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जब सुप्रीम कोर्ट ने PIL दाखिल करने पर रोक लगाई हो तो याचिका पर सुनवाई नहीं कर सकते : दिल्ली हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
18 Sep 2019 10:31 AM GMT
जब सुप्रीम कोर्ट ने PIL दाखिल करने पर रोक लगाई हो तो याचिका पर सुनवाई नहीं कर सकते : दिल्ली हाईकोर्ट
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को सुराज़ इंडिया ट्रस्ट और उसके अध्यक्ष राजीव दहिया द्वारा दायर जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया जिनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने पहले आदेश जारी किए थे और अपनी रजिस्ट्री को यह निर्देश दिया था कि वह उनके द्वारा दायर किसी भी आवेदन को स्वीकार न करें।

"याचिकाकर्ता की सुनवाई करना नहीं है उचित"

मुख्य न्यायाधीश डी. एन. पटेल और न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर ने कहा, "यह हमारे लिए संभव और उचित नहीं है कि याचिकाकर्ता की सुनवाई की जाए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को यह निर्देश दिया गया है कि वह याचिकाकर्ता या दहिया द्वारा दाखिल किसी भी याचिका का मनोरंजन न करे।"

"SC के निर्देशों के विपरीत जाना होगा न्यायिक दुर्व्यवहार"

पीठ ने कहा, "भारत के संविधान के अनुच्छेद 144 में भारत क्षेत्र में सभी अधिकारियों, सिविल और न्यायिक, को सर्वोच्च न्यायालय की सलाह से कार्य करने की आवश्यकता बताई गई है। हम याचिकाकर्ता की सुनवाई नहीं कर सकते हैं, जहां सर्वोच्च न्यायालय ने उसके लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए हैं। यह, हमारे विचार में, भारत के संविधान के अनुच्छेद 144 के विपरीत होगा और हमारी ओर से न्यायिक दुर्व्यवहार की ओर बढ़ेगा।"

दहिया पर लगा है जनहित याचिका दाखिल करने का आजीवन बैन

दरअसल 1 मई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने बेकार और गंभीरता से विचार न करने वाली याचिकाओं को दाखिल करने के मामले में सुराज़ इंडिया ट्रस्ट NGO पर 25 लाख का जुर्माना लगाया था। ये जुर्माना 3 घंटे की सुनवाई के बाद लगाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने सुराज़ इंडिया ट्रस्ट और उसके अध्यक्ष राजीव दहिया को आजीवन कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल करने से भी बैन कर दिया था।

तत्कालीन CJI की पीठ ने दहिया एवं ट्रस्ट को लगाई थी फटकार

तत्कालीन चीफ जस्टिस जे. एस. खेहर ने ट्रस्ट से सवाल किया था कि अब तक 64 याचिकाएं दाखिल की थी और सभी ख़ारिज हुईं। आखिर वो ऐसा कैसे कर सकते हैं, कोर्ट ने कहा था कि ट्रस्ट की याचिकाओं से कोर्ट का समय बर्बाद हुआ है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जे. एस. खेहर, जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड और जस्टिस संजय किशन कौल की पीठ ने सुनवाई की थी।

मौजूदा याचिका

वर्तमान याचिका सूरज इंडिया ट्रस्ट बनाम भारत संघ (C) 469/2009 में 6 दिसंबर, 2010 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई स्वतंत्रता के तहत दायर की गई थी जिसमें यह प्रार्थना की गई थी कि भारत के लोगों के अधिकार, जो कानूनों के उल्लंघन के परिणामस्वरूप घायल/पीड़ित होने पर कानूनी सहारा लेते हैं, के मामले में शिकायतकर्ता के अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए। इसमें CrPC की धारा 47, 128, 195, 340, 301 (1) और 302 (1) की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई थी।

उच्च न्यायालय के विचार

हालांकि उच्च न्यायालय ने उल्लेख किया कि सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य मामले में, सुराज़ इंडिया ट्रस्ट बनाम भारत संघ, (2017) 14 SCC 416, में याचिकाकर्ता संगठन और उसके अध्यक्ष को यह निर्देश दिया था कि वे सीधे या किसी भी अदालत के समक्ष किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से जनहित में कोई भी कारण बताने से परहेज करें।

"64 याचिकाओं में से एक भी याचिका में याचिकाकर्ता नहीं हुआ है सफल"

पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने यह नोट किया था कि याचिकाकर्ता एक अभियोगी है जिसने उच्चतम न्यायालय के समक्ष 64 विभिन्न कार्यवाही की जो किसी भी मामले में सफल नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट के अवलोकन के मद्देनजर भी पीठ इस मामले को सुनने के लिए अनिच्छुक थी जिसमें कहा गया था कि ट्रस्ट इस तरह के मामले को क्यों उठा रही है? यहां तक ​​कि अगर याचिका में की गई प्रार्थनाओं को भी स्वीकार किया जाए तो इससे किसे फायदा होगा?

"दहिया का SC एवं राजस्थान HC के न्यायाधीशों के खिलाफ बोलना था अनुचित"

सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए ये भी टिप्पणी की थी कि ट्रस्ट के अध्यक्ष राजीव दहिया ने राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश समेत 6 न्यायाधीशों के खिलाफ भी शिकायत की। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के 3 न्यायाधीशों के अलावा इसके मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ भी बोला। याचिकाकर्ता के इन सभी कार्यों को पूरी तरह से अनुचित ठहराया गया है। राजीव दहिया ने इसे साबित करने के लिए थोड़ी सी भी कोशिश नहीं की।

दहिया ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर SC एवं HC पर लगाए थे आरोप

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी उल्लेख किया था कि याचिकाकर्ता ने भारत के राष्ट्रपति को पत्र लिखकर यह आरोप लगाया था कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कानून के उल्लंघन में काम किया और वह आम जनता के हितों के विपरीत काम कर रहा है।

विशेष रूप से यह आरोप लगाया गया कि उच्च न्यायिक अधिकारी "निचले न्यायिक अधिकारियों के बचाव" में लिप्त हैं और राजस्थान की न्यायपालिका सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री के साथ "मिलीभगत" कर रही है ताकि याचिकाकर्ता द्वारा दायर कुछ न्यायाधीशों के खिलाफ अवमानना ​​के मामलों में उनके अनुसार आदेश पारित किया जा सके।

हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता की क्या थी दलील

हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता का रुख यह था कि सुप्रीम कोर्ट के उक्त फैसले को अंतिम रूप नहीं मिला था क्योंकि उन्होंने भारत के राष्ट्रपति के समक्ष याचिकाएं लंबित थीं और यह मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में जीवित है।


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