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वरिष्ठ वक़ील पर दोष लगाते हुए मामले पर पुनर्विचार चाहने वाले से दिल्ली हाईकोर्ट ने वसूला मुक़दमे का ख़र्च

LiveLaw News Network
2 Feb 2020 3:41 PM GMT
वरिष्ठ वक़ील पर दोष लगाते हुए मामले पर पुनर्विचार चाहने वाले से दिल्ली हाईकोर्ट ने वसूला मुक़दमे का ख़र्च
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दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि मामले की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई की अनुमति के तहत ही मिल सकती है न कि उस आधार पर जिसको बहस के दौरान याचिकाकर्ता ने आगे नहीं बढ़ाया।

न्यायमूर्ति सी हरि शंकर की एकल पीठ ने पुनर्विचार याचिका में 'आश्चर्यजनक' रूप से वरिष्ठ वक़ील पर दोष मढ़ा गया था। जज ने याचिकाकर्ता पर मुक़दमे के ख़र्च के रूप में ₹25,000 का जुर्माना भी लगाया।

याचिकाकर्ता ने न्यायमूर्ति शंकर द्वारा दिए गए एक फ़ैसले की पुनर्विचार याचिका दायर दी की थी और इस बारे में कहा था कि वरिष्ठ वक़ील ने ख़ुद ही मामले को उचित सरकार के इसी मुद्दे तक सीमित रखने का निर्णय लिया था न कि मामले के बारे में सभी पक्षों पर बहस करने का।

यह कहा गया कि वरिष्ठ वक़ील को याचिकाकर्ता ने मामले की दलील को वहीं तक सीमित रखने की सलाह नहीं दी गई थी और उनकी ग़लती की सज़ा याचिकाकर्ता को नहीं मिलनी चाहिए।

न्यायमूर्ति शंकर ने इसे 'स्वाद ख़राब करनेवाला' बताया और कहा कि जब सारी सुनवाई याचिकाकर्ता की मौजूदगी में हुई तो ऐसी स्थिति में वरिष्ठ वक़ील को क़सूरवार ठहराना उचित नहीं है। उन्होंने कहा -

"…इस अदालत की राय में जो दलील दी गई है वह अनुचित है और अदालत के बारे में पूर्व धारणा बना लेने जैसा है। यह न कवेल मेरिट बल्कि वरिष्ठ वक़ील की दलीलों पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है जिसे याचिकाकर्ता ने चुना था। इन बातों को देखते हुए जो कहा गया है वह ग़लत है और यह किसी भी दृष्टि से दमदार नहीं है और इंस्ट्रकटिंग वक़ील इंडेर जित सिंह अदालत में मौजूद थे और वे वरिष्ठ वक़ील को 27 अक्टूबर 2017 को निर्देश दे रहे थे जब इस मामले की सुनवाई हो रही थी।"

अदालत ने ब्रीफ़िंग करने वाले वक़ील से पूछा कि वरिष्ठ वक़ील के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों का वह कैसे समर्थन कर सकते हैं।

इस पर ब्रीफ़िंग वक़ील ने कहा कि वह इस स्थिति में नहीं होता कि वरिष्ठ वक़ील को क्या बोलना है इस बारे में उचित निर्देश दे सके क्योंकि उसे जो उचित लगता है उस हिसाब से दलील देता है।

अदालत ने पुनर्विचार याचिका को ख़ारिज करते हुए कहा -

"क़ानून में इसकी अनुमति नहीं है। वक़ील कि अनुमति अदालत को क़ानून की अवमानना करने का अधिकार नहीं दे सकता। पुनर्विचार का अधिकार बिना शर्त नहीं है और यह विधिसम्मत ही हो सकता है। जहाँ इसकी इजाज़त है, वहाँ इसका प्रयोग क़ानून के दायरे में ही सकता है।"

अदालत ने कहा कि किसी आदेश की पुनर्विचार कैसे हो सकती है यह सीपीसी की धारा 114 आदेश XLVII में दिया गया है। इसके अनुसार (i) अगर रिकॉर्ड को देखते हुए कोई ग़लती हुई हो (ii) कोई नया साक्ष्य सामने आया हो जिसके बारे में पहले कोई जानकारी नहीं थी और जिस वजह से इसे पहले पेश नहीं किया जा सका या (iii) कोई अन्य पर्याप्त कारण।

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