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जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने घाटी में रह रहे कश्मीरी पंडितों के लिए विशेष रोज़गार पैकेज को सही ठहराया [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
21 Feb 2019 5:36 PM GMT
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने घाटी में रह रहे कश्मीरी पंडितों के लिए विशेष रोज़गार पैकेज को सही ठहराया [निर्णय पढ़े]
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जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने घाटी में रह रहे कश्मीरी पंडितों के लिए विशेष रोज़गार पैकेज देने की घोषणा को दी गई गई चुनौती को ख़ारिज कर दिया।

कश्मीरी सिखों की संस्था कश्मीरी सिख समुदाय और दो बेरोज़गार कश्मीरी युवा ने हाईकोर्ट में अर्ज़ी देकर यह माँग की कि उन्हें भी कश्मीरी पंडितों के समकक्ष माना जाए। कश्मीरी पंडितों की वापसी और उनके पुनर्वास के लिए प्रधानमंत्री के पैकेज की घोषणा के बाद रोज़गार के संदर्भ उन्होंने यह अपील की।इन लोगों ने कहा कि प्रधानमंत्री के पैकेज में घाटी में रह रहे सिखों को कश्मीरी पंडितों से अलग मानने से समानता के प्रावधान का उल्लंघन हुआ है। जम्मू-कश्मीर प्रवासी (विशेष अभियान) भर्ती नियम, 2009 को संशोधित कर कश्मीरी पंडितों के लिए यह विशेष प्रावधान किया गया है।

न्यायमूर्ति संजीव कुमार ने कहा कि संशोधन के कारण कश्मीरी पंडितों का एक ऐसा वर्ग तैयार हो गया है जो 1 नवंबर 1989 के बाद से कश्मीर घाटी से बाहर प्रवासन पर नहीं गए हैं। इस वर्गीकरण कोई सही ठहराते हुए कोर्ट ने कहा,

"आलोच्य एसआरओ के तहत जिस वर्ग की पहचान की गई है वह कश्मीरी पंडितों का एक ऐसा वर्ग है जो घाटी में गड़बड़ी होने के बाद बाहर नहीं गया प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद वहीं रहा। इस समुदाय की इस बारे में लगातार माँग के बाद यह वर्गीकरण किया गया है क्योंकि ये लोग घाटी में काफ़ी बुरे हाल में रह रहे थे। भारत सरकार ने इस बात पर भी ग़ौर किया कि ये मुट्ठीभर लोग अपनी आर्थिक दुर्दशा और अपने पड़ोसियों द्वारा सुरक्षा की गारंटी दिए जान के कारण घाटी के बाहर नहीं गए। वे घाटी में ही रहे और यहाँ की हालात से झूझते रहे जिसकी वजह से उनके परिवार की स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ा।"

कोर्ट ने कहा कि सिख समुदाय की स्थिति कश्मीरी पंडितों की तरह नहीं है। कोर्ट ने कहा कि नियमों में जो संशोधन हुआ है उसका उद्देश्य कश्मीरी पंडितों की स्थिति को ठीक करने के लिए किया गया है जो कि घाटी में 1989-90 के दौरान विपरीत परिस्थितियों के बावजूद घाटी में ही रहना बहना बेहतर समझा।

"उनके समुदाय के लोगों को लक्ष्य करके मारने की कार्रवाई से उनके दिमाग़ में असुरक्षा और भय व्याप्त हो गया, और घाटी में वे अपने जान की क़ीमत पर ही रह रह रहे थे। यह असुरक्षा की भावना हर ओर थी। इस स्थिति में कुछ परिवार ऐसे थे जो या तो भारी ग़रीबी में जी रहे थे या फिर उनके पास इतना संसाधन नहीं था कि वे बाहर जाकर बस सकें या फिर उनके पड़ोसियों ने सुरक्षा का आश्वासन दिया। कारण जाहे जो रहा हो, वे घाटी से बाहर नहीं गए और घाटी में समुदाय के लिए स्थिति ख़राब होने का ख़ामियाज़ा भुगता।"


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