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महिलाओं की घरेलू हिंसा से सुरक्षा के लिए अस्थाई सुरक्षा अधिकारी की नियुक्ति हो सकती है या नहीं? दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा

LiveLaw News Network
28 April 2020 3:00 AM GMT
महिलाओं की घरेलू हिंसा से सुरक्षा के लिए अस्थाई सुरक्षा अधिकारी की नियुक्ति हो सकती है या नहीं? दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा
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लॉकडाउन के दौरान महिलाओं के ख़िलाफ़ घरेलू हिंसा की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारी से पूछा है कि नियमित नियुक्ति होने तक अस्थाई सुरक्षा अधिकारियों की नियुक्ति की जा सकती है या नहीं।

केंद्र और दिल्ली सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों पर ग़ौर करते हुए न्यायमूर्ति डीएन पटेल और न्यायमूर्ति हरि शंकर की खंडपीठ ने कहा कि हेल्पलाइन पर जो कॉल का जवाब देते हैं उसे आम मुश्किलों की शिकायत का हल सुझाने में प्रशिक्षित होना चाहिए और इस तरह की व्यवस्था बनाने की ज़रूरत है ताकि इस मामले में तत्काल कार्रवाई की जा सके। अगर हेल्पलाइन पर बैठा व्यक्ति अक्षम है तो उसे बदला जाना चाहिए।

अदालत ने कहा,

"हम प्रतिवादी से उम्मीद करते हैं कि घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005 के प्रावधानों को प्रतिवादी प्रभावी ढंग से लागू करेंगे। इसमें जो व्हाट्सएप नंबर या हेल्पलाइन नंबर दिए गए हैं वे काम के हों और जो भी कॉल या संदेश आ रहे हैं उसका उत्तर दिया जाए। अगर किसी पीड़ित व्यक्ति को नोडल अधिकारियों तक पहुंचने में या किसी अन्य तरह की कोई परेशानी होती है तो उन्हें डीएसएलएसए से संपर्क करने का अवसर होना चाहिए जिसने हमें आश्वासन दिया है कि वे मदद करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे।"

यह आदेश एक रिट याचिका पर दिया गया है जिसमें लॉकडाउन के दौरान महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा से सुरक्षा के लिए 2005 के अधिनियम को कड़ाई से लागू करने का आदेश देने की मांग की गई है।

अदालत ने कहा,

सुरक्षा अधिकारी की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए;

इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में इसका व्यापक प्रचार होना चाहिए;

हेल्पलाइन नंबर का अख़बारों के माध्यम से या अन्य किसी तरीक़े से काफ़ी प्रचार प्रसार होना चाहिए;

अगर कोई शिकायत दर्ज की जाती है तो इस पर तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए; और सुरक्षा अधिकारी को आपातकालीन पास उपलब्ध कराया जाना चाहिए;

महिला अधिकारियों सहित इस कार्य के लिए एक समर्पित टीम का गठन होना चाहिए;

केंद्र सरकार की पैरवी करते हुए एएसजी मनिंदर आचार्य ने अदलत को कहा कि इस मुद्दे को ध्यान में रखते हुए केंद्र ने ये कदम उठाए हैं -

25 मार्च को महिला और बाल विकास मंत्रालय ने राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों/सभी ज़िला के जिलाधिकारियों को वन स्टॉप सेंटर और महिला हेल्पलाइन (WHL-181) को लॉकडाउन के दौरान चौबीसों घंटे चालू रखने को कहा था।

आपातकालीन बचाव के लिए 112 नंबर की उपलब्धता और हिंसा की शिकार महिलाओं की मदद के लिए सुरक्षा अधिकारी की सेवा उपलब्ध रहने की बात है।

बचाव अधिकारी को इसके लिए तैयार करने हेतु महिला और बाल विकास मंत्रालय ने चार घंटे का वेबीनार आयोजित किया जिसमें इस विषय पर काम करनेवाले फ़्रंटलाइन कार्यकर्ताओं को उचित प्रशिक्षण देने के लिए एम्स और नाल्सा के विशेषज्ञों ने मानसिक और क़ानूनी परामर्श दिया ताकि वे पीड़ित महिलाओं की मदद कर सकें।

स्वास्थ्य और परिवार कलयान मंत्रालय ने निमहंस के सहयोग से हेल्पलाइन नंबर 080 – 46110007 शुरू किया है ताकि घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को मनोवैज्ञानिक सपोर्ट दिया जा सके।

राष्ट्रीय महिला आयोग ने घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराने के लिए एक पोर्टल शुरू किया और एक व्हाट्सएप नंबर 7217735372 शुरू किया है।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सभी निजी टीवी चैनलों और एफएम रेडियो को महिलाओं की सुरक्षा और मुश्किल में फँसे लोगों के लिए ERSS (121) का पर्याप्त प्रचार करने को कहा है।

डीएसएलएसए और दिल्ली महिला आयोग ने भी हेल्पलाइन और व्हाट्सएप नंबर शुरू किया है ताकि घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की मदद की जा सके।

अदालत ने इन बातों पर गौर करने के बाद कहा कि इस बारे में पर्याप्त क़दम उठाए गए हैं और अदालत को नहीं लगता कि उसे इस मामले की आगे निगरानी करने की ज़रूरत है।

इस मामले में याचिकाकर्ता की पैरवी अर्जुन सयाल और मिथु जैन ने की।




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