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घरेलू हिंसा अधिनियम और वरिष्ठ नागरिक अधिनियमः दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों कानूनों के तहत दावों को संतुलित करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए

LiveLaw News Network
8 Dec 2019 12:45 PM GMT
घरेलू हिंसा अधिनियम और वरिष्ठ नागरिक अधिनियमः दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों कानूनों के तहत  दावों को संतुलित करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए
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घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 और माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरणपोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत किए जाने वाले प्रतिस्पर्धा के दावों या विपरीत दावों को ध्यान में रखते हुए, दिल्ली उच्च न्यायालय ने इनके बीच संतुलन बनाने के लिए कुछ दिशानिर्देश जारी किए हैं।

विनय वर्मा बनाम कनिका पसरीचा और एक अन्य के मामले में न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह ने कहा कि कई मामलों में साझा घर में रहने के लिए बहू का दावा ,अक्सर अपने घर के विशेष अधिकार के लिए ससुराल वालों के अधिकार का विरोधाभासी हो जाता है।

न्यायाधीश ने आम तौर पर ऐसे मामलों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया है-

मामलों की पहली श्रेणी वह है जिसमें माता-पिता/ ससुराल वालों की संयुक्त रूप से पुत्र और पुत्रवधू के साथ या तो व्यक्तिगत रूप से कठोरता या कटुता या रूखापन विकसित हो जाता है। जिसके परिणामस्वरूप माता-पिता/ ससुराल वाले अकेले घर में निवास के अधिकार के लिए कब्जे और निषेधाज्ञा के रूप में या बेटे/ बहू को बेदखल करने की मांग करते हैं।

मामलों की दूसरी श्रेणी वह है, जहां बेटे और बहू के बीच अनबन होती है और या तो बेटे की मिलीभगत के साथ या अन्यथा, बहू को बाहर निकालने का प्रयास किया जाता है।

तीसरी श्रेणी के मामलों में बेटा वास्तव में घर से बाहर चला जाता है और एक अलग घर में रहता है। हालांकि, वैकल्पिक आवास की कमी या अन्यथा कारण से बहू ससुराल से स्थानांतरित करने या जाने से इनकार कर देती है।

अदालत ने कहा कि

''जबकि, बहू के घर में रहने का अधिकार और उसके सिर पर छत होना बेहद जरूरी है, वहीं माता-पिता को अपनी संपत्ति का आनंद लेने और उसी से आय अर्जित करने का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अदालत के समक्ष बहुपक्षीय स्थिति हो सकती है, जहां न्यायालय को यह निर्णय लेना होता है कि किसके अधिकार को दूसरे के अधिकार से अधिक तरजीह दी जानी चाहिए या किसका अधिकार ज्यादा महत्वपूर्ण है।''

अदालत ने कहा कि

''कई मामलों में इन अधिकारों का एक-दूसरे के साथ संघर्ष हो जाता है, जिस कारण इन्होंने आपराधिक और सिविल न्यायालयों में मामलों की बाढ़ ला दी है।''

इन मामलों को देखते हुए न्यायालय ने कुछ व्यापक दिशा-निर्देश तय किए हैं, जिनका इस तरह के प्रतिस्पर्धात्मक दावों के मामलों में निर्णय करते समय पालन किया जाना है।

1. न्यायालय/ न्यायाधिकरण को पहले पक्षकारों और पुत्र/ पुत्री के परिवार के बीच संबंधों की प्रकृति का पता लगाना चाहिए।

2. यदि मामले में बहू को बेदखल करना शामिल है, तो अदालत को यह भी पता लगाना होगा कि बहू एक संयुक्त परिवार के हिस्से के रूप में रह रही थी या नहीं।

3. यदि रिश्ता कटुतापूर्ण या उग्रता का है, तो माता-पिता को अपने परिसर या घर से बेटे /बहू या बेटी/दामाद को निष्कासित करने की अनुमति देनी चाहिए। ऐसी परिस्थितियों में, डीवी अधिनियम के तहत सिद्धांतों के अनुसार पत्नी के रख-रखाव के लिए पति का दायित्व बना रहेगा।

