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COVID 19 महामारी के कारण प्रवासी श्रमिकों के पलायन ने कम उम्र के बच्चों की तस्करी के ख़तरे को बढ़ाया, कलकत्ता हाईकोर्ट ने ज़िला मजिस्ट्रेटों से पंचायत स्तर पर मामले से निपटने को कहा

LiveLaw News Network
15 Jun 2020 7:13 AM GMT
COVID 19 महामारी के कारण प्रवासी श्रमिकों के पलायन ने कम उम्र के बच्चों की तस्करी के ख़तरे को बढ़ाया,  कलकत्ता हाईकोर्ट ने ज़िला मजिस्ट्रेटों से पंचायत स्तर पर मामले से निपटने को कहा
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कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि COVID 19 महामारी के कारण श्रमिकों के पलायन की वजह से छोटे बच्चों पर कुछ पैसे की लालच और ज़िंदा रहने के लिए तस्करी का ख़तरा बढ़ गया।

इस बारे में एक खंडपीठ ने बच्चों की तस्करी और उनके शोषण में आई तेज़ी का संज्ञान लिया। पश्चिम बंगाल के बाल अधिकार संरक्षण आयोग की 8 जून 2020 की रिपोर्ट में यह बात कही गई है, जिसमें 20 मार्च 2020 से 14 अप्रैल 2020 तक आंकड़े का ज़िक्र है जिसमें बाल विवाह, यौन उत्पीड़न, बाल तस्करी और बाल अधिकारों के ऐसे ही उल्लंघनों का ज़िक्र है।

पीठ ने कहा,

"…यह आम सोच है कि बच्चा जिस परिवार में जन्मा है वह उसके लिए सर्वाधिक सुरक्षित जगह है पर परिवार ही ग़रीबी और अनिश्चित सामाजिक स्थायित्व के कारण उसे बेच देता है।"

अदालत ने कहा,

"हाल ही में हमारे संज्ञान में एक रिपोर्ट आई है, जिसमें "बचपन बचाओ आंदोलन" नामक एक एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिपोर्ट दी है, जिसमें कहा है कि लॉकडाउन और अम्फन तूफ़ान के कारण हुई तबाही की वजह से बंगाल में 136 अवयस्क लड़कियों की शादी कर दी गई…पश्चिम बंगाल की सीमा के कई ज़िलों में खुले होने के कारण यहां तस्करी की घटनाएं आम हैं। बंगाल के इन कुछ पोरस ज़िलों में दलाल बहुत ही सक्रिय हैं। अगर हम बच्चों को उनके शोषण सहित किसी भी तरह के उत्पीड़न से बचा नहीं पाते हैं तो हम अपने कर्तव्यों से चूक जाएंगे।"

पीठ ने राज्य के गृह मंत्रालय के प्रधान सचिव को निर्देश दिया कि जिन मामलों के बारे में रिपोर्ट आई है उसके बारे में हलफ़नामा दायर करें और गृह विभाग द्वारा बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी दें। इस तरह के अपराधों को अंजाम देने वालों के ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई हुई इसकी जानकारी भी उन्हें देने को कहा गया है।

अदालत ने सभी संबंधित ज़िलों के पंचायत प्रधान को बाल अधिकारों और बाल विवाह की बुराइयों के बारे में जानकारी दिए जाने का निर्देश भी दिया। अदालत ने कहा कि यह आदेश सभी प्रधानों तक पहुंचना चाहिए और यह ज़िला मजिस्ट्रेट की ड्यूटी है कि पंचायत स्तर पर इन मामलों को हल किया जाए और इसे दूर करने के लिए ज़रूरी कदम उठाए जाएं।

कोर्ट ने ज़िला जज से सीआरपीसी की धारा 164 और पोक्सो से संबंधित मामलों के बारे में उसके पूर्व के निर्देशों को लागू किए जाने के बारे में रिपोर्ट मांगी है। अदालत ने ज़िला जजों को निर्देश दिया कि वे सीआरपीसी की धारा 164 के तहत पोकसो मामलों में बयान दर्ज करना सुनिश्चित करें और इसमें कोई विलंब नहीं हो।,

पीठ ने कहा,

"बाल श्रम के मामलों की रिपोर्ट को देखते हुए हम श्रम विभाग के सचिव को निर्देश देते हैं कि वह इस मामले की जांच करें और श्रम विभाग ने बाल श्रम को रोकने के लिए क्या क़दम उठाया है और क्या कार्रवाई की है इस बारे में रिपोर्ट पेश करें।"

अदालत ने कहा कि यह गृह सचिव का दायित्व है कि वे इस आदेश को सभी पुलिस आयुक्तों, पुलिस अधीक्षकों और ज़िला मजिस्ट्रेटों तक पहुंचाएं ताकि इसको लागू किया जा सके।

अदालत ने कहा,

"ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण के सभी सचिवों को निर्देश दिया जाता है कि वे बाल अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करें और बाल उत्पीड़न की किसी भी घटना या इसकी आशंका को उचित प्राधिकरण के साथ उठाएं।"

अदालत ने रजिस्ट्री को इस आदेश को शीघ्र अपलोड करने का निर्देश दिया।

पीठ ने स्वास्थ्य विभाग की उस रिपोर्ट पर भी ग़ौर किया जिसमें कहा गया था कि 4 जून 2020 तक 29,658 बच्चों में से 5360 बच्चों को संस्थागत क्वारंटीन में रखा गया जबकि 24,298 को उनके घरों में ही क्वारंटीन किया गया। 3005 बच्चों की COVID-19 के लिए जांच की गई और 13,603 बच्चों को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मदद दी गई। हालांकि अदालत ने पूछा की सिर्फ़ इतने ही बच्चों को यह मदद क्यों उपलब्ध कराई गई। 43 बच्चों को सघन इलाज के लिए रेफ़र किया गया। अदालत ने क्वारंटीन सेंटर में सुविधाओं के बारे में भी रिपोर्ट मांगी है कि वहां कितने डॉक्टर हैं।

आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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