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प्रिंट और विजुअल मीडिया पर कोरोना को सांप्रदायिक रूप देने का आरोप, मद्रास हाईकोर्ट ने दिशानिर्देश तय करने की मांग वाली याचिका खारिज की

LiveLaw News Network
4 May 2020 3:30 AM GMT
प्रिंट और विजुअल मीडिया पर कोरोना को सांप्रदायिक रूप देने का आरोप, मद्रास हाईकोर्ट ने दिशानिर्देश तय करने की मांग वाली याचिका खारिज की
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पिछले दिनों अपने एक आदेश में ,मद्रास हाईकोर्ट ने COVID-19 महामारी के चलते मीडिया के विनियमन के लिए दिशा-निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने दोहराया कि इस पहलू पर भारत सरकार को विचार करना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि-

''अदालत ने भी इस बात पर ध्यान दिया है कि सभी संस्थाएँ संबंधित कानून के तहत आती हैं,परंतु विजुअल या दृश्य मीडिया कानून के दायरे में नहीं आ रहा है। इसलिए भारत सरकार को चाहिए कि वह इस मामले को देखें। यह न्यायालय इस मामले पर विचार नहीं कर रहा है।''

न्यायमूर्ति एम. सत्यनारायणन और न्यायमूर्ति एम. निर्मल कुमार की खंडपीठ ने अधिवक्ता एम. जैनुल आबिदीन की तरफ से दायर याचिका को खारिज कर दिया है। इस याचिका में मांग की गई थी कि केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाए कि वह प्रिंट मीडिया और विजुअल मीडिया के लिए दिशा-निर्देश जारी करें। ताकि COVID-19 महामारी से संबंधित किसी सूचना,अपडेट या न्यूज से अपनी खबर बनाते या उसे दिखाते समय मीडिया सावधानी बरत सकें और संक्रमित व्यक्तियों के बारे में गोपनीयता बनाए रखें।

याचिकाकर्ता के अनुसार प्रिंट मीडिया व विजुअल मीडिया में बार-बार इस तरह की खबरें आ रही है,जिनमें कुछ अन्य बातें भी बताई जा रही हैं,जैसे दिल्ली के एक सम्मेलन में भाग लेने गए एक विशेष धर्म के लोग COVID-19 महामारी से संक्रमित पाए गए हैं। वहीं लोगों की अनुमति लिए बिना ही और बिना किसी अधिकार के उनके नाम भी प्रकाशित किए जा रहे हैं। इस तथ्य के कारण उनको सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ रहा है।

याचिकाकर्ता ने इंगित किया कि इससे मुसलमान लोग विशेष रूप से प्रभावित हो रहे हैं। जबकि उनके परिवार के सदस्यों ने स्वेच्छा से अपना चेकअप करवाया है और जब उनका कोरोना COVID-19 परीक्षण का परिणाम नकारात्मक आया तो वह अपने घर लौट आए।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह ट्राई रूल्स और अन्य ट्रांसमिशन कानूनों का पूरी तरह अनादर है। वहीं प्रेस एंड रेजिस्ट्रेशन आॅफ बुक्स एक्ट 1867 का उल्लंघन भी है।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने कहा कि केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने पहले ही सारांश दिशा-निर्देश जारी कर दिए थे। जिसके तहत मीडिया को चेतावनी दी गई थी कि वे ऐसे असत्यापित समाचारों का प्रसार न करें,जिनसे संभवतः डर का माहौल पैदा हो।

इसके अलावा न्यायालय ने यह भी कहा कि प्रेस के लिए पहले से ही दिशानिर्देश निर्धारित हैं। सिर्फ विजुअल मीडिया के मामले में कानून में कुछ कमी है।

प्रेस के संबंध में अदालत ने कहा कि-

''प्रेस में तथ्यात्मक जानकारी की आपूर्ति के लिए सीमाएं बनाई गई हैं। जिनके उल्लंघन पर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पास जा सकते हैं और वह उचित कार्रवाई भी कर सकती है। इसके अलावा अन्य कानूनी उपाय भी उपलब्ध हैं। जिनके तहत मानहानि का केस दायर करने के साथ-साथ आईपीसी की धारा 499 और 500 के तहत आपराधिक कार्यवाही भी की जा सकती है।''

विजुअल मीडिया के बारे में अदालत ने कहा -

''जहां तक दृश्य मीडिया का संबंध है। स्व-विनियमन को छोड़कर अन्य कोई विनियमन इन पर लागू नहीं है। इनके लिए आज के समय में कोई कानून उपलब्ध नहीं हैं। प्रेस एंड रेजिस्ट्रेशन आॅफ बुक्स एक्ट 1867 के तहत पर्याप्त विनियम रखे गए है। यदि याचिकाकर्ता को परेशानी है तो वह प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और न्यूज ब्रॉड कास्टिंग स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी के पास इनके खिलाफ जा सकता है। अदालत ने भी इस बात पर ध्यान दिया है कि सभी संस्थाएँ संबंधित कानून के तहत आती हैं,परंतु विजुअल या दृश्य मीडिया कानून के दायरे में नहीं आ रहा है। इसलिए भारत सरकार को चाहिए कि वह इस मामले को देखें। यह न्यायालय इस मामले पर विचार नहीं कर रहा है।''

इस मामले में हाईकोर्ट ने सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉर्पोरेशन लिमिटेड व अन्य बनाम भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड व अन्य (2012) 6 एमएलजे 772,मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले भी हवाला दिया है। इस फैसले के तहत सुप्रीम कोर्ट ने दृश्य मीडिया के लिए दिशानिर्देश तय करने के संबंध में कोई भी आदेश देने से इंकार कर दिया था।

इसके अतिरिक्त अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि जो भी व्यक्ति किसी भी गलत सूचना के कारण परेशान हैं, वे सामान्य कानून या आपराधिक मुकदमे के माध्यम से कार्यवाही करने के हकदार हैं।

याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की थी कि उन लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए जो सोशल मीडिया के जरिए COVID-19 के बारे में भम्र व झूठी सूचनाएं फैला रहे है। चूंकि इस तरह की सूचनाएं भी एक विशेष धर्म के लोगों के खिलाफ बैर-भाव को बढ़ाती हैं।

हालांकि, पीठ ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इंकार करते हुए इस याचिका को खारिज कर दिया है।

एक संबंधित समाचार में कलकत्ता हाईकोर्ट ने मीडिया को चेताया था कि वह स्वयं को ''गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग'' से दूर रखें और मीडिया को कहा है कि वह किसी भी आदेश की रिपोर्ट करने से पहले उसे हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किए गए आदेशों की काॅपी से सत्यापित कर लें।

मामले का विवरण-

केस का शीर्षक-एडवोकेट एम. जैनुल आबिदीन बनाम तमिलनाडु राज्य व अन्य

केस नंबर-डब्ल्यूपी नंबर-7491/2020

कोरम- न्यायमूर्ति एम. सत्यनारायणन और न्यायमूर्ति एम.निर्मल कुमार

प्रतिनिधित्व-एडवोकेट ए.सैयद कलेशा (याचिकाकर्ता के लिए) व विशेष सरकारी वकील वी. जयप्रकाश नारायणन (राज्य के लिए)

आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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