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बॉम्बे हाईकोर्ट के वकीलों ने CAA-NRC के खिलाफ प्रोटेस्ट में अपना समर्थन देने के लिए संविधान की प्रस्तावना पढ़ी

LiveLaw News Network
20 Jan 2020 5:51 PM GMT
बॉम्बे हाईकोर्ट के वकीलों ने CAA-NRC के खिलाफ प्रोटेस्ट में अपना समर्थन देने के लिए संविधान की प्रस्तावना पढ़ी
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सोमवार को लगभग सौ वकील बॉम्बे हाईकोर्ट के गेट नंबर 6 के बाहर इकट्ठा हुए और पूरे देश में हो रहे नागरिकता संशोधन अधिनियम, एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के साथ अपनी एकजुटता दिखाने के लिए भारत के संविधान की प्रस्तावना का पाठ किया। इस समूह का नेतृत्व नवरोज सरवई, मिहिर देसाई और गायत्री सिंह जैसे वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने किया।

सीएए के खिलाफ वकीलों ने सभी अधिवक्ताओं को दोपहर 2 बजे (लंच के समय) हाईकोर्ट के बाहर इकट्ठा होने के लिए आमंत्रित किया और कहा-

"सीएए, एनआरसी और एनपीआर के चल रहे विरोध और बहस के प्रकाश में, वकीलों के रूप में हम अपने राष्ट्र के संस्थापक दस्तावेज की रक्षा के लिए विरोध करने की आवश्यकता महसूस करते हैं।"

उक्त समूह ने अपने संबंधित न्यायालयों में प्रस्तावना एकत्र करने और पढ़ने के लिए पूरे मुंबई में अधिवक्ताओं से आग्रह किया।

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित ओपी जिंदल ग्लोबल लॉ यूनिवर्सिटी के फाउंडिंग वाइस चांसलर प्रोफेसर सी राजकुमार द्वारा लिखित एक लेख वकीलों के बीच बांटा गया था।

लेख में कहा गया -

"सीएए निम्नलिखित कारणों के कारण संवैधानिक जांच पर खरा नहीं उतर सकता। सीएए छह धार्मिक समुदायों से संबंधित व्यक्तियों की पहचान करता है और उन्हें अन्य धर्मों विशेष रूप से इस्लाम पर विशेषाधिकार देता है। यह वर्गीकरण परीक्षण योग्य नहीं है और कानून की संवैधानिक जांच पर खरा नहीं उतरता, विशेष रूप से मुसलमानों को इसमें बाहर छोड़ दिया गया। यह भेदभाव का एक उदाहरण है। धर्म के आधार पर नागरिकता प्रदान करना, संविधान के निर्माताओं द्वारा खारिज कर दिया गया था।

दो, वर्गीकरण का वस्तु से तर्कसंगत संबंध नहीं है। धार्मिक उत्पीड़न से प्रभावित लोगों को नागरिकता का विशेषाधिकार प्रदान करने के लिए अधिनियम में वर्गीकरण को तीव्रता से किया गया है। लेकिन देशों का चयन और धर्मों का समावेश इस उद्देश्य के साथ तर्कसंगत संबंध नहीं है। यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि अन्य धर्मों का पालन करने वाले लोग हैं, जो इन तीन देशों के साथ-साथ दक्षिण एशिया के अन्य देशों में भी धार्मिक उत्पीड़न से पीड़ित हैं।

तीन, मनमाने रूप से दी गई समानता का विरोध। संविधान का अनुच्छेद 14 "कानून के समक्ष समानता या भारत के क्षेत्र में कानूनों की समान सुरक्षा" प्रदान करता है। सुप्रीम कोर्ट ने समानता की परीक्षा पास करने के लिए गैर-मनमानी के महत्व पर जोर दिया है। यानी समानता मनमानी नहीं होनी चाहिए। इस मामले में, देशों का चयन, धर्मों की पहचान और अधिक महत्वपूर्ण रूप से मुसलमानों का चयनात्मक बहिष्कार, अनुच्छेद 14 का स्पष्ट उल्लंघन है। "

जैसा कि पहले बताया गया था, सुप्रीम कोर्ट के वकील भी लॉन में इकट्ठा हुए थे और संविधान की प्रस्तावना पढ़ी थी।

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