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एनआई एक्ट की धारा 138 - हाईकोर्ट पार्टियों के बीच समझौते के आधार पर पुनरीक्षण चरण के बाद भी दोषसिद्धि के आदेश को रद्द कर सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
16 Aug 2021 1:50 AM GMT
एनआई एक्ट की धारा 138 - हाईकोर्ट पार्टियों के बीच समझौते के आधार पर पुनरीक्षण चरण के बाद भी दोषसिद्धि के आदेश को रद्द कर सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा है कि हाईकोर्ट चेक बाउंस के मामले में संबंधित पक्षों द्वारा किये गये समझौतों को ध्यान में रखते हुए सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल करके एक आपराधिक पुनर्विचार में अपने द्वारा पारित दोषसिद्धि के आदेश को रद्द कर सकता है।

कोर्ट ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत किए गए अपराध को माफ करने की अनुमति दी है।

कोर्ट ने कहा,

"केवल इसलिए कि मुकदमा एक पुनरीक्षण चरण में पहुंच गया है या उस चरण से भी आगे, अपराध की प्रकृति और चरित्र स्वत: से नहीं बदलेगा और यह मानना गलत होगा कि पुनरीक्षण चरण में, एनआई अधिनियम की धारा 138 के तहत दंडनीय अपराध की प्रकृति के साथ ऐसा व्यवहार किया जाना चाहिए जैसे कि वह आईपीसी की धारा 320 की तालिका- II के अंतर्गत आता है।"

बेंच ने आगे कहा कि यह सिद्धांत किसी भी अन्य कानून में किसी भी दोषी की मदद नहीं करेगा, जहां अन्य लागू स्वतंत्र प्रावधान मौजूद थे, क्योंकि एन.आई. अधिनियम की धारा 138 के तहत दंडनीय अपराध आईपीसी के अध्याय XVII (यानी संपत्ति के लिए अपराध) के तहत दंडनीय बनाए गए सामान्य अपराधों से अलग था।

यह देखते हुए कि पक्षों ने विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिया था, न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह ने कहा कि अपराध माफी की अनुमति की आवश्यकता थी।

मामला संक्षेप में

सीआरपीसी की धारा 482 के तहत एक याचिका दायर की गई थी जिसमें एनआई अधिनियम की धारा 138 के तहत किए गए अपराध को समाप्त करने और याचिकाकर्ता को दी गई एक साल की सजा को रद्द करने की प्रार्थना की गई थी।

याचिकाकर्ता और विरोधी पक्ष संख्या 2 के बीच व्यापारिक संबंध थे, जिसके दौरान याचिकाकर्ता ने विपक्षी संख्या 2 के पक्ष में 1,00,000/- रुपये के दो चेक जारी किए थे जो अपर्याप्त राशि के कारण बाउंस हो गए थे।

इसके बाद एक शिकायत दर्ज करायी गयी, जिसमें अदालत ने याचिकाकर्ता को दोषी ठहराया और उसे एक साल के साधारण कारावास और 3,00,000/- रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई।

याचिकाकर्ता ने तब अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, फैजाबाद के समक्ष एक आपराधिक अपील दायर की थी और सुनवाई के समय उसने 1,00,000/- (एक लाख) रुपये जमा किए थे।

अंततः दिसंबर, 2020 में अपील खारिज कर दी गई, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट के समक्ष एक आपराधिक पुनरीक्षण को प्राथमिकता दी थी, जिसे सुनवाई के लिए स्वीकारने के स्तर पर ही खारिज कर दिया गया था।

आपराधिक पुनरीक्षण खारिज होने के बाद, विरोधी पक्ष संख्या 2 और याचिकाकर्ता ने अपने पिता के माध्यम से समझौता किया।

22 जनवरी, 2021 को याचिकाकर्ता और विरोधी पक्ष संख्या 2 ने सौहार्दपूर्ण ढंग से समझौता किया, जिसे रिकॉर्ड में भी रखा गया था।

इस प्रकार, आरोपी-याचिकाकर्ता ने अपराध माफ करने और जेल की सजा निरस्त करने लिए धारा 482 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया था।

रखी गयीं दलीलें

अधिवक्ता नावेद अली और संदीप यादव ने दलील दी कि मेरिट के आधार पर पुनरीक्षण याचिका खारिज किये जाने के बाद सीआरपीसी की धारा 482 के तहत याचिका सुनवाई योग्य थी। उन्होंने 'कृपाल सिंह प्रताप सिंह ओरी बनाम सलविंदर कौर हरदीप सिंह' के मामले में गुजरात हाईकोर्ट के फैसले पर भरोसा जताया।

