के लिए अच्छा नहीं है। किसी भी धार्मिक समूह पर किसी भी रूप में असहिष्णुता फैलाने पर रोक लगाई जानी चाहिए।"

न्यायमूर्ति एन. किरुबाकरण और न्यायमूर्ति पी. वेलुमुरुगन की खंडपीठ कुछ हिंदू त्यौहारों / धार्मिक जुलूसों के आयोजन पर हिंदू और मुस्लिम (गांव में) के बीच एक लंबे समय से चल रहे विवाद पर सनुवाई कर रही थी।

कोर्ट ने कहा कि,

"भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और केवल इसलिए कि एक धार्मिक समूह एक विशेष क्षेत्र में बहुमत में रहता है, यह उस क्षेत्र के अन्य लोगों को धार्मिक त्योहारों या जुलूसों की अनुमति नहीं देने का कारण नहीं हो सकता है।"

मामला

वर्ष 1951 से ही सरकारी पोरमबोक भूमि के 96% के उपयोग को लेकर दो धार्मिक समूहों के बीच विवाद है। मुसलमान चाहते हैं कि इस ज़मीन का इस्तेमाल आम लोगों के लिए हो, वहीं हिंदुओं ने पोरमबोक की ज़मीन के लंबे इस्तेमाल का दावा किया और इसके सर्वाजनिक इस्तेमाल पर आपत्ति जताई।

इसके कारण दोनों धार्मिक समूहों के बीच उक्त स्थल को लेकर कई झड़पें हुईं, जिसके बाद दोनों समूहों के खिलाफ कई मामले भी दर्ज किए गए।हालांकि, 2011 तक कुछ हिंदू त्योहारों के संचालन के संबंध में कोई मुद्दा नहीं था और 3 मंदिरों के तीन दिनों के त्योहारों को शांतिपूर्वक 2011 तक आयोजित किया जाता रहा।

केवल 2012 के बाद से मुसलमानों ने कुछ हिंदू त्योहारों को पाप के रूप में बताना शुरू कर दिया और कहा कि क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी वाले का प्रभुत्व है।

साल 2012 और 2015 के बीच त्यौहारों का आयोजन किया गया। हालांकि, विभिन्न आदेशों के माध्यम से न्यायालय द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को देखते हुए त्यौहारों के संचालन पर आपत्ति दर्ज की गई।

राजस्व मंडल अधिकारी ने वर्ष 2018 में एक आदेश पारित किया गया जिसमें वास्तव में कुछ शर्तों के साथ त्योहारों के संचालन की अनुमति दिया गया और इन शर्तों को बारी-बारी से उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई।

मद्रास उच्च न्यायालय ने कुछ शर्तों के साथ त्यौहारों को आयोजित करने की अनुमति दी। हालांकि इस निर्णय को खंड पीठ (वर्तमान मामले) के समक्ष चुनौती दी गई।

कोर्ट का अवलोकन

कोर्ट ने शुरुआत में कहा कि जिला नगरपालिका अधिनियम 1920 की धारा 180 ए के अनुसार सड़कों या सड़कों का उपयोग के लिए धर्म, जाति या पंथ में भेदभाव किए बिना लोगों तक पहुंच सुनिश्चित करना चाहिए।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि धार्मिक सहिष्णुता के साथ-साथ सभी धार्मिक आयोजन बहुत ही सुचारू रूप से संपन्न हुए और गांव की सभी सड़कों और रास्तों से बिना किसी समस्या के धार्मिक जुलूस निकाले गए।

डिवीजन बेंच ने इसके अलावा गांव के 3 मंदिरों के तीन दिन के त्योहार की अनुमति देते हुए कुछ शर्तें लगाईं कि,

"सभी गांव के मंदिरों के त्योहारों के पहले और दूसरे दिन दो जुलूसों को 2015 से आयोजित होते आ रहे सड़क पर आयोजित करने की अनुमति देने का अधिकारियों को एक निर्देश होगा। इसके साथ ही मदिर के त्यौहार के तीसरे दिन याचिकाकर्ता ने खुद स्वीकार किया कि हिंदू उस जुलूस का आयोजन नहीं करेंगे जिसमें हल्दी का पानी छिड़का जाता है।"

कोर्ट ने आयोजन पर रोक नहीं लगाया और निम्नलिखित अवलोकन किया;

1. केवल इसलिए कि एक धार्मिक समूह एक विशेष इलाके में बहुमत में है, यह धार्मिक त्योहारों को मनाने या सड़कों के माध्यम से अन्य धार्मिक समूहों के जुलूसों को ले जाने से प्रतिबंधित करने का आधार नहीं हो सकता है।

