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दिल्ली हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से लोकसभा चुनाव 2019 के VVPAT प्रिंटेड स्लिप्स की गणना के लिए आवेदन पर ग़ौर करने को कहा

LiveLaw News Network
18 Jan 2020 11:45 AM GMT
दिल्ली हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से लोकसभा चुनाव 2019 के VVPAT प्रिंटेड स्लिप्स की गणना के लिए आवेदन पर ग़ौर करने को कहा
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सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह लोकसभा चुनाव 2019 में वीवीपीएटी प्रिंटेड स्लिप्स की गणना के बारे में अनुरोध पर ग़ौर करने के बारे में दायर अपील पर विचार करे।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में यह कहते हुए अपील की कि वोटों की गिनती में काफ़ी गड़बड़ियां पाई गईं और इस वजह से इसके रिकॉर्ड की पूर्ण जांच आवश्यक है।

याचिकाकर्ता ने यह अपील भी की है कि वह आयोग से भविष्य में वीवीपीएटी के अनुरूप प्रणाली का प्रयोग करे जिसमें प्रिंटर को खुला रखा जा सके। इससे व्यवस्था और पारदर्शी बनेगी, क्योंकि प्रिंटेड स्लिप ख़ुद ही कटकर ट्रे में गिर जाएगा। वोटर इस ट्रे से उसे उठाएगा, उसकी जांच करेगा और उसे मतदान कक्ष से बाहर लाकर मोड़कर पीठासीन पदाधिकारी के सामने एक सीलबंद बक्से में गिरा देगा।

याचिकाकर्ता ने यह भी आग्रह किया कि भविष्य में किसी भी विधान सभा/संसदीय चुनावों में किसी भी मतदान केंद्र के ड्रॉप बॉक्स में मौजूद प्रिंटेड स्लिप्स को हाथ से गिनने की व्यवस्था होनी चाहिए।

इस बात पर ग़ौर करने के बाद कि इस बारे में अपील आयोग के समक्ष पहले से ही लंबित है, मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और सी हरि शंकर की पीठ ने इस मामले को ख़ारिज कर दिया पर आयोग से कहा कि वह याचिकाकर्ता को इस बारे में उचित उत्तर दे।

अदालत ने कहा,

"ऐसा लगता है कि इस याचिकाकर्ता ने ख़ुद जो अर्ज़ी दी है उस पर प्रतिवादी ने अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया है। इस दलील को देखते हुए हम प्रतिवादी को यह निर्देश देते हैं कि याचिकाकर्ता ने जो शिकायत कि है उस पर वे ग़ौर करे और उस पर क़ानून, नियम और विनियमन और सरकार की नीति के अनुरूप निर्णय ले और यह भी ध्यान में रखे कि इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न मामलों में क्या निर्णय दिया है।"

पिछले साल, सुप्रीम कोर्ट ने हर संसदीय क्षेत्र के पांच अनायास चुने गए पांच ईवीएम से निकले वीवीपीएटी स्लिप्स की भौतिक गिनती के आदेश दिए थे। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था कि इस फ़ैसले का उद्देश्य वोटों की गिनती ज़्यादा सही हो सके और स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के बारे में न केवल राजनीतिक पार्टियाँ बल्कि आम लोग ज़्यादा संतुष्ट हो सकें।



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