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एक केस जिसे भुला दिया गया : बिना किसी रिकॉर्ड के लंबित 23 साल पुराने केस में दिल्ली हाईकोर्ट ने नोटिस जारी किया

LiveLaw News Network
27 Jan 2020 11:43 AM GMT
एक केस जिसे भुला दिया गया : बिना किसी रिकॉर्ड के लंबित 23 साल पुराने केस में  दिल्ली हाईकोर्ट ने नोटिस जारी किया
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पिछले हफ्ते, दिल्ली हाईकोर्ट ने एक आपराधिक मामले में नोटिस जारी किया जो 23 वर्षों से निष्क्रिय पड़ा हुआ था। 23 साल से इस केस में कोई प्रगति नहीं हुई और फिर अचानक यह केस सामने आया।

एक व्यक्ति जो अग्रिम जमानत पर बाहर है, अचानक उसके खिलाफ एक मामला याद आया जो कुछ दशक पहले उसके खिलाफ शुरू हुआ था। यह मामला तब सामने आया जब इस व्यक्ति के पासपोर्ट आवेदन पर उसके खिलाफ आपराधिक मामलों की जांच की गई।

आपराधिक कार्यवाही लंबित होने के कारण इस व्यक्ति का पासपोर्ट आवेदन खारिज हो गया, तब उसे पता चला कि उसके खिलाफ दशकों पुराना एक आपराधिक मामला लंबित है।

यह था मामला

1996 में महरौली पुलिस स्टेशन में याचिकाकर्ता के खिलाफ डेटामेटिक्स लिमिटेड नामक कंपनी के कुछ शेयर सर्टिफिकेट की चोरी के संबंध में एक शिकायत दर्ज की गई थी। ये शेयर मूल रूप से 1993 में याचिकाकर्ता की पत्नी द्वारा खरीदे गए थे, जिन्होंने तब इसे उसके पास स्थानांतरित करने का फैसला किया था।

तीन साल बाद पति 04 अक्टूबर, 1997 को, याचिकाकर्ता को उक्त शिकायत के संबंध में पुलिस स्टेशन में बुलाया गया था। वह और उसकी पत्नी दोनों कई मौकों पर पुलिस स्टेशन गए थे और उन्होंने वह सारी जानकारी उपलब्ध कराई थी जो उनसे मांगी गई थी।

उसी दिन, याचिकाकर्ता ने पटियाला हाउस कोर्ट के समक्ष अग्रिम जमानत की अर्जी दी, जिसमें उसे 10 अक्टूबर तक अंतरिम राहत दी गई थी। 10/10/1997 को पटियाला हाउस कोर्ट में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने अग्रिम जमानत दी थी क्योंकि जांच अधिकारी ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता की अब जांच की आवश्यकता नहीं थी। यह भी निर्देशित किया गया था कि यदि गिरफ्तारी करने की आवश्यकता उत्पन्न होती है, तो याचिकाकर्ता को 7 दिनों की पूर्व सूचना देनी होगी।

इसके बाद, 2000-2001 में, पुलिस ने याचिकाकर्ता को गिरफ्तार करने की प्रक्रिया शुरू की। उक्त याचिकाकर्ता ने अग्रिम जमानत की मांग करते हुए एक आवेदन दिया और इसे 12 जनवरी, 2001 के आदेश से पटियाला हाउस कोर्ट ने मंजूर कर लिया।

याचिकाकर्ता अब स्वीकार करते हैं कि वर्ष 2001 के बाद से, वर्तमान मामले में कोई प्रगति नहीं हुई। उपरोक्त मामले में कोई जांच रिपोर्ट भी दर्ज नहीं की गई है।

2017 में, याचिकाकर्ता ने पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था, हालांकि, इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि उसके खिलाफ एक आपराधिक मामला लंबित है। पासपोर्ट अधिकारियों से इस तरह की प्रतिक्रिया मिलने के बाद, याचिकाकर्ता ने उक्त मामले में कार्यवाही के चरण का पता लगाने के लिए ट्रायल कोर्ट के समक्ष एक आवेदन दिया।

इसके बाद, एसएचओ, महरौली पुलिस स्टेशन द्वारा एक स्टेटस रिपोर्ट दायर की गई, जिसमें निम्नलिखित को अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया गया:

'एसआई आर.एन. चौधरी ने आखिरी बार केस फाइल को संबंधित कोर्ट में दाखिल करने के लिए आरसी नंबर 69/21 दायर किया था। हालांकि, उसके बाद, कोई भी रिकॉर्ड / केस फाइल / दस्तावेज एफआईआर संख्या 436/1996 से संबंधित नहीं थे। '

यह भी पता चला कि वर्तमान मामले से संबंधित कोई रिकॉर्ड / केस फाइल / दस्तावेज साकेत कोर्ट में ट्रायल जज के पास उपलब्ध नहीं है। इसलिए, 05 मई, 2017 को एक आदेश पारित किया गया था, जिसमें यह कहा गया था कि रिकॉर्ड रूम में संबंधित व्यक्ति, साकेत कोर्ट केस फाइल को ट्रेस करने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करेगा।

हालांकि, याचिकाकर्ता का दावा है कि 1996 में उनके खिलाफ दर्ज मुकदमे से संबंधित कोई भी मुकदमा अदालत के पास नहीं है।

चूंकि वर्तमान मामले से संबंधित दस्तावेज / केस फाइल कहीं नहीं पाए गए, इसलिए याचिकाकर्ता को लगता है कि उसके खिलाफ कार्यवाही आगे नहीं बढ़ पाएगी। हालांकि, इसके बावजूद, वह उक्त आपराधिक मामले में एक आरोपी बना हुआ है।

वह यह भी स्वीकार करता है कि उक्त पेंडेंसी पासपोर्ट प्राप्त करने के मामले में एक नागरिक के रूप में उसके मानसिक तनाव और पीड़ा का कारण बन गई है।

राहत पाने के लिए याचिकाकर्ता ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष एक आवेदन दिया, जिसमें अदालत ने उसके खिलाफ उक्त आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करने के लिए कहा।

उक्त याचिका को स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी की एकल पीठ ने सुनवाई की। अगली तारीख से पहले स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड की डिजीटल कॉपी की आवश्यकता के लिए भी कहा है। इस मामले को अब 30 मार्च को सुना जाएगा।




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