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सुनिश्चित करें कि सभी पुलिस स्टेशनों में यौन उत्पीड़न पीड़ितों की सहायता के लिए वकीलों का पैनल हो: गुजरात हाईकोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया

LiveLaw News Network
24 Feb 2022 6:30 AM GMT
सुनिश्चित करें कि सभी पुलिस स्टेशनों में यौन उत्पीड़न पीड़ितों की सहायता के लिए वकीलों का पैनल हो: गुजरात हाईकोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया
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गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में गुजरात राज्य के पुलिस महानिदेशक को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि राज्य के सभी पुलिस स्टेशनों में सुप्रीम कोर्ट के 1995 के फैसला में दिए गए निर्देशों के अनुसार यौन उत्पीड़न अपराधों के पीड़ितों की सहायता के लिए वकीलों का एक पैनल हो।

जस्टिस सोनिया गोकानी और जस्टिस अनिरुद्ध पी. माई की खंडपीठ ने यह आदेश जारी किया कि सुप्रीम कोर्ट ने अन्य बातों के साथ-साथ दिल्ली घरेलू कामकाजी महिला मंच बनाम भारत संघ [(1995) 1 एससीसी 14] में निम्नलिखित 4 निर्देश जारी किए थे। इनका भी गुजरात राज्य में पालन नहीं किया जा रहा है-

1. यौन उत्पीड़न के मामलों के शिकायतकर्ताओं को कानूनी प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाना चाहिए। किसी ऐसे व्यक्ति का होना महत्वपूर्ण है जो आपराधिक न्याय प्रणाली से अच्छी तरह परिचित हो। पीड़िता के वकील की भूमिका न केवल पीड़ित को कार्यवाही की प्रकृति के बारे में समझाने, उसे मामले के लिए तैयार करने और पुलिस थाने और अदालत में उसकी सहायता करने की होगी, बल्कि उसे मार्गदर्शन प्रदान करने की भी होगी। अन्य एजेंसियों से भिन्न प्रकृति की सहायता लेना भी शामिल होगा। उदाहरण के लिए मानसिक परामर्श या चिकित्सा सहायता आदि। यह सुनिश्चित करके सहायता की निरंतरता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि वही व्यक्ति जो थाने में शिकायतकर्ता के हितों की देखभाल करता है, मामले के अंत तक उसका प्रतिनिधित्व करे।

2. पुलिस थाने में कानूनी सहायता प्रदान करनी होगी, क्योंकि यौन उत्पीड़न की पीड़िता पुलिस थाने में आने पर बहुत परेशान स्थिति में हो सकती है। इस स्तर पर पुलिस द्वारा पूछताछ के दौरान एक वकील का मार्गदर्शन और समर्थन उसकी बहुत मदद करेगा।

3. पुलिस का यह कर्तव्य होना चाहिए कि वह पीड़िता से कोई भी प्रश्न पूछे जाने से पहले उसके प्रतिनिधित्व के अधिकार के बारे में उसे सूचित करे। पुलिस रिपोर्ट में कहा जाए कि पीड़िता को इस तरह की जानकारी दी गई है।

4. इन मामलों में कार्रवाई करने के इच्छुक अधिवक्ताओं की सूची उन पीड़ितों के लिए पुलिस थाने में रखी जानी चाहिए जिनके दिमाग में कोई विशेष वकील नहीं है या जिनका अपना वकील उपलब्ध नहीं है।

इन निर्देशों को ध्यान में रखते हुए कहा कि पुलिस थानों में पैनल में शामिल अधिवक्ताओं की कोई सूची नहीं है। न्यायालय ने पुलिस महानिदेशक को राज्य के प्रत्येक पुलिस स्टेशन के लिए आवश्यक सर्कुलर/निर्देश/अधिसूचना जारी करने का निर्देश दिया ताकि ऐसे व्यक्तियों की सूची तैयार की जा सके।

अदालत ने छह सप्ताह के बाद पुलिस महानिदेशक द्वारा निर्देशों के उचित कार्यान्वयन के लिए इस न्यायालय के समक्ष एक हलफनामा दायर करने को भी कहा।

मामले की पृष्ठभूमि

बेंच एक नाबालिग लड़की के परिवार द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस लड़की का कथित रूप से अपहरण कर लिया गया था और उसके बाद उसका यौन शोषण किया गया। उसे बचाए जाने के बाद वह 10 सप्ताह की गर्भवती पाई गई। इसलिए, अदालत ने पीड़िता और उसके परिवार के साथ परामर्श करने के बाद भ्रूण को समाप्त करने का आदेश जारी किया।

अदालत ने यह देखते हुए आदेश जारी किया कि वह बहुत छोटी है और पोक्सो अधिनियम के तहत बलात्कार और पीड़िता की शिकार है, इसलिए अदालत ने उसके गर्भ को समाप्त करने के अनुरोध पर विचार करना उचित समझा।

तत्पश्चात, उसे 17 फरवरी को अदालत में लाया गया, जब अदालत ने जांच अधिकारी के साथ-साथ पूर्णकालिक सचिव, जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण को विशेषज्ञों के अंत में पीड़िता की समय-समय पर परामर्श सुनिश्चित करने का आदेश दिया।

इसके अलावा, जब अदालत ने पीड़िता के लिए कानूनी सहायता के बारे में जांच अधिकारी से पूछताछ की तो उसने अपनी अज्ञानता की दलील दी। इसलिए, सुप्रीम कोर्ट के 1995 के निर्देशों का हवाला देते हुए कोर्ट ने डीजीपी को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया कि राज्य के सभी पुलिस स्टेशनों में वकीलों का पैनल बनाया जाए।

मामले में अधिवक्ता की नियुक्ति के संबंध में पूर्णकालिक सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, मेहसाणा को शीघ्र कार्यवाही कर न्यायालय में रिपोर्ट करने को कहा गया। इसी के साथ याचिका का निस्तारण कर दिया गया।

केस का शीर्षक - जे. वी. गुजरात राज्य (जानबूझकर छुपाया गया नाम)

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