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दिल्ली हाईकोर्ट ने अंतरराज्यीय पुलिस गिरफ़्तारी के लिए निर्देशों पर अमल का आदेश दिया

LiveLaw News Network
17 Jan 2020 2:45 AM GMT
दिल्ली हाईकोर्ट ने अंतरराज्यीय पुलिस गिरफ़्तारी के लिए निर्देशों पर अमल का आदेश दिया
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दिल्ली हाईकोर्ट ने एक राज्य की पुलिस द्वारा दूसरे राज्य में मामले की जांच के सिलसिले में गिरफ़्तारी को लेकर निर्देश जारी किए।

न्यायमूर्ति मुरलीधर और न्यायमूर्ति तलवंत सिंह की पीठ ने दिल्ली पुलिस से कहा कि वह इस बारे में न्यायमूर्ति एसपी गर्ग की अध्यक्षता में गठित समिति के सुझावों को लागू करे।

वर्तमान मामला एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा है जो संविधान कि धारा 226 के तहत दायर की गई है। याचिकाकर्ता संदीप कुमार ने याचिका दायर कर पुलिस से अपनी पत्नी निशा को अदालत के समक्ष पेश करने की माँग की है।

संदीप और निशा ने हिंदू विवाह क़ानून के तहत शादी की। शादी से पहले निशा मुस्लिम थी और धर्म परिवर्तन कर वह हिंदू बन गई थी। शादी के बाद निशा के पिता इस जोड़े के जेएनयू स्थित निवास पर गए दोनों को धमकी दी।

2 जुलाई 2018 को पुलिस जेएनयू जाकर निशा को ज़बरन उसके घर से उठाकर ले गई और याचिकाकर्ता को आम लोगों के हवाले कर दिया। उसे ग़ाज़ियाबाद ले जाया गया जहां उसे पुलिस हिरासत में तीन दिनों तक रखा गया, जहां उसकी पिटाई भी की गई। उसने कहा कि लोनी पुलिस थाने के एसआई शरद कांत शर्मा ने उसे धमकी दी कि अगर वह निशा से दुबारा मिलने की कोशिश की तो उसके ख़िलाफ़ बलात्कार का मामला दायर कर दिया जाएगा। बाद में पता चला कि निशा के भाई ने लोनी पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी।

स्थिति रिपोर्ट में कहा गया कि निशा ने संबंधित अदालत में पेश किए जाने पर कहा कि बहन से झगड़ा होने के कारण वह अपने घर से भाग आई थी और अब वह अपनी इच्छा से घर वापस आ चुकी है। निशा जब अदालत में पेश हुई तो उसने कहा कि वह याचिकाकर्ता के पास वापस जाने के लिए तैयार है। उसने स्वीकार किया कि उसने याचिकाकर्ता संदीप से शादी की है।

4 अगस्त को अदालत ने इस मामले में लोनी और वसंत कुंज पुलिस थाने की भूमिका की जांच के लिए एक कमिटी गठित की और इसकी जांच दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज एसपी गर्ग को सौंपी गई।

इस रिपोर्ट के मिलने के बाद अदालत ने उत्तर प्रदेश और दिल्ली के संबंधित पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने को कहा। पुलिस अधिकारी को जब ऐसा कुछ करने को कहा गया तो उसे कार्रवाई करने जाने से पहले अपने वरिष्ठ अधिकारी से लिखित या फ़ोन पर अनुमति लेनी चाहिए थी।

गिरफ़्तारी के कारण भी उसे पूरे तथ्यों के साथ लिखित में बताना चाहिए था। पहले उसे गिरफ़्तारी के लिए संबंधित मजिस्ट्रेट से सीआरपीसी की धारा 78 & 79 के तहत अनुमति लेनी चाहिए थी।

राज्य के बाहर कार्रवाई करने से पहले पुलिस अधिकारी को अपने दैनिक डायरी में अपने जाने के बारे में विस्तार से बताना चाहिए। इसमें पुलिस अधिकारी का नाम और उसके साथ जानेवाले निजी व्यक्ति के नाम का उल्लेख होना चाहिए। इसके अलावा वाहन का नम्बर, जाने का कारण, किस विशेष जगह जाना है और जाने का समय और तिथि।

अगर किसी महिला को गिरफ़्तार किया जाना है तो पुलिस अधिकारी के साथ एक महिला पुलिस अधिकारी भी होना चाहिए। पुलिस अधिकारियों के साथ उनका पहचानपत्र भी होना चाहिए और यह ज़रूरी है कि वे यूनीफ़ॉर्म में हों और उनके नाम, पद स्पष्ट होने चाहिए।

किसी अन्य राज्य में जाने से पहले वहां जानेवाले पुलिस अधिकारी को स्थानीय पुलिस थाने से संपर्क करना चाहिए जिसके अधिकार क्षेत्र में जांच का क्षेत्र शामिल है। उसे अपने साथ शिकायत एफआईआर की अनूदित कॉपी अन्य दस्तावेज़ों के साथ ले जानी चाहिए। संबंधित पुलिस थाने को उसे अपने आने और मदद लेने का मक़सद बताना चाहिए। स्थानीय पुलिस थाने में इस बारे में यह सब मामला दर्ज होना चाहिए।

