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जस्टिस रमना ने दिये फैमिली कोर्ट के कामकाज में सुधार के सुझाव कहा, IPC की धारा 498 ए पर फिर से विचार हो

LiveLaw News Network
23 Sep 2019 7:13 AM GMT
जस्टिस रमना ने दिये फैमिली कोर्ट के कामकाज में सुधार के सुझाव कहा, IPC की धारा 498 ए  पर फिर से विचार हो
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सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एन वी रमना ने शनिवार को यह कहते हुए परिवार अदालत के कामकाज में सुधार के लिए कई सुझाव दिए कि पारिवारिक जीवन में अशांति से व्यक्ति की कार्यक्षमता और समाज का विकास प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि परिस्थितियों के व्यक्ति के नियंत्रण के बाहर चले जाने के कारण पारिवारिक जीवन में अशांति बढ़ रही है।

जस्टिस रमना झारखंड की राजधानी रांची में परिवार अदालतों के न्यायाधीशों को संवेदनशील बनाने के लिए दो-दिवसीय 'प्रथम क्षेत्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम' को सम्बोधित कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश आर भानुमति, जस्टिस इंदिरा बनर्जी, दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी एन पटेल, झारखंड हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एच सी मिश्रा, हाईकोर्ट के जज जस्टिस अपरेश कुमार सिंह तथा न्यायमूर्ति एस चंद्रशेखर एवं पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के कई न्यायाधीशों ने इस समारोह में हिस्सा लिया।

अपने सम्बोधन के दौरान न्यायमूर्ति रमन ने कानून, जांच और अभियोजन एवं फैमिली कोर्ट के कामकाज सहित 37 प्रस्ताव रखे।

कानून में बदलाव संबंधी कुछ सुझाव इस प्रकार हैं:-

1. फैमिली कोर्ट को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के चैप्टर 20 और 20ए के तहत महिलाओं के खिलाफ विवाह से संबंधित अपराधों से निपटने का अधिकार दिया जाना चाहिए।

2. चूंकि परिवार की आजीविका सरकार का जिम्मा है, इसलिए दहेज निरोधक कानून एवं आईपीसी की धारा 498 पर फिर से विचार किया जाना चाहिए।

3. फैमिली कोर्ट के लिए समरी प्रोसिजर को अनिवार्य बनाये जाने की जरूरत है।

4. पितृत्व और मातृत्व विवादों के निर्धारण के लिए वैज्ञानिक उपायों को समाहित किया जाना चाहिए।

5. आगे विस्तृत घरेलू कानून लाये जाने की आवश्यकता है।

6. परित्यक्ता पत्नियों और बच्चों को गुजारा भत्ता के आदेश के क्रियान्वयन में अनावश्यक विलम्ब से बचा जाना चाहिए।

7. नोटिस तामील नहीं हो पाने के कारण प्रवासी पति एवं पिता की क्रमश: पत्नियां और बच्चे वाकई कानूनी लाभ से वंचित हैं। ऐसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तालमेल और संधि की आवश्यकता है।

8. फैमिली कोर्ट के समक्ष मामले को रखने से पहले मुकदमा-पूर्व मध्यस्थता एवं समझौते को अनिवार्य करना चाहिए।

जांच प्रणाली में सुधार के लिए सुझाव :-

1. विशेष तौर पर महिलाओं के खिलाफ अपराध की सुनवाई करने वाली महिला अदालतों को बढ़ाने की जरूरत है।

2. अधिक से अधिक महिला पुलिस स्टेशन स्थापित किये जाने की जरूरत है।

3. महिलाओं के खिलाफ अपराध की जांच महिला पुलिस अधिकारी द्वारा की जानी चाहिए।

फैमिली कोर्ट के कामकाज में सुधार के लिए सुझाव :-

1. हाईकोर्ट की सलाह पर राज्य सरकार को फैमिली कोर्ट के सहयोग के लिए पर्याप्त संख्या में परामर्शदाताओं, मनोचिकित्सकों और विशेषज्ञों की नियुक्ति के लिए उचित नियम बनाने चाहिए।

2. परिवार अदालतों को विवाद के निपटारे के लिए प्रक्रियागत अधिकारों के महत्तम इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

3. फैमिली कोर्ट को संबंधित पक्षों को मुक्त माहौल में विवादों के निपटारे के लिए सुनवाई सदैव इन-कैमरा (बंद कमरे में) करनी चाहिए।

4. फैमिली कोर्ट को वैसे पक्ष को कानूनी सहायता उपलब्ध करानी चाहिए, जो वकील रखने में असक्षम हों।

इस अवसर पर न्यायमूर्ति आर भानुमति ने कहा कि 498ए से संबंधित विवाद में परिवार के सदस्यों की तत्काल गिरफ्तारी से समझौते की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है और इस सिलसिले में पुलिस को पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। जस्टिस इंदिरा बनर्जी ने कहा कि पारिवारिक विवादों में सबसे अधिक बच्चे प्रभावित होते हैं।

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