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सेवा मामलों में PIL पर विचार नहीं किया जाना चाहिए : सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
23 July 2019 7:25 AM GMT
सेवा मामलों में PIL पर विचार नहीं किया जाना चाहिए : सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया [निर्णय पढ़े]
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सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर से यह दोहराया है कि सेवा मामलों (service matters) में जनहित याचिका पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।

इस मामले में [विशाल अशोक थोराट बनाम राजेश श्रीरामबापू भाग्य], बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति द्वारा दायर रिट याचिका का निपटारा करते हुए मोटर वाहन सहायक निरीक्षक के मोटर वाहन विभाग (भर्ती) नियम 2016 में ग्रुप-सी के नियम 3 (iii) और नियम 3 (iv) नियम 4 के प्रावधान को रद्द कर दिया है और चयनित सूची के संबंध में कुछ निर्देश जारी कर दिए।

क्या था यह पूरा मामला ?
दरअसल अशोक थोराट और 545 अन्य उम्मीदवार, जिनका नाम 832 उम्मीदवारों की चयनित सूची में शामिल था, ने शीर्ष न्यायालय के समक्ष इस फैसले को चुनौती दी कि रिट याचिका में याचिकाकर्ता के पास सहायक वाहन निरीक्षक की भर्ती को चुनौती देने के लिए कोई लोकस नहीं था। आगे यह कहा गया कि चूंकि चयनित उम्मीदवारों को पक्षकार नहीं बनाया गया था इसलिए चयन सूची के संबंध में उच्च न्यायालय द्वारा कोई निर्देश जारी नहीं किया जा सकता था।

अपील पर क्या रहा पीठ का विचार?

अपील पर विचार करते हुए न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की पीठ ने यह कहा कि रिट याचिका में याचिकाकर्ता ने मोटर वाहनों के सहायक निरीक्षक के पद पर भर्ती में भाग लेने के लिए विज्ञापन के खिलाफ कभी अर्जी नहीं दी था। पीठ ने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय ने विज्ञापनों को चुनौती देने की अनुमति नहीं दी थी लेकिन अंततः 832 उम्मीदवारों की चयन सूची में हस्तक्षेप किया, जो प्रारंभिक परीक्षा और मुख्य परीक्षा के बाद तैयार की गई थी।

इस संदर्भ में पीठ ने अय्यूबखान नूरखान पठान बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में निर्णय का उल्लेख किया कि जनहित याचिका की सेवा मामले में सुनवाई नहीं की जानी चाहिए। हालांकि यह गौर किया गया कि रिट याचिका को पीआईएल के रूप में तैयार नहीं किया गया था, पीठ ने यह कहा:

"दिए गए फैसले को देखने पर यह लगता है कि उच्च न्यायालय अपीलकर्ता के इस प्रस्तुतिकरण से प्रभावित था कि मोटर वाहनों के सहायक निरीक्षक की नियुक्ति से सार्वजनिक राजस्व को नुकसान हो रहा था, जो 12.2.1989 की अधिसूचना में निर्धारित योग्यता को पूरा नहीं करते थे, इसलिए उच्च न्यायालय ने पीआईएल के रूप में वस्तुतः रिट याचिका का मनोरंजन किया है। पैरा 29 में उच्च न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियों के बाद स्पष्ट रूप से इस बात का संकेत मिलता है कि उच्च न्यायालय रिट याचिका को पीआईएल के रूप में मानने के लिए आगे बढ़ा, हालांकि यह मोटर वाहनो के सहायक निरीक्षक की सेवा की शर्त से संबंधित है।"

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