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भले ही रिमांड ऑर्डर अवैध है, फिर भी हैबियस कॉर्पस की रिट प्रभावी उपाय नहीं : बॉम्बे हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
30 Jan 2020 3:15 AM GMT
भले ही रिमांड ऑर्डर अवैध है, फिर भी हैबियस कॉर्पस की रिट  प्रभावी उपाय नहीं :  बॉम्बे हाईकोर्ट
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार को एक अंकित मुथा द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट को खारिज कर दिया,जिसे राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) ने गिरफ्तार किया था। डीआरआई करोड़ों रूपये के सोने की तस्करी के एक घोटाले की जांच कर रही है और सोने की तस्करी के आरोप में अंकित को भी गिरफ्तार किया गया था।

जस्टिस एस.एस शिंदे और जस्टिस एन.बी सूर्यवंशी की खंडपीठ ने सौरभ कुमार बनाम जेलर कोनीला जेल व अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए फैसले का पालन किया। इस फैसले में माना गया था कि

''भले ही मजिस्ट्रेट ने अभियुक्त को न्यायिक हिरासत में भेजने के लिए यंत्रवत रूप से काम किया हो और इस प्रक्रिया को एक लापरवाहपूर्ण शैली में अंजाम दिया हो, जो किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से इंकार करने के प्रति असंवेदनशीलता दिखाता है, लेकिन रिमांड का आदेश होने पर हैबियस कॉर्पस की रिट सुनवाई योग्य नहीं है, चूंकि इस मामले में उपाय कहीं और निहित है या कुछ अन्य उपाय उपलब्ध हैं।''

यह वही मामला है ,जिसमें पिछले साल सितंबर में हाईकोर्ट ने हैप्पी धाकड़ के पिता अरविंद कुमार धाकड़ की रिहाई का निर्देश दिया था, उसे भी उक्त मल्टी-करोड़ के सोने की तस्करी के मामले में गिरफ्तार किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

डीआरआई के अनुसार एक सिंडिकेट वर्ष 2016 से भारत में सोने की तस्करी कर रहा है और 200 मिलियन से अधिक विदेशी मूल का सोना भारत में लाया गया है,जिसकी कीमत 60 करोड़ है, जिसे निसार अलियार 26 मार्च, 2019 को एक कंटेनर के जरिए लाया था।

इस कंटेनर में धातु स्क्रैप आयात करके लाई गई थी,जिसके अंदर सोने को छिपाकर लाया गया था। इसी का कुछ हिस्सा डीआरआई ने जब्त किया था। इस गिरोह ने जुलाई, 2018 से मार्च, 2019 के बीच 3000 किलोग्राम से अधिक सोने की तस्करी की थी। जिसकी कीमत 1000 करोड़ रुपये से अधिक होगी।

हैप्पी धाकड़ को 29 मार्च, 2019 को सीमा शुल्क अधिनियम या कस्टम एक्ट, 1962 की धारा 104 के तहत गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद, हालांकि, शुरूआत में उसकी जमानत याचिका को खारिज कर दिया गया था, लेकिन बाद में उसे वैधानिक भूल जमानत या स्टैचुटोरी डिफॉल्ट बेल दी गई थी।

विदेशी मुद्रा के संरक्षण और तस्करी गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम (सीओएफईपीओएसए) के तहत कार्रवाई को सलाहकार बोर्ड द्वारा स्थिर नहीं पाया गया था और इसलिए उसे रिहा कर दिया गया था। हालाँकि उसके पिता मेसर्स एकदंत कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड में निदेशक थे, लेकिन हैप्पी धाकड़ एकदंत की सभी गतिविधियों को देखते थे। वर्तमान याचिकाकर्ता एकदंत का कर्मचारी था।

डीआरआई ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने मेसर्स एकदंत की ओर से सोने की तस्करी की थी। उक्त तथ्य डीआरआई के खुफिया अधिकारी के 28 अगस्त, 2019 के गिरफ्तारी के ज्ञापन से भी प्रतिबिंबित होता है या दिखाई पड़ता है।

याचिकाकर्ता के अनुसार, 27 अगस्त, 2019 को शाम को लगभग 6ः30 बजे, डीआरआई ऑफिसर्स ने, ''अपनी पहचान का खुलासा किए बिना, याचिकाकर्ता को उदयपुर, राजस्थान के एक कार्यालय से गिरफ्तार कर लिया''जहां वह वर्तमान में कार्यरत है। याचिका में कहा गया है-

''अधिकारियों ने कोई भी बैज नहीं पहना था और न ही उनके पास पहचान पत्र थे।

याचिकाकर्ता को उदयपुर में रात को लगभग 9ः45 बजे एक अज्ञात गंतव्य पर ले जाया गया था, न ही याचिकाकर्ता को औपचारिक गिरफ्तारी का कोई ज्ञापन सौंपा गया। न ही उसे ट्रांजिट रिमांड पर लेने के लिए किसी भी अदालत में पेश किया गया था। इस न्यायालय द्वारा पारित आदेशों के बावजूद भी याचिकाकर्ता से अधिवक्ता की अनुपस्थिति में पूछताछ की गई थी।''

