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एएम सिंघवी की आपराधिक मानहानि याचिका पर दिल्ली की अदालत ने लंदन के वक़ील सरोश ज़ाइवाला को जारी किया समन

LiveLaw News Network
20 March 2020 3:45 AM GMT
एएम सिंघवी की आपराधिक मानहानि याचिका पर दिल्ली की अदालत ने लंदन के वक़ील सरोश ज़ाइवाला को जारी किया समन
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दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने सोमवार को लंदन के वक़ील सरोश ज़ाइवाला को आपराधिक मानहानि के एक मुक़दमे में समन भेजा। यह मुक़दमा वरिष्ठ वक़ील और कांग्रेस नेता डॉक्टर अभिषेक मनु सिंघवी ने दायर की है।

सिंघवी ने अपने वक़ील विजय अग्रवाल और मुदित जैन के माध्यम से आईपीसी की धारा 500 के अधीन ज़ाइवाला के ख़िलाफ़ आपराधिक मानहानि का मुक़दमा दायर किया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि ज़ाइवाला ने अपनी पुस्तक "ऑनर बाउंड" और टाइम्ज़ ऑफ़ इंडिया अख़बार को दिए एक साक्षात्कार के माध्यम से उनके दिवंगत पिता डॉक्टर एलएम सिंघवी को अपमानित किया है।

इस पुस्तक में ज़ाइवाला ने चर्चित बोफ़ोर्स तोप घोटाले के तार को सिंघवी के पिता से जोड़ने का प्रयास किया है।

सिंघवी ने इससे इंकार करते हुए अपनी याचिका में कहा है –

"इस पुस्तक में जो अपमानजनक बातें कही गई हैं उसमें ज़रा भी सच्चाई नहीं है। इसमें जो आरोप लगाए गए हैं वे पूरी तरह से झूठे, असत्यापित और सुनी-सुनाई बातों पर आधारित हैं और शिकायतकर्ता के पिता की प्रतिष्ठा को जानबूझकर नुक़सान पहुँचाने का ज़बरन प्रयास है।"

बल्कि याचिका में यह कहा गया है कि इस पुस्तक की बिक्री को बढ़ाने के लिए इस तरह के बयान देकर यह "अफ़वाह फैलाई जा रही है।"

इस आलेख के संदर्भ में कहा गया कि यह पिता-पुत्र की छवि को कलंकित करने का प्रयास है क्योंकि इसमें कहा गया है कि इन्होंने निजी स्वार्थों के लिए काम किया और अपने संपर्कों का प्रयोग ज़ाइवाला के समक्ष होनेवाली सुनवाई पर दबाव बनाने के लिए किया।

ज़ाइवाला ने अपने साक्षात्कार में कहा कि वह एक अन्तर्राष्ट्रीय मुक़दमे की सुनवाई कर रहे थे और डॉक्टर एलएम सिंघवी जो उस समय यूके में भारत के उच्चायुक्त थे, ने उस पंचाट में ज़ाइवाला के सहकर्मी जो डॉक्टर सिंघवी के परिचित थे, के माध्यम से दबाव डालकर इस मुक़दमे के फ़ैसले को भारत सरकार के पक्ष में प्रभावित करने की कोशिश की। हालाँकि, जब भारत सरकार के विरोध में यह फ़ैसला आया तो ज़ाइवाला की फ़र्म को काली सूची में डाल दिया गया।

सिंघवी ने कहा है कि यह बयान सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है, अटकलबाज़ी और झूठ है और ऐसा सिर्फ़ उनके और उनके दिवंगत पिता, परिवार और रिश्तेदारों की प्रतिष्ठा को नुक़सान पहुँचाने के लिए किया गया है।

सिंघवी ने यह दावा भी किया है कि ज़ाइवाला के फ़र्म को काली सूची में डालने के बारे में जो बयान दिया गया है वह विरोधाभासी है क्योंकि ज़ाइवाला ने ख़ुद ही यह माना है कि उनकी फ़र्म पर उनके पिता के उच्चायुक्त बनने से पहले ही रोक लगा दिया गया था।

मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट सुमित आनंद ने ज़ाइवाला को नोटिस भेजकर 29 मई 2020 को अदालत में उपस्थित रहने को कहा है जब इस मामले की सुनवाई होगी।

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