2. यदि इसे स्वीकार किया जाना है, तो एक दिन आएगा जब एक विशेष धार्मिक समूह जो मुख्य रूप से इस क्षेत्र पर कब्जा कर रहा है, अन्य धार्मिक समूहों से संबंधित लोगों को यहां तक कि सड़कों के उपयोग के लिए भी आंदोलन, परिवहन या सामान्य पहुंच की अनुमति नहीं देगा।

3. यहां तक कि शादी के जुलूस और अंतिम संस्कार के जुलूस निषिद्ध / रोका जाएगा जो हमारे समाज के लिए अच्छा नहीं है।

4. मंदिर एक दशकों से वहां स्थित है। केवल इसलिए कि एक धार्मिक समूह एक इलाके में बस गया और मुखर हो गया। इस आधार पर वे गांव की सभी सड़कों से मंदिर के जुलूस ले जाने के रिवाज पर आपत्ति नहीं जता सकते हैं और प्रथागत और पारंपरिक प्रथाओं पर रोक नहीं लगाया जा सकता है।

5. इस मामले में एक विशेष धार्मिक समूह की असहिष्णुता उन त्यौहारों पर आपत्ति जताते हुए प्रदर्शित की जाती है जो दशकों से एक साथ आयोजित किए जा रहे हैं और गांव की सड़कों और सड़कों के माध्यम से जुलूस को यह कहते हुए प्रतिबंधित करने की मांग की जाती है कि यह क्षेत्र में मुसलमान बहुमत में हैं और इसलिए इस इलाके से कोई हिंदू त्योहार या जुलूस नहीं ले जाया जा सकता है।

6. यदि धार्मिक समूह विरोध जताता है और उसका प्रभाव अन्य धार्मिक समूहों पर पड़ता है तो इससे अराजकता, दंगे, धार्मिक झगड़े होते है और जन-धन की हानि होती हौ। नतीजतन हमारे देश का धर्मनिरपेक्ष चरित्र नष्ट या क्षतिग्रस्त हो जाएगा।

कोर्ट का आदेश

1. जिला नगरपालिका अधिनियम 1920 की धारा 180 ए के अनुसार सड़कों या सड़कों का उपयोग के लिए धर्म, जाति या पंथ में भेदभाव किए (धर्मनिरपेक्ष) बिना लोगों तक पहुंच सुनिश्चित करना चाहिए।

2. धार्मिक जुलूस सहित कोई भी जुलूस बिना किसी प्रतिबंध के सभी सड़कों और गलियों से होकर गुजारा जाएगा।

3. धार्मिक जुलूस सहित किसी भी जुलूस को निषिद्ध या केवल इसलिए रोक नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि एक अन्य धार्मिक समूह बहुमत में इस क्षेत्र में रहता है या व्यापार करता है।

4. जिला प्रशासन या पुलिस अधिकारियों द्वारा सड़कों से धार्मिक जुलूसों सहित किसी भी जुलूस के लिए निषेध नहीं किया जा सकता है और केवल पुलिस या अन्य सरकारी अधिकारियों द्वारा यह देखने के लिए विनियमन किया जाए कि कोई अनुचित घटना न घटित हो या कोई कानून-व्यवस्था समस्या उत्पन्न न हो।

5. प्रत्येक धार्मिक समूह को अन्य धार्मिक भावनाओं का अपमान किए बिना और अन्य धार्मिक समूहों के खिलाफ कोई नारे लगाने, उनकी भावनाओं, सार्वजनिक कानून और व्यवस्था को प्रभावित किए बिना सभी को सड़कों से धार्मिक जुलूस निकालने का मौलिक अधिकार मिला है।

6. केवल इसलिए कि एक स्थान पर दूसरे धार्मिक समूह से संबंधित एक पूजा स्थल है। यह सड़कों या गलियों से गुजरने वाले अन्य धर्मों के धार्मिक जुलूसों सहित जुलूस निकालने की अनुमति नहीं देने / अस्वीकार करने का आधार नहीं हो सकता है।

7. धार्मिक संरचनाएं / पूजा स्थल अन्य धार्मिक समूहों का अधिकार नहीं छीन सकती है जो पिछले कई वर्षों से धार्मिक जुलूसों के संचालन सहित सभी अधिकारों का आनंद ले रहे हैं।

8. दोनों पक्षों के खिलाफ दायर आपराधिक मामलों को वापस लेने का निर्देश दिया गया।

जजमेंट की कॉफी यहां पढ़ें:



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