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यदि पीड़िता द्वारा दिए गए साक्ष्य अदालत के विश्वास को बढ़ाते हैं तो मेडिकल साक्ष्य के बिना भी रेप के आरोपी को दोषी करार दिया जा सकता है : कर्नाटक हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
17 Oct 2019 9:43 AM GMT
यदि पीड़िता द्वारा दिए गए साक्ष्य अदालत के विश्वास को बढ़ाते हैं तो मेडिकल साक्ष्य के बिना भी रेप के आरोपी को दोषी करार दिया जा सकता है : कर्नाटक हाईकोर्ट
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कर्नाटक हाईकोर्ट ने बलात्कार के आरोपी को बरी किए जाने के एक आदेश को रद्द करते हुए एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म करने के आरोप में एक 47 वर्षीय व्यक्ति को दोषी ठहराया है।

हाईकोर्ट ने कहा, ''पीड़िता का साक्ष्य अदालत के इस विश्वास को प्रेरित करता है कि आरोपी ने उसका यौन शोषण किया था और मेडिकल साक्ष्य की अनुपस्थिति में भी यह अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि पीड़िता का यौन उत्पीड़न हुआ था।''

न्यायमूर्ति रवि मलीमथ और न्यायमूर्ति एच.पी. संदेश की पीठ ने आरोपी एस.राजू को निर्देश दिया है कि वह जुर्माने के तौर पर 2 लाख रुपये पीड़िता को दे। पीठ ने यह आदेश राज्य सरकार की तरफ से दायर अपील को स्वीकारते हुए दिया है। राज्य सरकार ने आरोपी को बरी किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी।

यह था मामला

अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने 4 अप्रैल, 2012 को पीड़िता के साथ दुष्कर्म किया था, जो घटना के समय 16 वर्ष की थी। साथ ही उसे धमकाया था कि अगर उसने किसी को भी इसके बारे में बताया तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। पीड़िता ने इस घटना के बारे में एक पड़ोसी महिला को बताया था जो पीड़िता को उसकी कामकाजी मां के पास ले गई, जिसके बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई।

हालांकि, पीड़िता की जांच करने वाले डॉक्टर ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी, जिसमें उसने कहा था कि उन्होंने पीड़िता की जांच की और एक सीलबंद बोतल में वजाइनल के स्वैब और स्मीयर एकत्र किए थे, जिसके बाद जांच अधिकारी ने इन सैंपल को आरएफएसएल को जांच के लिए सौंप दिया था। उसने आरएफएसएल रिपोर्ट की जांच की और राय दी कि जबरन संभोग के कोई संकेत नहीं मिले हैं। हालांकि ट्रायल के दौरान इस डॉक्टर का प्रति परीक्षण नहीं किया गया।

इसी तरह जिस डॉक्टर ने आरोपी की जांच की थी, उसने कहा था कि आरोपी के शरीर और प्राइवेट पार्ट पर कोई चोट नहीं थी। वहीं आरोपी के प्राइवेट पार्ट पर भी खून और वीर्य के धब्बे नहीं थे।

अभियोजन पक्ष की दलील

राज्य की ओर से पेश अधिवक्ता नमिता महेश ने दलील दी कि निचली अदालत ने रिकॉर्ड पर आए सबूतों पर ठीक से विचार नहीं किया। एक नाबालिग के साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामले में अगर पीड़िता के साक्ष्य अदालत के विश्वास को प्रेरित करते हैं तो इन पर विचार करना चाहिए।

वकील ने दलील दी कि अदालत द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे आरोप को साबित नहीं कर पाया है। पीड़िता की उम्र को ध्यान में रखना चाहिए था। इतना ही नहीं इसके समर्थन के लिए किसी चिकित्सा साक्ष्य की भी आवश्यकता नहीं थी।

आरोपी की ओर से पेश अधिवक्ता पी.बी.उमेश ने अपील का विरोध करते हुए कहा, ''निचली अदालत ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध मौखिक और दस्तावेजी,दोनों तरह के साक्ष्यों पर पूरी तरह से विचार किया है और घटना पर बहुत ज्यादा संदेह जताया है। निचली अदालत के निष्कर्ष को पलटने के लिए रिकॉर्ड पर कोई भी ठोस और परिपुष्टि करने वाला साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। इसलिए इस अदालत से प्रार्थना की जाती है कि वह अपील को खारिज कर दे।

पीड़िता और अन्य गवाहों के साक्ष्य को देखन के बाद पीठ ने कहा,

''यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि, सबसे पहले, शिकायतकर्ता के परिवार और अभियुक्त के बीच कोई दुश्मनी नहीं है,और अगर दोनों परिवारों के बीच ऐसी कोई दुश्मनी नहीं है, तो एक व्यक्ति को वह भी दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध में फंसाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि कोई भी माता-पिता किसी व्यक्ति को अपनी ही बेटी से दुष्कर्म करने के गंभीर अपराध में झूठा फंसाने का निर्णय नहीं लेंगे, क्योंकि यह आरोप पीड़िता के परिवार के लिए भी कलंक होगा।''

हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा है कि '

'यदि पीड़िता के साक्ष्य न्यायालय के आत्मविश्वास को प्रेरित करते हैं तो यह न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता है कि आरोपी ने पीड़िता का यौन उत्पीड़न किया था। निचली अदालत ने आरोपी वकील द्वारा दिए गए सुझावों पर विचार करके त्रुटि की है और एक गलत निष्कर्ष पर पहुंची थी कि शिकायतकर्ता और आरोपी के परिवार के बीच दुश्मनी थी, जबकि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों में ऐसा कुछ भी नहीं है। निचली अदालत द्वारा दिए गए अन्य कारणों या विचारों या निष्कर्ष से पता चलता है कि निचली अदालत ने, गवाहों के बयानों में मिली उन मामूली विसंगतियों को बढ़ावा दे दिया,जो उन व्यक्तियों के संबंध में थी,जिनसे पीड़िता घटना के बाद मिली थी।

इसलिए, निचली अदालत का दृष्टिकोण बहुत ही गलत है और इसके लिए इस न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता है। इस केस में निचली अदालत के निष्कर्ष को उलट दिया जाना चाहिए।''


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