4. यदि माता-पिता और पुत्र के बीच का संबंध शांतिपूर्ण है या यदि माता-पिता अपने पुत्र के साथ अच्छे संबंध बनाए हुए हैं या मिलीभगत कर रहे हैं, तो, बहू के लिए आश्रय बनाए रखने और प्रदान करने का दायित्व पति व सास-ससुर,दोनों पर रहेगा, खासकर अगर वे एक संयुक्त परिवार के हिस्से के रूप में रह रहे थे। ऐसी स्थिति में, अगर माता-पिता को अपनी संपत्ति से बहू को बेदखल करने का हक दिया जाएगा , तो उन्हें बहू को एक वैकल्पिक उचित आवास उपलब्ध कराना होगा।

5. यदि बेटा या उसका परिवार माता-पिता के साथ बुरा व्यवहार कर रहा है तो माता-पिता उनको अपनी संपत्ति से बिना शर्त बेदखल करने के हकदार होंगे ताकि वे एक शांतिपूर्ण जीवन जी सकें और संपत्ति को अपनी आय व दैनिक जीवन यापन के स्वयं के खर्च पूरे करने के लिए उपयोग कर सकते हैं।

6. यदि बेटे ने माता-पिता और अपनी पत्नी/ बच्चों, दोनों को ही छोड़ दिया है,वहीं अगर बेटे का परिवार से रिश्ता टूटने से पहले वह एक संयुक्त परिवार के हिस्से के रूप में रह रहे थे, तो माता-पिता अपनी बहू से कब्जा वापिस पाने के हकदार होंगे,लेकिन, एक उचित अवधि के लिए, उन्हें उस समय तक बहू को कुछ आश्रय देना होगा, जब तक वह अपने पति के खिलाफ केस दायर कर राहत या रख-रखाव या भरणपोषण नहीं पा लेती है।

ये दिशा-निर्देश एक सिविल सूट के मामले में दायर अपील पर सुनवाई के बाद जारी किए गए हैं। वरिष्ठ नागरिकों ने सिविल सूट दायर करके अपनी बहू को घर से बेदखल करने की मांग की थी। इस मामले में घर पति के नाना का था।

दूसरे शब्दों में, पत्नी के ससुराल वाले घर के मालिक नहीं थे। इसलिए, न्यायालय ने पाया कि यह घर डीवी अधिनियम की धारा 2 (एस) के तहत ''साझा घर'' नहीं था।

कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों के अधिकारों को संतुलित करने के लिए आदेश पारित करना आवश्यक था। माता-पिता को बहू को बेदखल करने की अनुमति दी गई थी, लेकिन इस शर्त पर की उन्हें बहू को मासिक 50000 रुपये का भुगतान करना होगा ताकि उसे वैकल्पिक आवास खोजने में सक्षम बनाया जा सकें।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि उच्चतम न्यायालय लंबित अपीलों में समान मुद्दों पर विचार कर रहा है, न्यायालय ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 133 (1) (ए) और 134 ए के तहत अपील के लिए प्रमाण पत्र प्रदान किया है।

जस्टिस सिंह ने कहा कि-हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने एस.आर.बत्रा और अन्य बनाम तरुण बत्रा मामले में 2007 में दिए एक फैसले में ''साझा घर या गृहस्थी'' को परिभाषित करने के लिए सिद्धांतों को निर्धारित किया था।

हालांकि इस मामले में न्यायालय के पास वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के प्रभाव पर विचार करने का कोई अवसर नहीं था। जस्टिस प्रतिभा सिंह ने अपने फैसले में कहा कि इसके बाद, कई उच्च न्यायालय ने निवास के लिए पत्नी के दावे के संबंध में इस मुद्दे पर अलग-अलग विचार रखे, जहां वैवाहिक घर ससुराल वालों से संबंधित नहीं था।

आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहांं क्लिक करेंं



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