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जब सेना के अधिकारी को घरेलू काम के दौरान चोट लगी हो तो विकलांगता पेंशन स्वीकार्य नहीं, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

LiveLaw News Network
22 Sep 2019 3:56 AM GMT
जब सेना के अधिकारी को घरेलू काम के दौरान चोट लगी हो तो विकलांगता पेंशन स्वीकार्य नहीं, सुप्रीम कोर्ट का फैसला
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''विकलांगता पेंशन केवल तभी स्वीकार्य है जब चोट या तो सैन्य सेवा के कारण लगती है या उससे सम्बंधित किसी कारण से बढ़ जाती है।''

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि एक सैन्य अधिकारी विकलांगता पेंशन का हकदार केवल तभी है, जब विकलांगता के लिए सैन्य सेवा जिम्मेदार है। इस तर्क के साथ जस्टिस एल नागेश्वर राव और हेमंत गुप्ता की पीठ ने सशस्त्र बल ट्रिब्यूनल (चंडीगढ़ पीठ) के फैसले को रद्द कर दिया है। ट्रिब्यूनल ने घरेलू सामग्री खरीदने के लिए स्कूटर पर जाते समय दुर्घटना में घायल होने पर एक अधिकारी को विकलांगता पेंशन देने का आदेश दिया था।

इस मामले " सचिव भारत सरकार बनाम धर्मबीर सिंह" में अधिकारी दुर्घटना के समय अवकाश पर था। एएफटी के फैसले के खिलाफ रक्षा मंत्रालय ने अपील दायर की थी, जिसे स्वीकारते हुए पीठ ने कहा कि

"विकलांगता पेंशन केवल तभी स्वीकार्य है जब चोट या तो सैन्य सेवा के कारण लगी है या सैन्य सेवा के कारण से बढ़ जाती है, किसी ऐसी गतिविधि के कारण नहीं,जो असैनिक हो या गैर-सैन्य हो। चूंकि दुर्घटना तब हुई है जब प्रतिवादी घरेलू सामग्री खरीद रहा था, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि चोट और सैन्य सेवा के बीच कोई प्रयोजनार्थक (causal) संबंध है।"

न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता द्वारा लिखित निर्णय में कहा गया,

"ऐसे मामलों में निर्धारण कारक दुर्घटना और सैन्य कर्तव्यों के बीच एक प्रयोजनार्थक संबंध है। चोट या मृत्यु का सैन्य सेवा के साथ संबंध होना चाहिए, चाहे भले ही वह दूर का हो। चोट या मृत्यु सशस्त्र सेवा के कारण होनी चाहिए न कि एक दुर्घटना के कारण, जिसे मानव के लिए सामान्य जोखिम माना जा सकता है। जब कोई व्यक्ति घर की सामग्री खरीदने के लिए स्कूटर पर जा रहा होता है, तो ऐसी गतिविधि का,यहां तक कि दूरस्थ रूप से भी, सैन्य सेवा के साथ कोई प्रयोजनार्थक संबंध नहीं है।''

जब सैन्य अधिकारी छुट्टी पर हो-

हालांकि अदालत ने कहा कि एक सैन्य अधिकारी को लगी चोट विकलांगता पेंशन के लिए स्वीकार्य होगी, अगर उस पर हमला इसलिए किया गया हो क्योंकि वह सशस्त्र बलों का सदस्य है या उस पर हमला सशस्त्र बलों के सदस्य के रूप में उसकी स्थिति के आधार पर हुआ हो।

एंटाइटल्मन्ट रूल्स फॉर कैजुअल्टी पेंशनरी अवार्ड्स, 1982 के नियम 12 के खंड (एफ) के संदर्भ में, एक दुर्घटना को सेवा के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है,भले ही एक आदमी साफ़ तौर पर (strictly) 'ड्यूटी' पर न हो,जैसा कि परिभाषित किया गया है, बशर्ते कि इसमें वह जोखिम शामिल हो जो निश्चित रूप से उसकी सेवा की प्रकृति, स्थितियों, दायित्वों या घटनाओं के कारण बढ़ जाते हैं और इस तरह के जोखिम को भारत में आधुनिक परिस्थितियों में मानव अस्तित्व के लिए एक आम जोखिम ना माना जा सके।

इसलिए, यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति द्वारा इसलिए घायल कर दिया जाता है या मार दिया जाता है, क्योंकि उसका संबंध सशस्त्र बलों से है, तो उसे ' ड्यूटी ' पर माना जाएगा। हालांकि, इस मामले में, अधिकारी को चोट तब लगी थी,जब वह अपने घर के कामों के लिए जा रहा था। इस मामले में राहत देने के लिए एएफटी ने 'मदन सिंह शेखावत बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य' के मामले का हवाला दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि उस फैसले को इस आधार पर इस मामले से अलग बताया कि उस मामले में अधिकारी को छुट्टी पर जाते समय चोट लगी थी। रूल्स 1982 के नियम 12 नोट 2 (डी) के साथ-साथ विनियमन 423 (क) को पढ़ने या देखने के बाद पाया गया कि ड्यूटी से लौटते समय या ड्यूटी पर जाते समय किसी भी चोट या मृत्यु का सैन्य सेवा के साथ एक प्रयोजनार्थक संबंध है और इस प्रकार कि चोट या मृत्यु को सैन्य सेवा के कारण लगी चोट या मृत्यु माना जाता है।

इस फैसले में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा 'जगतार सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य' के मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया गया है। जो इस प्रकार है-

एक व्यक्ति जो घर पर कुछ कार्य कर रहा है, जो दूर से भी उसके बतौर सैन्यकर्मी के कर्तव्यों और कार्यों के दायरे में नहीं आता है, न ही किसी भी रूप में सैन्य सेवाओं से कार्यों से उसका संबंध है, ऐसे काम के कारण लगी चोट या विकलांगता को सैन्य सेवा के कारण लगी चोट या विकलांगता नहीं माना जा सकता है।

सशस्त्र बल के एक सदस्य के साथ हुई दुर्घटना या चोट का सैन्य सेवा के साथ कुछ प्रयोजनार्थक संबंध होना चाहिए और कम से कम बल के सदस्य की ऐसी गतिविधि इसलिए उत्पन्न हुई हो क्योंकि बल के सदस्य के रूप में उससे अपने दैनिक जीवन में इस तरह की गतिविधि को बनाए रखने या करने की उम्मीद की जाती है।

विकलांगता किसी ऐसी दुर्घटना का परिणाम नहीं होनी चाहिए,जिसे भारत में आधुनिक परिस्थितियों में मानव अस्तित्व के लिए आम जोखिम माना जाता है, बशर्तें इस तरह के जोखिम को सैन्य सेवाओं की प्रकृति, परिस्थितियों, दायित्वों के कारण बढ़ाया न गया हो।



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