दलीलें

याचिकाकर्ता के लिए एडवोकेट सेबीन जोसेफ पेश हुई और तर्क दिया कि डीआरआई अधिकारियों के कहने पर याचिकाकर्ता को 27 अगस्त को अवैध रूप से गिरफ्तार किया गया था और हिरासत में रखा गया था। जबकि ट्रांजिट रिमांड भी प्राप्त नहीं किया गया। याचिकाकर्ता को 28 अगस्त को जबरन डीआरआई के उदयपुर कार्यालय से मुंबई डीआरआई कार्यालय ले जाया गया।

ट्रायल कोर्ट में रिमांड का विरोध करते हुए आवेदन दायर किया गया था,याचिकाकर्ता की अवैध गिरफ्तार हुई और 24 घंटे के भीतर याचिकाकर्ता को अदालत में पेश नहीं किया गया, ट्रांजिट रिमांड प्राप्त न करना, इन तथ्य के बावजूद भी मजिस्ट्रेट ने यंत्रवत् रूप से आदेश पारित करते हुए रिमांड पर भेज दिया। जोसेफ ने अपनी दलीलें के समर्थन में 18 फैसलों का हवाला दिया। जिनमें बॉम्बे हाईकोर्ट के एक सितम्बर माह का आदेश भी शामिल था।

जबकि, विशेष लोक अभियोजक जितेंद्र मिश्रा ने यूनियन ऑफ़ इंडिया और डीआरआई के जांच अधिकारी की तरफ से पेश हुए। मिश्रा ने अपनी दलीलों के समर्थन में कुल 11 निर्णयों पर भरोसा किया। उन्होंने तर्क दिया कि हेबियस कॉर्पस सुनवाई करने योग्य नहीं है, क्योंकि याचिका दायर करने की तारीख के बाद, सक्षम न्यायालय ने हिरासत की रिमांड को अधिकृत कर दिया था।

उन्होंने आगे कहा कि भले ही तर्क के लिए, यह एक क्षण के लिए स्वीकार किया जाता है कि याचिकाकर्ता को उदयपुर के डीआरआई के कार्यालय से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि याचिकाकर्ता को गिरफ्तार और हिरासत में लिया गया था। यह तर्क दिया गया कि प्रारंभिक चरण में हिरासत की कार्रवाई बाद की हिरासत को अमान्य नहीं कर सकती है, जिसे सक्षम न्यायालय द्वारा अधिकृत किया गया था।

डीआरआई अधिकारियों ने अपने अतिरिक्त हलफनामे में फिर से दोहराया कि मुंबई में डीआरआई द्वारा 185 किलोग्राम तस्करी का सोना जब्त किए जाने के संबंध में याचिकाकर्ता से पूछताछ की गई थी। एसपीपी मिश्रा ने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए हैं और अभियोजन एजेंसी के पास याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी को सही ठहराने के लिए प्रासंगिक सामग्री या तथ्य है।

कोर्ट का फैसला

शुरू में, कोर्ट ने कहा- ''कोई विवाद नहीं है कि ए.सी.एम.एम ने समय-समय पर रिमांड के आदेश पारित किए हैं और याचिकाकर्ता को सक्षम न्यायालय द्वारा पारित रिमांड आदेशों का पालन करते हुए हिरासत में रखा गया।''

सौरभ कुमार (सुप्रा), साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर बनाम महाराष्ट्र राज्य, 2011 और छगन भुजबल बनाम भारत के संघ, २०१६ मामलों में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को देखने के बाद पीठ ने कहा कि-

''मामले के समग्र तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए और सोने की तस्करी के मल्टी-करोड़ घोटाले में याचिकाकर्ता की भागीदारी के बारे में गंभीर आरोपों के मद्देनजर जिसमें याचिकाकर्ता ने सक्रिय रूप से भाग लिया है, हम अपने अधिकार या विवेक का प्रयोग करके याचिकाकर्ता के पक्ष में हैबियास कॉर्पस की रिट जारी करने के लिए इच्छुक नहीं हैं। याचिकाकर्ता के पास जमानत आवेदन दाखिल करने और सक्षम अदालत के समक्ष नियमित जमानत मांगने का प्रभावकारी उपाय है।

माननीय उच्चतम न्यायालय व इस न्यायालय के अधिकारियों द्वारा निर्धारित कानूनी स्थिति यह स्पष्ट करती है कि भले ही रिमांड का आदेश अवैध हो, जिसे यांत्रिक रूप से एक लापरवाह पूर्ण शैली में पारित किया गया हो, फिर भी हैबियस कॉर्पस के रिट का उपाय कोई प्रभावशाली उपाय नहीं कहा जा सकता है। लेकिन माननीय उच्चतम न्यायालय की शर्तों या नियमों के अनुसार ऐसी परिस्थितियों में जमानत अर्जी दाखिल करना उचित उपाय है।''

स प्रकार, याचिका खारिज कर दी गई थी।


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