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सुप्रीम कोर्ट/हाईकोर्ट के पूर्व जजों, वकीलों ने आपराधिक क़ानून में सुधार के लिए बनी समिति के दोबारा गठन और उसमें अकादमिकों, निचली अदालत के वकीलों, महिलाओं, दलितों को शामिल करने की मांग की

LiveLaw News Network
19 July 2020 3:30 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट/हाईकोर्ट के पूर्व जजों, वकीलों ने आपराधिक क़ानून में सुधार के लिए बनी समिति के दोबारा गठन और उसमें अकादमिकों, निचली अदालत के वकीलों, महिलाओं, दलितों को शामिल करने की मांग की
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हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जजों, वरिष्ठ वकीलों और पूर्व नौकरशाहों ने आपराधिक क़ानून में सुधार के लिए बनी केंद्रीय समिति से कहा है कि वह अपने सुझाव तब तक नहीं दे जब तक कि इस समिति में उन सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व नहीं मिल जाता है जिनको इस व्यवस्था से कुछ लाभ नहीं हुआ है।

इस समूह ने समिति को यह दूसरा पत्र भेजा है और समिति के गठन में पारदर्शिता और इसके काम काज को लेकर सवाल उठाए हैं।

पत्र में लिखा है कि

"यह देखते हुए कि समिति का प्रयास मौलिक रूप से नागरिकों के बीच और नागरिकों और राज्य के बीच संबंधों को पुनर्व्यवस्थित करना है, यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण है कि समिति के गठन में भारत की विविधता की झलक मिले।"

अपने पत्र के माध्यम से समिति से कहा गया है कि आपराधिक क़ानून में व्यापक सुधार के सुझाव की बात तब तक पूरी नहीं होगी, जब तक कि इस समिति को दोबारा गठित नहीं किया जाता और इसमें उन समुदायों को भी प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता जिनको आपराधिक न्याय व्यवस्था से कोई मदद नहीं मिली है।

पत्र में कहा गया है कि समिति में महिलाओं, दलितों, मुसलमानों, आदिवासियों, ट्रांसजेंडर समुदाय, मज़दूर संघों, क़ानूनी इतिहासकारों, संवैधानिक क़ानूनों के विद्वानों, आपराधिक क़ानून और आपराधिक न्यायविधान में विशेषज्ञता रखने वाले अकादमिकों, और निचली अदालतों में प्रैक्टिस करनेवाले वकीलों को शामिल किया जाना चाहिए ताकि बेहतर सुझाव दिए जा सकें।

इससे पहले 8 जुलाई 2020 को जारी नोटिस में कहा गया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय इस बारे में समिति का गठन करेगा।

पत्र लिखने वालों ने कहा है कि संविधान के तीन महत्त्वपूर्ण क़ानूनों भारतीय दंड संहिता, आपराधिक प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य क़ानून में सुधार का सुझाव देने के लिए बहुत ही कम समय दिया गया है। समिति को छह माह के भीतर अपने सुझाव देने हैं। पत्र लिखने वालों ने पूर्व के उदाहरण से बताया है कि कैसे आपराधिक क़ानून और इसकी सुनवाई की प्रक्रिया के बारे में पूर्व की समितियों ने वर्षों का समय लिया।

वर्मा समिति का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि सिर्फ बलात्कार और यौन अपराध के प्रावधानों में परिवर्तन के लिए सभी संबंधित पक्षों से परामर्श करने पर काफ़ी समय लगाया गया।

पत्र में कहा गया है कि 900 वर्ष के आम क़ानून और पिछले डेढ़ सौ वर्षों से स्थापित न्याय व्यवस्था के रूप में जिसे हम जानते हैं उस आपराधिक क़ानून में बदलाव के लिए छह माह का अल्प समय देना बहुत ही गंभीर मामला है। इसके लिए पांच सदस्यीय समिति प्रश्नावलियों का समयबद्ध तरीक़ा अपनाएगा।

पत्र में कहा गया है कि मानवता का तक़ाज़ा है कि COVID-19 महामारी के समय में जब हर दिन 600 के आसपास लोग इस बीमारी से मर रहे हैं देश का बड़ा हिस्सा लॉकडाउन में है, इस तरह का अभियान नहीं चलाया जाना चाहिए।

अन्य चिंताएं और मांग

समिति के गठन के बारे में एमएचए की अधिसूचना को सार्वजनिक करें विशेषकर समिति के कार्य, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, दिल्ली द्वारा सौंपें गए कॉन्सेप्ट नोट को स्पष्ट करें कि कमेटी के वेबसाइट पर 10 जुलाई 2020 तक राज्य चिह्न और एमएचए का लोगो क्यों था और अब इसे वेबसाइट से क्यों हटा दिया गया है;

स्पष्ट करें कि क्या समिति कार्यपालिका और सरकार के विधायी प्रभाव क्षेत्र से स्वतंत्र होकर काम करेगी;

स्पष्ट करें कि समिति की रिपोर्ट को केंद्रीय गृह मंत्रालय या किसी अन्य मंत्रालय के परामर्श से अंतिम रूप दिया जाएगा;

समिति को मिलने वाले सभी मटीरीयल जिस पर समिति ग़ौर करेगा, उसके अनुवाद के लिए समिति कौन सा तरीक़ा अपना रही है;

इस समिति ने जिन मटीरीयल पर ग़ौर किया है उसको सार्वजनिक कीजिए और उनका भी जिसे समिति भविष्य में प्राप्त करेगी;

समिति की ड्राफ़्ट रिपोर्ट को सार्वजनिक करें और आम लोगों में इसका व्यापक प्रचार प्रसार सुनिश्चित करें और फ़ीडबैक के लिए कम से कम एक माह का समय सुनिश्चित करें;

किसी विशेष हेड, POCSO,देशद्रोह, यूएपीए और अन्य के तहत होने वाली सुनवाई के राष्ट्र्व्यापी विश्लेषण की दिशा क्या रही है उसे सार्वजनिक करें;

पत्र में सुझाव दिया गया है कि चूंकि आईपीसी, सीआरपीसी और आईईए सभी एक-दूसरे से आंतरिक रूप से जुड़े हैं, इसलिए इन तीनों से संबंधित सभी प्रश्नावलियों को आवश्यक रूप से एक साथ सार्वजनिक किया जाना चाहिए। संशोधन, समाप्ति या अपराधों को पुनर्व्यवस्थित करने और नया अपराध बनाने का काम उचित प्रक्रिया के अधीन होना चाहिए।

पत्र डाउनलोड करेंं



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