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आदर्श आचार संहिता के दौरान राजनीतिक विज्ञापनों पर अंकुश लगाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं : दिल्ली हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
18 Jan 2020 2:19 PM GMT
आदर्श आचार संहिता के दौरान राजनीतिक विज्ञापनों पर अंकुश लगाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं : दिल्ली हाईकोर्ट
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दिल्ली हाईकोर्ट ने माना है कि आदर्श आचार संहिता के दौरान राजनीतिक विज्ञापनों पर प्रतिबंध न तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न ही व्यापार करने की स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है।

न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा ने कहा है कि व्यवसायिक भाषा पर उक्त प्रतिबंध तर्क की कसौटी पर खरा उतरता है, क्योंकि यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए व्यापक सार्वजनिक हित के चलते लगाया गया है।

याचिकाकर्ताओं ने चुनाव आयोग और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन द्वारा उनको जारी किए गए पत्रों को चुनौती दी थी। इन पत्रों में याचिकाकर्ता को डीएमआरसी द्वारा उपलब्ध कराए गए व्यावसायिक स्थानों पर राजनीतिक विज्ञापन लगाने से रोक दिया गया था।

याचिकाकर्ताओं द्वारा यह तर्क दिया गया था कि चुनाव आयोग ने दिल्ली सरकार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को निर्देश दिया था कि वह डीएमआरसी को सलाह दें कि वह याचिकाकर्ता के साथ किए जाने वाले अनुबंध में निम्नलिखित खंड को सम्मिलित करें-

'आदर्श आचार संहिता की अवधि के दौरान व्यवसायिक विज्ञापन के लिए पट्टे या लीज पर प्रदान किए गए स्थान पर कोई राजनीतिक विज्ञापन प्रदर्शित /चिपकाया नहीं जाएगा। यदि प्रदान किए गए स्थान में कोई राजनीतिक विज्ञापन है तो आदर्श आचार संहिता के लागू होने पर उसे तत्काल हटा दिया जाएगा।'

हालांकि याचिकाकर्ताओं और डीएमआरसी के बीच अनुबंध में पहले ही एक खंड बना दिया गया था जिसमें आदर्श आचार संहिता के दौरान विज्ञापन पर ध्यान देना या विचार करना शामिल था। यह इस प्रकार हैः

'विभिन्न सरकारों, उनके विभागों, मंत्रालयों, सरकारी उपक्रमों, अन्य प्राधिकरणों या राजनीतिक दलों को उनकी उपलब्धियों से संबंधित विज्ञापन की अनुमति दी जाएगी। हालांकि, किसी भी राजनीतिक दल या किसी व्यक्ति के ऐसे विज्ञापन,जो 'आदर्श आचार संहिता' का उल्लंघन करने वाले हो,उनको उस अवधि के दौरान अनुमति नहीं दी जाएगी, जिस अवधि के लिए चुनाव आयोग ने 'आदर्श आचार संहिता' लागू की है।

इसके अलावा, कोई भी विज्ञापन जो 'आदर्श आचार संहिता' का उल्लंघन करता है, उसे उस अवधि के दौरान अनुमति नहीं दी जाएगी,जिस अवधि के लिए चुनाव आयोग ने 'आदर्श आचार संहिता'लागू की है।'

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सुधीर नंदराजोग ने दलील दी कि यदि चुनाव आयोग द्वारा जारी उक्त दिशा-निर्देशों को लागू किया जाता है, तो याचिकाकर्ता को वित्तीय नुकसान होगा। वे निर्दिष्ट वाणिज्यिक या व्यावसायिक स्थानों पर भी कोई राजनीतिक विज्ञापन नहीं लगा पाएंगे और राजनीतिक विज्ञापनों को नीचे ले जाना होगा या हटाना होगा।

यह भी प्रस्तुत किया गया था कि इस तरह की कार्रवाई भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) द्वारा गारंटीकृत उनके मौलिक अधिकार बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (जी) द्वारा दी गई गारंटी के अनुसार किसी भी व्यापार या व्यवसाय को करना भी उनका मौलिक अधिकार है।

चुनाव आयोग ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों का जवाब देते हुए कहा कि इस तरह का निर्देश जारी करने के पीछे तर्क यह है कि जनता को यह नहीं लगना चाहिए कि सरकार सरकारी संपत्तियों पर किसी विशेष राजनीतिक पार्टी को विज्ञापन प्रदर्शन करने की अनुमति देकर उसकी सहायता कर रही है/समर्थन दे रही है। आगे यह भी तर्क दिया गया कि नेतृत्व या लक्ष्य और उद्देश्य या अभिप्राय के बीच एक सीधा संबंध है, जिसे हासिल करने की कोशिश की जाती है यानी स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव।

आयोग ने तर्क दिया कि एक ओर यह दिल्ली के विधान सभा के लिए स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनावों का हित है और दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं का शुद्ध व्यावसायिक हित और निर्देशों के पीछे के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, किसी भी घटना या सूरत में, यह एक उचित प्रतिबंध के समान है।

याचिकाकर्ताओं के दावे को खारिज करते हुए, अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं का यह मामला नहीं था कि वे वही हैं जो अपने स्वयं के विज्ञापन डालेंगे। इस प्रकार, उनके तर्क, कि बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को अनुचित रूप से बंद किया जा रहा है, में कोई योग्यता नहीं है।

अदालत ने यह भी कहा कि इन दिशा-निर्देश में, इस अवधि के दौरान राजनीतिक विज्ञापनों के अलावा अन्य विज्ञापनों को प्रदर्शित करने के लिए याचिकाकर्ताओं पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। यह भी माना गया है उक्त प्रतिबंध ,उचित और निष्पक्ष चुनाव के उद्देश्य की पूर्ति के लिए तर्क की कसौटी पर खरे उतरते हैं।

पीठ ने कहा कि-

'किसी भी स्थिति में, याचिकाकर्ताओं का हित विशुद्ध रूप से व्यावसायिक है। यदि कोई न्याय को संतुलित करता है , तो एक तरफ निजी व्यक्तियों का शुद्ध व्यावसायिक हित है और दूसरी तरफ स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने का सामान्य सार्वजनिक हित है। ऐसे में संतुलन स्पष्ट रूप से सामान्य जनहित के पक्ष में झुकता है।'

इसके अलावा, यह भी रिकॉर्ड में लिया गया था, कि किसी भी व्यवसाय या व्यापार को करने में याचिकाकर्ताओं पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। केवल एक प्रतिबंध है जो एक विशेष प्रकार के विज्ञापन को प्रदर्शित करने के लिए याचिकाकर्ताओं पर लगाया गया है और यह प्रतिबंध भी केवल एक सीमित अवधि के लिए लागू रहेगा।

इसलिए, चूंकि आदर्श आचार संहिता वर्तमान में लागू है, इसलिए चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए निर्देशों का उल्लंघन करते हुए लगाए गए राजनीतिक विज्ञापनों को हटाने के लिए याचिकाकर्ताओं को 24 घंटे का समय दिया जाता है।


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