याचिकाकर्ता ने आगे प्रस्तुत किया कि चूंकि एनआई अधिनियम का उद्देश्य प्राथमिक रूप से प्रतिपूरक था, दंडात्मक नहीं था, इसलिए एनआई अधिनियम की धारा 147 का सीआरपीसी की धारा 320 पर अधिभावी प्रभाव होगा। यह उस चरण की परवाह किए बिना था जिस पर पक्षकार न्यायालय की अनुमति के साथ समझौता कर रहे थे।

याचिकाकर्ता ने 'दामोदर एस प्रभु बनाम सैयद बाबालाल एच' के मामले पर भी भरोसा जताया, जहां सुप्रीम कोर्ट ने एनआई की धारा 138 के तहत अपराध को समाप्त करने के लिए दिशानिर्देश तैयार किए थे।

दूसरी ओर, एजीए आलोक सरन ने दलील दी कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं थी, क्योंकि याचिकाकर्ता को पहले से ही निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराया जा चुका था और अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट द्वारा पुनरीक्षण में दोषसिद्धि आदेश को बरकरार रखा गया था।

उन्होंने दलील दी कि जब हाईकोर्ट ने पहले ही गुण-दोष के आधार पर पुनरीक्षण आवेदन को खारिज कर दिया था, तो क्या पार्टियों या उनमें से किसी एक पार्टी को समझौता करने और इसी अदालत से बरी करने का आदेश प्राप्त करने की अनुमति दी जा सकती है, यह सवाल था।

सीआरपीसी की धारा 320 की उप-धारा (6) के प्रावधानों और 'तनवीर अकील बनाम म.प्र. सरकार' के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियों के मद्देनजर एजीए ने तर्क दिया कि पार्टियों के बीच समझौते के वास्तविक प्रभाव को प्राप्त करने के लिए उचित कार्यवाही शुरू करने हेतु पार्टियों को सर्वोच्च न्यायालय में भेज दिया जाना चाहिए।

उसके समक्ष वर्णित तथ्यों पर विचार करने के पश्चात् निम्न प्रश्न हाईकोर्ट के समक्ष विचार के लिए उठा:-

क्या चेक बाउंस के मामले में संबंधित पक्षों द्वारा किये गये समझौतों को ध्यान में रखते हुए सजा की पुष्टि करने वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिका में हाईकोर्ट द्वारा पारित आदेश को सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दायर याचिका में हाईकोर्ट द्वारा निरस्त किया जा सकता है?

न्यायालय का निष्कर्ष

कोर्ट ने कहा कि धारा 482 के तहत निहित शक्तियों का प्रयोग तभी किया जा सकता है जब वादी के लिए कोई अन्य उपाय उपलब्ध न हो और न कि जहां क़ानून द्वारा कोई विशिष्ट उपाय प्रदान किया गया हो।

कोर्ट ने इस धारणा से सहमत होने से भी इनकार कर दिया कि जब एक अपराध का निर्णय पुनरीक्षण स्तर की स्थिति में पहुंच गया था, तो अदालत की अनुमति के बिना समझौता तभी किया जा सकता है जब हाईकोर्ट या सत्र न्यायालय ऐसे उद्देश्य के लिए अनुमति देता है।

"... यह सच है कि इस न्यायालय ने आपराधिक पुनरीक्षण को खारिज कर दिया था और नीचे की अदालत द्वारा पारित दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा था, लेकिन इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि इस न्यायालय के पास सीआरपीसी की धारा 482 के तहत निहित शक्तियों के प्रयोग में हस्तक्षेप करने की शक्ति केवल पर्याप्त न्याय करने या अन्याय से बचाने और पार्टियों के बीच समझौते की भावना को संरक्षित रखने के लिए है। यह पूरी तरह से उचित है और कानूनी भी है।"

अदालतों द्वारा स्वीकार किए गए एक प्रगतिशील और व्यावहारिक सिद्धांत की पृष्ठभूमि में कि यदि संभव हो तो, पार्टियों को दरवाजे पर न्याय प्रदान किया जाना चाहिए, अदालत को यह सोचने और इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए मजबूर होना पड़ा कि वर्तमान स्थिति एनआई एक्ट की धारा 147 के तहत अपराध माफ करने के उद्देश्य के लिए एक विशेष परिस्थिति हो सकती है।

न्यायमूर्ति सिंह ने आगे कहा,

"यह बिल्कुल स्पष्ट है कि चेक बाउंस के अपराध के संबंध में, यह उपचार का प्रतिपूरक पहलू है जिसे दंडात्मक पहलू पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए तदनुसार, दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया गया।"

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को प्रतिवादी-राज्य को 5000/- रुपये की लागत का भुगतान करने का निर्देश दिया। साथ ही, याचिकाकर्ता द्वारा जमा की गई एक लाख रुपये की राशि को विपक्षी संख्या 2 के पक्ष में जारी करने का आदेश दिया गया।

आदेश की कॉपी यहां पढ़ें:



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