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दस साल बाद कर्नाटक हाईकोर्ट ने एजी की नियुक्ति को ख़ारिज किया

LiveLaw News Network
18 Feb 2020 6:26 AM GMT
दस साल बाद कर्नाटक हाईकोर्ट ने एजी की नियुक्ति को ख़ारिज किया
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कर्नाटक हाईकोर्ट ने कर्नाटक प्रशासनिक अधिकरण के एक आदेश को सही माना है जिसमें उसने सहायक लोक अभियोजक सह सहायक सरकारी वक़ील की 2010 में नियुक्त को ग़लत माना है। अधिकरण ने राज्य को उस उम्मीदवार को 10 लाख रुपए का हर्ज़ाना देने को कहा है जिसे इस ग़ैर क़ानूनी नियुक्ति के कारण इस पद पर नियुक्ति नहीं दी गई थी।

न्यायमूर्ति जी नरेंद्र और एम नागप्रसन्न ने कहा, "यह काफ़ी अफ़सोसजनक है कि छोटे-बड़े सार्वजनिक पदों पर बैठे लोग यह भूल गए हैं कि उन्हें जिस पद पर बैठाया गया अहै वह एक पवित्र विश्वास है। इस तरह के कार्यालय प्रयोग के लिए हैं दुरुपयोग कि लिए नहीं। हमारे लिए यह निष्कर्ष निकालना मुश्किल नहीं है कि प्रतिवादी नम्बर तीन (अशोक कुमार) किसी बाहरी कारणों से प्रेरित था। चयन अथॉरिटी का इस तरह का कार्य क़ानून के तहत अकल्पनीय है। यह अनावश्यक आपत्तियों से भी आगे की बात है कि प्रतिवादी नम्बर 3 की नियुक्ति को धोखाधड़ी और बेईमानी माना गया।"

पृष्ठभूमि

अभियोजन और सरकारी विवाद विभाग ने 18.6.2009 को नियुक्ति कि लिए विज्ञप्ति जारी किया। यह पद अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित था और दोनों ही आवेदक रेवन्ना पीसी और तीसरे प्रतिवादी (अशोक कुमार) ने इस पद के लिए आवेदन दिया। लिखित परीक्षा 7.11.2009 और 8.11.2009 को आयोजित हुई और उसके बाद साक्षात्कार हुआ।

सफल उम्मीदवारों की जो सूची जारी की गई उसमें रेवन्ना 86.20 अंक लेकर 281वें नंबर पर था और कुमार 84.4 अंक के साथ 691वें नम्बर पर था। इसके बाद चयन की एक अस्थायी सूची 12 अप्रैल 2010 को जारी की गई और इस सूची में रेवन्ना का नाम नहीं था पर कुमार का नाम 130वें नंबर पर था और यह बताया गया कि उसे 87.40 अंक प्राप्त हुए जबकि पहले बताया गया था कि उसको 84.4 अंक प्राप्त हुए थे।

रेवन्ना ने इसके ख़िलाफ़ शिकायत की जिस पर ग़ौर नहीं किया गया और उसके बाद उसने अधिकरण में शिकायत की। नौ साल के बाद अधिकरण ने 24 अक्टूबर 2019 को फ़ैसला दिया कि कुमार की नियुक्ति ग़लत थी।

कुमार ने अपनी दलील में कहा था कि अधिकरण का यह कहना कि उसकी नियुक्ति ग़लत है, उचित फ़ैसला नहीं है और यह कहना कि उसकी नियुक्ति चयन अथॉरिटी की धोखाधड़ी के कारण है, निराधार है और प्राप्तांक में जो बदलाव किया गया वह लिखावट की ग़लती में किया गया सुधार के कारण था। और अगर यह धोखाधड़ी है तो इसके लिए चयन अथॉरिटी ज़िम्मेदार है और वह इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं है और वह इस चयन प्रक्रिया में एक निर्दोष उम्मीदवार की तरह शामिल हुआ है।

राज्य ने अपनी दलील में कहा कि अधिकरण का फ़ैसला ग़लत और तथ्यों के ख़िलाफ़ है। राज्य को किसी भी तरह की ग़लती को सुधारने का अधिकार है जिसके बाद तीसरे प्रतिवादी की नियुक्ति की गई। राज्य ने यह भी कहा कि अधिकरण को चयन को ग़लत ठहराने का अधिकार नहीं है और आवेदक को 10 लाख के मुआवज़े का आदेश अनावश्यक और ग़लत है।

मूल आवेदक ने कहा था कि ज़्यादा अंक प्राप्त करने के बाद भी उसका चयन नहीं हुआ क्योंकि चयन अथॉरिटी ने ग़लत क़दम उठाया है।

अदालत ने कहा, "हमारी राय में तीसरे नम्बर के प्रतिवादी की एपीपी-सह-एजीपी पद पर नियुक्ति ग़ैरक़ानूनी और शुरू से ही ग़लत है क्योंकि वह ऐसा उम्मीदवार नहीं था जिसे आवेदक की तुलना में ज़्यादा अंक प्राप्त हुआ था और इस बारे में सरकार ने ग़लती होने की जो दलील दी है वह हमें स्वीकार्य नहीं है"।

अदालत ने कहा कि तीसरे प्रतिवादी को चयन अथॉरिटी की धोखाधड़ी का सीधा लाभ मिला है। इस तरह की धोखाधड़ी में अगर हम तीसरे प्रतिवादी के वक़ील की दलील को मान लें तो यह ग़लत व्यक्ति से हमदर्दी दिखाना होगा और इस तरह क़ानून के तर्कों का पराजय होगा...क़ानूनी अदालतें क़ानून को लागू करने के लिए होती हैं न कि क़ानून को धता बताने के लिए या ग़ैरक़ानूनी बात को आगे बढ़ाने के लिए नहीं…इस मामले को निपटाने में जो देरी हुई उसके आधार पर एक ग़ैर क़ानूनी नियुक्ति का बचाव नहीं किया जा सकता जो कि शुरू से ही ग़लत था। चाहे कितना भी असुविधाजनक लगे, अदालत को क़ानून का फ़ैसला सुनाना है"।

अदालत ने कहा, "सामान्य स्थिति में, अगर धोखाधड़ी से कोई नियुक्ति प्राप्त की जाती है तो अदालत को चाहिए कि वह इस नियुक्ति से होनेवाले ग़ैरक़ानूनी लाभ लौटाने को कहे पर यहाँ तीसरे प्रतिवादी के प्रति संवेदना की भी ज़रूरत है क्योंकि उसने काम किया है और पिछले 10 सालों में वेतन प्राप्त किया है और उसको सारा वेतन वापस करने के लिए कहना अनुचित होगा। इसलिए हम उससे उसके वेतन का कोई हिस्सा वसूलने का आदेश नहीं देंगे"।

अदालत ने अधिकरण के आदेश में बदलाव किया और राज्य सरकार के गृह विभाग को मूल आवेदक को मुआवज़ा देने को कहा। अदालत ने कहा, "प्रथम प्रतिवादी को आवेदक को लागत के रूप में 10 लाख रुपए की राशि के भुगतान के आदेश को संशोधित किया जाता है और प्रथम प्रतिवादी को निर्देश दिया जाता है कि वह आवेदक को इस राशि का भुगतान करे और इसके बाद उस अधिकारी की पहचान करे जो इस धोखाधड़ी के लिए ज़िम्मेदार थे, जाँच करे, क़ानून की प्रक्रिया का पालन करे, उत्तरदायित्व निर्धारित करे और यह राशि उन अधिकारियों से वसूले जिनकी पहचान की गई है।"

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