जांच स्थल पर पड़ोस के आम गवाहों को शामिल किया जाना चाहिए। अगर गिरफ़्तारी की जाती है तो पुलिस अधिकारी को सीआरपीसी की धारा 41A, 41B, 50 और 51 के तहत प्रक्रिया का पलान करना चाहिए जैसा कि डीके बसु मामले में निर्धारित किया गया है।

गिरफ़्तार किए गए व्यक्ति को दूसरे राज्य ले जाने से पहले अपने वक़ील से सलाह लेने का मौक़ा अवश्य ही दिया जाना चाहिए। वापसी में पुलिस अधिकारी को स्थानीय पुलिस थाने में उस व्यक्ति का नाम, पता दैनिक डायरी में दर्ज करना चाहिए जिसे यहाँ से गिरफ़्तार कर ले जाया जा रहा है। पीड़ित का नाम भी लिखा जाना चाहिए।

गिरफ़्तार किए गए व्यक्ति को ले जाने के लिए सबसे नज़दीकी मजिस्ट्रेट से इसकी अनुमति लेनी चाहिए और 24 घंटे के भीतर उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना चाहिए। जिस मजिस्ट्रेट के समक्ष इस गिरफ़्तार व्यक्ति को पेश किया जा रहा है उनके इस बात से संतुष्ट होना चाहिए कि इस व्यक्ति को ट्रैंज़िट रिमांड पर ले जाना ज़रूरी है। उसे यांत्रवत इसकी अनुमति नहीं देनी चाहिए। ट्रैंज़िट पर किसी आरोपी को ले जाने की अनुमति देना एक न्यायिक प्रक्रिया है और यह अनुच्छेद 22(1 के अनुरूप होना चाहिए।

राज्य के पुलिस कंट्रोल रूप को गिरफ़्तार किए गए व्यक्ति के नाम और पते एवं पुलिस अधिकारी के पद के बारे में जानकारी होनी चाहिए। पुलिस अधिकारी को गिरफ़्तारी के बारे में पूरी प्रक्रिया का 'गिरफ़्तारी मेमो' तैयार करना चाहिए जिसमें इस बारे में पूरी जानकारी हो। अन्य सभी ज़रूरी बातों के साथ-साथ गिरफ़्तारी का कारण भी बताया जाना चाहिए। चूंकि उसे अपने घर से दूर ले जाया जा रहा है जाहां उसका कोई जाननेवाला नहीं हो, सो उसे अपने परिवार के सदस्य/रिश्तेदार को अपने साथ ले जाने की अनुमति दी जानी चाहिए जो उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने के समय तक उसके पास रहे।

पुलिस थाने पर पहुंचने के बाद पुलिस अधिकारी को रेकर्ड में शीघ्र एंट्री करनी चाहिए जिसमें कि गई जांच का ब्योरा हो जिसमें गिरफ़्तार किए गए व्यक्ति का पूरा विवरण शामिल होना चाहिए।उसे अपने वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को भी अपनी जाँच के बारे में बताना चाहिए। वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को इस मामले की ख़ुद निगरानी करनी चाहिए।

गिरफ़्तार किए गए व्यक्ति की गिरफ़्तारी के बाद तुरंत उसकी मेडिकल जाँच कराई जानी चाहिए। जाँच अधिकारी को मामले की एक डायरी भी लिखनी चाहिए जिसमें जांच का पूरा व्योरा होना चाहिए।

गिरफ़्तार व्यक्ति को लाने कि लिए जिस वाहन का इस्तेमाल हुआ उसका लॉग बुक लिखा जाना चाहिए और उस पर हस्ताक्षर होना चाहिए। जाँच अधिकारी को यह स्पष्ट करना चाहिए कि प्रयुक्त वाहन सरकारी था या निजी; ड्राइवर कौन था और इसका प्रबंध किसने किया। आरोपी को लाने के लिए सिर्फ़ सरकारी वाहन का प्रयोग होना चाहिए।

गृह मंत्रालय/केंद्र सरकार/पुलिस आयुक्त को चाहिए कि इस तरह के कार्य को अंजाम देने वाले पुलिस अधिकारियों के बारे में उपयुक्त दिशानिर्देश जारी करे। दिशानिर्देशों का पालन नहीं करनेवाले अधिकारियों के ख़िलाफ़ विभागीय कार्यवाही का प्रावधान होना चाहिए और अदालत की अवमानना का भी।

लोक अभियोजक को चाहिए कि वह उसके राज्य का दौरा करनेवाले पुलिस अधिकारी को ज़रूरी मदद दे। अपनी ड्यूटी से लापरवाही बरतनेवाले पुलिस अधिकारी को क़ानून के अनुरूप मुआवज़ा देने का निर्देश दिया जाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को निशा और संदीप को ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से हिरासत में रखने के आरोप में प्रत्येक को 50-50 हज़ार रुपए का मुआवज़ा दिए जाने का आदेश दिया। यह राशि उन्हें चार सप्ताह के भीतर अपने पुलिस के आचरण के बारे में राज्य के पुलिस महानिदेशक के माफ़ीनामे के पत्र के साथ मिलना चाहिए।

अदालत ने पुलिस को 6 जुलाई 2020 को इस मामले पर अमल की रिपोर्ट दाख़िल करने को कहा है। इस आदेश की प्रति दिल्ली के सीपी और उत्तर प्रदेश के डीजीपी को भेजे जाने का आदेश दिया गया ताकि उनके ख़िलाफ़ उपयुक्त कार्रवाई की जा सके।

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