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फ़िज़ूल मुक़दमा दायर करने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट ने लगाया 50 लाख का जुर्माना कहा, संभव हो तो याचिकाकर्ता को काली सूची में डालें

LiveLaw News Network
11 Jan 2020 1:15 PM GMT
फ़िज़ूल मुक़दमा दायर करने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट ने लगाया 50 लाख का जुर्माना कहा, संभव हो तो याचिकाकर्ता को काली सूची में डालें
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक फ़ैसले में नागार्जुना एग्रो केमिकल्ज़ प्रा. लि. पर बेतुका मुक़दमा दायर करने के लिए 50 लाख रुपए का जुर्माना लगाया। कंपनी ने याचिका में एसटीएफआर (Soil Testing Fertilizer Recommendations) तकनीक के उत्पादन और उनके विपणन की जांच की मांग की थी। इस तकनीक को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और भारतीय कृषि शोध संस्थान (आईएआरआई) ने विकसित की है।

नागपुर पीठ के न्यायमूर्ति आरके देशपांडे और न्यायमूर्ति मिलिंद जाधव की पीठ ने याचिकाकर्ता को मुक़दमे की लागत के रूप में 50 लाख की राशि का भुगतान करने को कहा जो कि आईसीएआर और आईएआरआई दोनों को दिया जाएगा।

अदालत ने कहा,

" याचिका और इसमें हस्तक्षेप का आवेदन दोनों ही किसी छिपी हुई मंशा से दायर किए गए थे ताकि अदालत का प्रयोग कर प्रतिस्पर्धा को समाप्त कर एकाधिकार क़ायम कर वाणिज्यिक लाभ हासिल किया जा सके।

"हमारी राय में अदालत को इसे कतई बर्दाश्त नहीं करना चाहिए…इस पर रोक लगाने की ज़रूरत है और इनसे सख़्ती से निपटा जाना चाहिए ताकि मुक़दमादार प्रक्रिया का दुरुपयोग कर अदालत को बरगला न सकें।"

आईसीएआर भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के अधीन आता है, जबकि आईएआरआई कृषि अनुसंधान की एक बहुत ही प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्था है और एक डीम्ड यूनिवर्सिटी भी।

याचिकाकर्ता ने देश के कम से कम पांच विभिन्न एग्रो-कलाइमेटिक ज़ोन में एसटीएफआर के विपणन पर रोक लगाने की मांग की थी। एसटीएफआर तकनीक का याचिकाकर्ता कंपनी सहित 14 कंपनियों/फर्मों को लाइसेन्स ज़ारीकर विपणन किया जाता है।

याचिकाकर्ता कंपनी के अलावा आनंद एम्बादवर भी एक आवेदनकर्ता है जो ख़ुद को एक कृषिकर्मी और किसानों के कल्याण के लिए काम करने वाला सामाजिक कार्यकर्ता कहता है और यह भी कि वह महाराष्ट्र के एक पूर्व कृषि मंत्री का बेटा है।

अदालत ने याचिका पर ग़ौर करने के बाद कहा कि इसमें कोई विवरण नहीं है और यह नहीं बताया गया है कि कैसे इसमें किसानों के ख़िलाफ़ धोखाधड़ी और फ़र्ज़ीवाड़े का मामला बनता है। यह भी नहीं बताया गया है कि इससे ज़मीन पर कैसे प्रभाव पड़ता है और ऐसी राय किसने ज़ाहिर की है।

पीठ ने कहा,

" नानाभाऊ एम्बादवर का बेटा आनंद नागार्जुना एग्रो का भोंपू या प्रवक्ता है और इस पीआईएल का न तो लोगों के हितों से कोई लेनादेना है और न ही किसानों के कल्याण से…एक सिविल आवेदन नंबर 1467 भगवान पुत्र राजेराम करमेंगे ने डाला है जो नागपुर के कृषिकर्मी हैं और उन्होंने याचिकाकर्ताओं का समर्थन किया है। यह आवेदन एक हस्तक्षेप है और …इसके आवेदनकर्ता भी अन्य आवेदनकर्ताओं की ही क़तार में खड़े हैं…हमने इस आवेदनकर्ता को इस मामले में हस्तक्षेप की अनुमति दी थी।"

अदालत ने याचिकाकर्ताओं की इस दलील को नकार दिया कि मिट्टी की जांच के नाम पर एसटीएफआर मीटर ने किसानों को गुमराह किया है और इससे मिट्टी को नुक़सान पहुँचा है।

अदालत ने कहा,

"यह समझना मुश्किल है कि इसमें किसानों को कैसे और किस तरह ठगा गया है। एसटीएफआर मीटर किसान, ग्रामीणों के स्वयं सहायता समूहों, सहकारी समितियों और अन्य सस्थाओं द्वारा आईसीएआर और आईएआरआई से मिलने वाली सब्सिडी की मदद से ख़रीदते हैं और किसानों को मिट्टी की जाँच जैसी सुविधा उनके दरवाज़े तक पहुँचाई जाती है और इसके लिए उनसे हर नमूने के लिए लगभग 50 से 60 रुपए लिए जाते हैं। इस तरह के कोई सबूत नहीं हैं कि इस तरह की सेवा की वजह से मिट्टी को कोई नुक़सान पहुँचा है।"

इस जनहित याचिका को ख़ारिज करते हुए अदालत ने कहा,

"हमारी राय में याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहे हैं कि एसटीएफआर मीटर के विपणन की वजह से किसानों के साथ धोखा हुआ है जिसमें 12 मानकों के आधार पर मिटी की जाँच की क्षमता है जिसमें कॉपर और नाइट्रोजन शामिल हैं…इस तरह का कोई मामला नहीं ठहरता जिससे साबित हो सके कि इसके विपणन के लिए ज़रूरी है कि कम से कम पाँच एग्रो-कलाइमेटिक ज़ोन से इसे उपयुक्त ठहराया जाए या फिर इसके विपणन पर रोक लगा दी जाए।

इसके उलट हमने पाया है कि ये याचिकाएँ किसी छिपी हुई मंशा से दायर की गई हैं और हस्तक्षेप याचिका अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग कर प्रतिस्पर्धा को समाप्त कर एकाधिकार बनाने के उद्देश्यों के लिए दायर किया गया है ताकि इसका वाणिज्यिक लाभ उठाया जा सके। यह अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग के अलावा और कुछ नहीं है।

याचिकाकर्ता नागार्जुना एग्रो ने परस्पर विरोधी और ढुलमुल दावे किए हैं। वह एसटीएफआर मीटर से होने वाले लाभ से वंचित नहीं होना चाहता पर चाहता है कि इसका विपणन कोई और न करे। यह मुक़दमा अनावश्यक है और इसने अदालत का कई दिन का समय जाया किया है और याचिकाकर्ता और हस्तक्षेपकरता इसके लिए दोषी हैं।"

इस बात पर ग़ौर करते हुए कहा कि आईसीएआर से जुड़ी एक संस्था इंस्टिच्यूट ऑफ़ सोईल साइंसेज़ (आईआईएसएस) भोपाल अभी भी नागार्जुना एग्रो के साथ मिलकर काम कर रहा है, जबकि आईसीएआर का यह ख़िलाफ़ करता है।

अदालत ने कहा कि उसे उम्मीद है कि आईसीएआर और आईएआरआई याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ एमओयू के उल्लंघन के लिए कार्रवाई करेगा और इस कार्रवाई को अंजाम तक ले जाएगा। अगर संभव है तो वह नागार्जुना एग्रो केमिकल्स को क़ानून के अनुरूप काली सूची में भी डाल सकता है।

आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें




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