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दिल्ली हाईकोर्ट ने ड्राफ्ट ईआईए अधिसूचना 2020 पर आपत्तियां दर्ज करने की समय अवधि 11 अगस्त तक बढ़ाई

LiveLaw News Network
30 Jun 2020 7:32 AM GMT
दिल्ली हाईकोर्ट ने ड्राफ्ट ईआईए अधिसूचना 2020 पर आपत्तियां दर्ज  करने की समय अवधि  11 अगस्त तक बढ़ाई

दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार द्वारा पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना यानि ईआईए 2020 के ड्राफ्ट पर आपत्तियां दर्ज करने के लिए दी गई समय अवधि को 11 अगस्त तक बढ़ा दिया है।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा आपत्तियां दर्ज करवाने के लिए 30 जून तक की समय सीमा निर्धारित की गई थी।

फरवरी माह में मंत्रालय की तरफ से जारी अधिसूचना में मौजूद अस्पष्टता को ध्यान रखते हुए, मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति प्रतीक जलान की खंडपीठ ने इस मामले में दायर याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया है।

अदालत ने कहा कि 'सरकार की ओर से जारी की गई अधिसूचना में कुछ त्रुटि थी,इसलिए उस पर आपत्तियां दर्ज करने की नोटिस अवधि 60 दिनों के लिए बढ़ा दी गई थी।'

श्री तोंगड की तरफ से दायर इस याचिका में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना में दी गई नोटिस अवधि को चुनौती दी गई है। 23 मार्च को ईआईए नीति के मसौदे पर जनता को अपनी टिप्पणी और सुझाव भेजने के लिए नोटिस अवधि प्रदान की गई थी।

COVID19 लॉकडाउन के चलते एक एक्सटेंशन अधिसूचना पारित की गई थी, जिसके तहत नोटिस की अवधि को 30 जून तक बढ़ा दिया गया था। हालांकि, याचिकाकर्ता का मानना है कि COVID मामलों में अभी भी बढ़ोतरी हो रही है और प्रमुख शहरों में अभी भी प्रतिबंध जारी हैं,इसलिए यह अवधि 'अपर्याप्त' है।

उदाहरण के लिए याचिकाकर्ता ने बताया है कि दिल्ली और मुंबई में डाक सेवाएं अभी भी निलंबित हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, इस कारण काफी सारे लोग संबंधित मंत्रालय को अपनी आपत्तियाँ नहीं भेज पा रहे होंगे।

दलील दी गई है कि इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि जनता के पास सार्वजनिक नीति बनाने में भाग लेने और उस पर टिप्पणी करने का मौलिक अधिकार है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि यह मसौदा या ड्राफ्ट नीति केवल अंग्रेजी में उपलब्ध है,जो मसौदा नीति में जनता की सार्थक भागीदारी पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है।

याचिका में कहा गया है कि-

'इसके अलावा, अधिसूचना तक ऑनलाइन पहुंच भी नहीं है क्योंकि यह केवल अंग्रेजी में है और पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वेबसाइट पर प्रमुखता से पोस्ट भी नहीं की गई है। इसके अलावा विभिन्न राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की वेबसाइटों पर भी इसको पोस्ट नहीं किया गया है या न ही किसी भी राज्य की पर्यावरण विभाग की वेबसाइट पर। इसके परिणामस्वरूप जनता के सदस्य एक ऐसी मूल अधिसूचना पर अपनी टिप्पणी करने में असमर्थ हो रहे हैं जो पूरी तरह से मौजूदा पर्यावरण मानदंडों को बदल रही है।'

इसलिए याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की है कि संबंधित मंत्रालय को निर्देश दिया जाए कि वह एक उचित और सार्थक परामर्श की सुविधा उपलब्ध कराए। वहीं इस अधिसूचना को संविधान की आठवीं अनुसूची में दी गई सभी आधिकारिक भाषाओं में अनुवादित किया जाना चाहिए। इसके अलावा इस अधिसूचना को एमओईएफ और सीसी वेबसाइट के साथ-साथ केंद्र और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सभी राज्यों के पर्यावरण मंत्रालयों की वेबसाइट पर प्रमुखता से पोस्ट किया जाए।

याचिकाकर्ता ने आगे यह भी तर्क दिया है कि मसौदा नीति में कई विशेषताएं हैं, जैसे कि पोस्ट-फैक्टो क्लीयरेंस, सार्वजनिक परामर्श के समय में कमी आदि।इन सभी विशेषताओं पर बड़े पैमाने पर लोगों द्वारा विचार किया जाना या उन पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई जानी जरूरी है क्योंकि यह उनके अधिकारों को गंभीरता से प्रभावित करती हैं।

अदालत से हस्तक्षेप करने का आग्रह करते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि-

'वर्तमान याचिका भारत के नागरिकों के उन अधिकारों की रक्षा करने के लिए दायर की गई है,जिनकी गांरटी भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के साथ-साथ ईपी एक्ट 1986 के प्रावधानों और उसके विनियम के तहत दी गई है। जिसमें स्वच्छ पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य और उनके सामुदायिक भागीदारी के अधिकार शामिल हैं।'

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