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पत्नी जिसे 7 साल से नहीं देखा गया है, उसकी मृत्यु का अनुमान लगाने से पहले पति को दीवानी अदालत में जाना होगा, पढ़िए हाईकोर्ट का फैसला

LiveLaw News Network
2 Sep 2019 5:55 AM GMT
पत्नी जिसे 7 साल से नहीं देखा गया है, उसकी मृत्यु का अनुमान लगाने से पहले पति को दीवानी अदालत में जाना होगा, पढ़िए हाईकोर्ट का फैसला
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"इस बात को लेकर अनुमान लगाने की कोई गुंजाइश नहीं है कि यदि पत्नी लगभग 7 वर्ष से नहीं देखी गई है, तो उसकी मृत्यु हो गई होगी। उक्त अनुमान लगाने हेतु कानूनी प्रावधान यह है कि पति को दीवानी अदालत में यह घोषणा करने के लिए संपर्क करना होगा कि उसकी पत्नी मृत है। दीवानी अदालत का दरवाजा खटखटाने और डिक्री प्राप्त करने के बजाय, प्रतिवादी ने यह मान लिया कि वह (उसकी पत्नी) मर गई होगी और उसने दूसरी शादी कर ली जोकि प्रथम दृष्टया कदाचार है।"

एक सेवानिवृत्त रेलवे कर्मचारी को कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा सेवा नियमों के अनुसार कदाचार का दोषी पाया गया, और इसलिए उसकी पेंशन राशि में 50 प्रतिशत की कटौती के लिए उसे उत्तरदायी ठहराया गया। दरअसल उसने यह मानते हुए कि, चूंकि उसकी पहली पत्नी पिछले 7 वर्ष से नहीं देखी गई इसलिए उसकी मृत्यु हो गई है, दूसरी शादी कर ली थी। हालांकि, यह देखते हुए कि वह सेवानिवृत्त हो गए हैं और पूरी तरह से पेंशन राशि पर निर्भर हैं, अदालत ने सजा को 5 साल से घटाकर 3 साल कर दिया है।

न्यायमूर्ति एल. नारायण स्वामी और न्यायमूर्ति आर. देवदास की खंडपीठ ने के. एल. मिशेल के पक्ष में पारित केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) के आदेश को संशोधित किया। ट्रिब्यूनल ने अक्टूबर 2018 में रेलवे द्वारा दी गई सजा को पलट दिया था। दरअसल रेलवे प्राधिकरण ने मामले की जांच के बाद रेलवे (सेवा) पेंशन नियमों के तहत कदाचार के लिए, व्यक्ति के पेंशन लाभ में 5 वर्ष के लिए 50 प्रतिशत की कटौती की सजा सुनाई थी।

रेलवे ने उच्च न्यायालय में ट्रिब्यूनल के आदेश को चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि "ट्रिब्यूनल ने एक चर्चा (अपने आदेश में) इस हद तक की है कि प्रतिवादी दूसरा विवाह करने का दोषी है, और जब स्वयं प्रतिवादी द्वारा तथ्यों पर विवाद नहीं किया गया है, तो सजा के आदेश को बदल देना, कानून के सिद्धांतों के विपरीत है।"

मिचेल ने यह कहते हुए अपील का विरोध किया कि "उसकी पहली पत्नी जब उसे छोड़ कर चली गयी थी, प्रतिवादी (उसने) ने 7 वर्ष तक इंतजार किया और यह मान लिया कि उसकी मृत्यु हो गई है, उसके बाद उसने दूसरी शादी को अंजाम दिया। ट्रिब्यूनल द्वारा कोई त्रुटि नहीं हुई है।" उनके द्वारा यह भी निवेदन किया गया था कि वह सेवानिवृत्त हो चुके हैं और पेंशन पर जीवित हैं और सजा से उनकी आजीविका प्रभावित होगी।

बेंच ने देखा:

"इस बात को लेकर अनुमान लगाने की कोई गुंजाइश नहीं है कि यदि पत्नी लगभग 7 वर्ष से नहीं देखी गई है, तो उसकी मृत्यु हो गयी होगी। उक्त अनुमान लगाने हेतु कानूनी प्रावधान यह है कि पति को दीवानी अदालत में यह घोषणा करने के लिए संपर्क करना होगा कि उसकी पत्नी मृत है। दीवानी अदालत का दरवाजा खटखटाने और डिक्री प्राप्त करने के बजाय, प्रतिवादी ने यह मान लिया कि वह (उसकी पत्नी) मर गई होगी और उसने दूसरी शादी कर ली जोकि प्रथम दृष्टया कदाचार का मामला है। इन परिस्थितियों में, न्यायाधिकरण के आदेश को हटाया जाना होगा। दिए गए कारण कानून और तथ्य के विपरीत है।

सजा अवधि में कमी के संबंध में पीठ ने कहा, "माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना है कि जांच रिपोर्ट और सजा के साथ हस्तक्षेप करना अदालत का काम नहीं है। लेकिन इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में जहाँ प्रतिवादी सेवानिवृत्त हो गया है और वह पेंशन पर जीवित है, अगर उसे इससे वंचित किया जाता है तो यह और कुछ नहीं उसकी आजीविका से उसे वंचित करना होगा। यदि उसकी सेवा की अवधि के दौरान प्रतिवादी को दंडित किया गया होता, तो यह एक अलग बात होती। मौजूदा परिस्थिति के तहत, हालांकि हम प्राधिकरण की जांच की पुष्टि करते हैं, लेकिन 5 साल की अवधि को घटाकर 3 साल करना हमारी ओर से एकमात्र हस्तक्षेप होगा।"



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