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पत्नी ने अलग रह रहे पति से दूसरे बच्चे की इच्छा जताई, बॉम्बे हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को खारिज किया

LiveLaw News Network
8 Dec 2019 11:30 AM GMT
पत्नी ने अलग रह रहे पति से दूसरे बच्चे की इच्छा जताई, बॉम्बे हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को खारिज किया
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने नानदेड़ पारिवारिक अदालत के उस आदेश को खारिज कर दिया है जिसमें उसने एक पति को इन विट्रो फ़र्टिलाइजेशन (आईवीएफ) विशेषज्ञ से मिलने का निर्देश दिया था ताकि वह अपनी पत्नी की दूसरे बच्चे की इच्छा पूरी कर सके।

औरंगाबाद पीठ के न्यायमूर्ति आरवी घुगे की पीठ ने कहा कि पारिवारिक अदालत का आदेश कोर्ट के "न्यायिक विवेक के लिए चौंकाने वाला" है।

पति केजीपी ने पारिवारिक अदालत के फैसले को चुनौती दी थी जिस पर हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया। पारिवारिक अदालत ने दाम्पत्य संबंध की बहाली के लिए पत्नी पीकेपी की याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश दिया था। पत्नी ने अदालत से आग्रह किया था कि अदालत उसके पति को दूसरे बच्चे के लिए उसके साथ यौन संबंध बनाने को कहे या उसे आईवीएफ विशेषज्ञों से मिलने को कहे।

यह है मामला

इस पति-पत्नी की परिवारवालों ने 18 नवंबर 2010 को शादी कराई थी और 4 जून 2013 को उनको पहला बच्चा पैदा हुआ जो अब छः साल का है और अपनी मां के साथ रहता है। पति-पत्नी दोनों डॉक्टर हैं। पत्नी को अपने अलग हुए पति से दूसरा बच्चा चाहिए था, क्योंकि उसका कहना है कि उसका बेटा अपनी शिक्षा या नौकरी के लिए विदेश चला जाएगा और वह अकेली रह जाएगी। दूसरा बच्चा उसके साथ होगा।

दूसरे बच्चे के लिए दबाव डालने का एक कारण यह है कि पत्नी की उम्र अब 35 साल है और दूसरा बच्चा पैदा करने का यह उचित समय है और बाद में वह बढ़ती उम्र के कारण इस कार्य के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से उतना सक्षम नहीं रह पाएगी।

याचिकाकर्ता पति ने अपनी याचिका में पत्नी से तलाक के लिए उसी पारिवारिक अदालत के समक्ष आवेदन दिया था। अदालत ने कहा कि सहमति के बिना पति या पत्नी को एक दूसरे के साथ यौन संबंध के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि तलाक लेने का प्रमुख कारण उसकी पत्नी का बेलगाम बर्ताव है। पति ने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी उसे गाली देती है, अभद्र भाषा का प्रयोग करती है, जिसकी उसने कल्पना तक नहीं की थी। उसने कहा कि एक बार जब वह अपनी मां के साथ केरल से वापस आया तो उसकी पत्नी ने उसे गालियां दी कि क्या तुम्हारी पत्नी तुम्हारी यौन इच्छा के लिए पर्याप्त नहीं है जो तुम्हें अपनी मां की जरूरत पड़ी। उसने कहा कि एक और मौके पर उसने इस तरह की बात उसकी मां के बारे में कहा था।

पारिवारिक अदालत ने कहा कि एक महिला के बच्चे जनने के अधिकार उचित और वैध है और उसका आदर किया जाना चाहिए। बच्चा जन सकने वाली किसी महिला को इससे वंचित करना उसको बांझ बनाने जैसा है।

पारिवारिक अदालत ने यह भी कहा कि उसकी पत्नी की दूसरा बच्चा जनने की इच्छा इतनी तीव्र है कि वह इस पर होने वाला खर्च भी अपने पति से नहीं लेना चाहती है।

अदालत का फैसला

अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील एएम गायकवाड से दोनों पक्षों के बीच में सुलह की संभावना के बारे में पूछा। गायकवाड ने अदालत से कहा,

"पत्नी ने पति के क्लीनिक में मरीजों की उपस्थिति में अपने पति का वायर से गला घोंटने की कोशिश की और उसके बाद उसकी जिस तरह की स्थिति हुई है, यह असंभव लगता है कि वह अपनी अलग हुई पत्नी के साथ यौन संबंध स्थापित करेगा।"

अदालत ने कहा,

" यह अदालत अपनी आंख बंद नहीं कर सकती और 'संभावित बच्चे'के भविष्य के बारे में इतना असंवेदनशील नहीं हो सकती जिस पर पति और पत्नी में से किसी ने भी गौर नहीं किया है और पारिवारिक अदालत भी इस पर गौर करने से चूक गई।

हमारी राय में, जिस परिस्थिति में इस बच्चे को इस दुनिया में लाया जाएगा उसकी जानकारी जब उसे मिलेगी तो उस पर इसका बुरा असर पड़ेगा और उसका मानसिक विकास प्रभावित होगा।"

इसके बाद अदालत ने पारिवारिक अदालत के आदेश की कुछ बातों का जिक्र किया-

हमने पाया है कि निचली अदालत ने इस बात पर एकदम ही गौर नहीं किया कि किसी बच्चे का विकास पैसे पर नहीं परिवार पर निर्भर करता है। किसी बच्चे में सभी सामान्य लक्षणों के साथ उसका मानसिक और शारीरिक विकास जो उसे एक योग्य और सक्षम व्यक्ति बनाता है...एक बेहतर पारिवारिक माहौल में ही संभव हो सकता है।"

जस्टिस घुगे ने कहा -

"पति-पत्नी दोनों साथ आ जाएं यह सिर्फ अटकलबाजी है और न तो पति-पत्नी और न ही अदालत इस बारे में किसी तरह की भविष्यवाणी कर सकती है। यह समय पर छोड़ देना चाहिए क्योंकि समय सभी घावों को भर देता है।

जबरदस्ती दूसरे बच्चे पैदा करने के लिए अदालत से निर्देश प्राप्त करना और वह भी उस समय जब वैवाहिक संबंध को पुनर्स्थापित करने के लिए याचिका अदालत में लंबित हो, बच्चे की मानसिक विकास में बाधक होगा।"

पति की याचिका को स्वीकार करते हुए अदालत ने कहा,

"बहुत सारे फैसले इस मुद्दे पर आये हैं लेकिन किसी भी मामले में मैंने यह नहीं पाया जिसमें एक पक्ष ने बच्चा पैदा करने के लिए अलग हुए पार्टनर को बाध्य करने के लिए अदालत ने कोई आदेश दिया हो।

मेरी राय में, जैसा कि वर्तमान क़ानून कहता है, इस तरह का आदेश नहीं दिया जा सकता और इस बारे में सालुंके की इस दलील का कोई मायने नहीं है कि पुरुष का वीर्य पति की विशेष परिसंपत्ति नहीं है।"

इस तरह, अदालत ने पारिवारिक अदालत के आदेश को निरस्त कर दिया।


आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहांं क्लिक करेंं



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