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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अदालत कक्ष के अंदर हुई फ़ायरिंग पर लिया स्वतः संज्ञान; अतिरिक्त मुख्य सचिव और डीजीपी को कोर्ट में पेश होने को कहा

LiveLaw News Network
19 Dec 2019 6:13 AM GMT
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अदालत कक्ष के अंदर हुई फ़ायरिंग पर लिया स्वतः संज्ञान; अतिरिक्त मुख्य सचिव और डीजीपी को कोर्ट में पेश होने को कहा
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिजनोर ज़िला के एक अदालत कक्ष में तीन लोगों ने जो फ़ायरिंग की उस पर स्वतः संज्ञान लिया है।

मंगलवार को तीन लोग सीजेएम, बिजनोर के अदालत कक्ष में घुस आए और ताबड़तोड़ फ़ायरिंग शुरू कर दी। इस घटना में कोर्ट के एक व्यक्ति की मौत हो गई। रिपोर्ट के अनुसार, सीजेएम किसी तरह अदालत से निकलने में सफल रहे और अन्य स्टाफ़ के साथ अपने कमरे में पहुंच गए।

इस नींदनीय घटना पर स्वतः संज्ञान लेते हुए न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति सुनीत कुमार ने कहा :

"अब शीघ्र कोई क़दम उठाने का समय आ गया है। अब मामले को और लटकाया नहीं जा सकता है। अब समय आ गया है जब इस मामले के साथ पूरी दृढ़ता से निपटने की ज़रूरत है"।

पीठ ने इस तथ्य पर ग़ौर किया कि पहले भी ज़िला अदालतों में सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिश की गई थी। लेकिन विभिन्न जिलों जैसे मुज़फ़्फ़रनगर, आगरा और बिजनोर में ज़िला जजों पर हमले होते रहे।

पीठ ने कहा कि 2008 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने एक वरिष्ठ जज की अध्यक्षता में समिति गठित की थी जिसको ज़िला जजों को सुरक्षा मुहैया कराने के बारे में सुझाव देने को कहा गया था। इस बारे में राज्य सरकार के अधिकारियों से भी बातचीत हुई पर यह सब व्यर्थ रहा।

अदालत ने कहा,

"…आज तक कोई ठोस क़दम नहीं उठाया गया। अब तो स्थिति ऐसी आ गई है कि न्यायिक अधिकारी भी सुरक्षित नहीं रहे क्योंकि अब तो अदालत कक्ष में इस तरह की घटनाएँ हो रही हैं।"

पीठ ने इस तरह की हिंसक घटनाओं को रोकने और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कुछ हिदायतें दी -

ज़िला अदालतों में एडवोकेटों का पंजीकरण इस तरह से किया जाए कि उनकी पहचान के बारे में अदालत के कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों को पता हो।

ज़िला न्यायालयों में मुक़दमादारों के प्रवेश के लिए पास जारी किया जाना चाहिए और इसके लिए ज़िला न्यायालय में व्यवस्था की जानी चाहिए।

एडवोकेटों को अदालत परिसर में रहने के दौरान अपना पहचानपत्र लटकाना चाहिए और जब भी सुरक्षाकर्मी इसे देखना चाहें, उन्हें यह दिखाया जाए। इस मामले में अहं या अहंकार की कोई बात नहीं है क्योंकि यह उनकी ही सुरक्षा के लिए है। ज़िला अदालतों में जब भी ज़रूरत हो तो सीआरपीएफ के साथ विशेष रूप से प्रशिक्षित सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की जाए।

अदालत में आने वाले आरोपियों के सुरक्षित प्रवेश की व्यवस्था हो। वकीलों और मुक़दमादारों के प्रवेश के द्वार अलग होने चाहिए। इस बारे में ज़िला बार असोसीएशन,, यूपी बार काउन्सिल और इलाहाबाद एवं लखनऊ बार असोसीएशनों से सुझाव माँगे जाएँ। अदालत ने यूपी बार काउन्सिल, इलाहाबाद हाईकोर्ट बार असोसीएशन, लखनऊ के इलाहाबाद एवं अवध बार असोसीएशन से कहा है कि सुरक्षा व्यवस्था को पुख़्ता बनाने के लिए वे अपने एक-एक प्रतिनिधि को अदालत की कार्यवाही देखने के लिए भेजना चाहिए।

इस मामले की अगली सुनवाई अब 20 दिसम्बर को होगी जिस दिन राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) और पुलिस महानिदेशक को अदालत में मौजूद होने को कहा है ताकि उनसे सुझाव प्राप्त किया जा सके।

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