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भारतीय नागरिक होने के नाते हर लड़की को शांतिपूर्ण जीवन जीने का अधिकार: मप्र हाईकोर्ट ने समझौते के आधार पर पॉक्सो केस रद्द करने से किया इनकार

LiveLaw News Network
15 Jan 2022 6:42 AM GMT
Writ Of Habeas Corpus Will Not Lie When Adoptive Mother Seeks Child
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने यौन हमले की पीड़ित 17 साल की लड़की और आरोपी व्यक्ति के बीच समझौते के आधार पर यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012, (POCSO ) अधिनियम के तहत दर्ज मामला रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि भारतीय नागरिक होने के नाते प्रत्येक लड़की को शांति से गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार है।

आरोपी व्यक्ति पर आरोप था कि वह पीड़ित का पिछले दो साल से पीछा कर रहा था और उसे परेशान कर रहा था।

कोर्ट ने कहा,

" भारतीय नागरिक होने के नाते हर लड़की को शांति, गरिमा और अपने जीवन को खतरे में डाले बिना अपना जीवन जीने का अधिकार है ।"

न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया की खंडपीठ ने कहा कि यह एक ऐसा मामला है, जहां आवेदक-आरोपी पीड़िता का लगातार पीछा कर रहा था और परेशान कर रहा था और जब वह दीवाली मनाने के लिए अपने घर आई थी तो उसने सार्वजनिक स्थान पर उसका हाथ पकड़ लिया और इसलिए अदालत ने केस रद्द करने से इनकार कर दिया।

आवेदक पर 11वीं कक्षा में पढ़ने वाली पीड़िता का पीछा करने और परेशान करने का आरोप है। यहां तक ​​कि जब पीड़िता के माता-पिता ने आवेदक को अपना व्यवहार सुधारने के लिए मनाने की कोशिश की लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।

इसके बाद पीड़िता को एक इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश मिल गया और जब वह 2019 में दीवाली मनाने के लिए अपने घर वापस आई तो आरोपी न केवल उसका हाथ सार्वजनिक स्थान पर पकड़ा, बल्कि उसने उसके साथ दुर्व्यवहार भी किया।

कथित तौर पर घटना के बाद भागते समय उसने उसे जान से मारने की धमकी दी थी और धमकी भी दी थी कि वह उस पर तेजाब फेंक देगा।

इसके बाद पीड़िता ने एक रिपोर्ट दर्ज कराई जिसमें कहा गया कि पिछले दो वर्षों से आवेदक उसे परेशान रहा है और उसका पीछा कर रहा है।

पुलिस ने जांच समाप्त करने के बाद आरोप पत्र दायर किया और आरोपी पर आईपीसी की धारा 354, 354 (डी), 506 और पोक्सो अधिनियम की धारा 7/8, 11/12 के तहत अपराध के लिए मुकदमे बनाया।

इसके बाद आवेदक ने समझौता के आधार पर मामले को रद्द करने की मांग करते हुए अदालत का रुख किया।

न्यायालय की टिप्पणियां

मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने शुरू में कहा कि पीड़िता घटना की तारीख को करीब 17 साल की नाबालिग थी और आरोप है कि आवेदक पिछले दो सालों से उसका पीछा कर रहा था और परेशान कर रहा था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़िता ने सिर्फ इतना कहा था कि अब उसने मामले से समझौता कर लिया है।

पीठ ने कहा,

" इन परिस्थितियों में और आरोप की प्रकृति को देखते हुए जिसके अनुसार आवेदक लगातार उसे परेशान और पीछा कर रहा था, इस न्यायालय का विचार है कि यह नहीं कहा जा सकता है कि आवेदक द्वारा किया गया अपराध समाज के खिलाफ नहीं है। भारतीय नागरिक होने के नाते हर लड़की को बिना अपने जीवन और गरिमा पर खतरा महसूस किए शांतिपूर्ण ढंग से जीने का अधिकार है । "

केस का शीर्षक - हनी शर्मा बनाम मध्य प्रदेश और अन्य राज्य।

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