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पुलिस को कॉल करने से पहले महिला ने आरोपी को 529 बार किया फोन, दिल्ली HC ने बलात्कार के आरोपी को बरी किया [निर्णय पढ़ें]

Live Law Hindi
14 Jun 2019 4:36 AM GMT
पुलिस को कॉल करने से पहले महिला ने आरोपी को 529 बार किया फोन, दिल्ली HC ने बलात्कार के आरोपी को बरी किया [निर्णय पढ़ें]
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने बलात्कार के आरोपी को अन्य बातों के साथ यह देखने के बाद बरी कर दिया कि शिकायतकर्ता महिला ने पुलिस को कॉल करने से पहले 529 बार आरोपी को फोन किया जिससे उसके बयानों पर संदेह पैदा हुआ।

CrPC की धारा 372 के तहत दायर की गई थी अपील

दरअसल न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल की पीठ दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 372 के तहत दायर एक अपील पर सुनवाई कर रही थी जिसमें ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी जिसके तहत आरोपी को भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 328/376 (2) (n) /383/506 के तहत आरोपों से बरी कर दिया गया था।

कारण जिनके चलते अपीलार्थी की गवाही लगी संदेहास्पद

अदालत ने सबूतों पर विचार करने से पहले ट्रायल कोर्ट की इस बात से सहमति जताई कि अपीलार्थी-अभियोजन पक्ष की गवाही निम्नलिखित कारणों से 'अत्यधिक अविश्वसनीय' और भरोसा पैदा नहीं करती:

• अपीलार्थी-अभियोजन पक्ष ने यह आरोप लगाया कि उसे 13 दिसंबर, 2016 को IIM, नोएडा में एक सेमिनार में भाग लेने का निमंत्रण मिला था। हालांकि, 13 दिसंबर, 2016 एक राजपत्रित अवकाश था। इसके अलावा IIM, नोएडा द्वारा भेजे गए आरटीआई जवाब में कहा गया है कि राजपत्रित अवकाश के कारण, 13 दिसंबर, 2016 को वहां कोई संगोष्ठी निर्धारित नहीं थी और उन्होंने अपीलकर्ता-अभियोजन पक्ष को कोई निमंत्रण नहीं भेजा था।

• अपीलकर्ता अभियोजन पक्ष के बयान में एक बड़ा विरोधाभास है, जैसे कि दिनांक 05 जनवरी, 2017 को DCP, द्वारका को की गई लिखित शिकायत में और 17 जनवरी, 2017 को SHO PS पहाड़गंज को दी गई शिकायत में अपीलकर्ता- अभियोजन पक्ष ने यह उल्लेख नहीं किया था कि वह अनुसंधान कार्य के उद्देश्य से लिंकडिन (LinkdIn) के माध्यम से आरोपी-प्रतिवादी के संपर्क में आयी थी। हालाँकि उसने न्यायालय के समक्ष अपने बयान में उपरोक्त तथ्य का उल्लेख किया है।

• अपीलकर्ता-अभियोजन पक्ष ने होटल में जो ID दिया इसमें उसने अलीगढ़, यूपी के अपने पते का उल्लेख किया था क्योंकि दिल्ली पुलिस के दिशानिर्देशों के तहत होटल स्थानीय दिल्ली निवासी को कमरा आवंटित नहीं कर सकते।

• होटल के कमरे के प्रवेश पर 24 घंटे सुरक्षा गार्ड का पहरा रहता है और कोई भी गार्ड की अनुमति के बिना होटल में प्रवेश नहीं कर सकता। अपीलकर्ता-अभियोजन पक्ष आसानी से पुलिस को फोन करने या शोर मचाने के लिए होटल के कमरे से बाहर आ सकती थी या होटल के किसी भी कर्मचारी से कॉल करने का अनुरोध कर सकती थी। अपीलकर्ता अभियोजन पक्ष पूरी तरह चल फिर सकती थी और वो आसानी से इस घटना के होने पर शोर मचा सकती थी।

• यह बताने के लिए रिकॉर्ड पर कोई सबूत नहीं लाया गया है कि अपीलकर्ता अभियोजन को नशीला पदार्थ दिया गया था और इसका प्रभाव उसपर 3 दिनों तक रहा।

• 15 दिसंबर, 2016 को कथित घटना के बाद अभियुक्त प्रतिवादी ने कथित रूप से अपीलार्थी-अभियोजन पक्ष को शिवाजी स्टेडियम स्टेशन पर छोड़ा था। वहां उसने उसका मोबाइल फोन सहित सामान वापस कर दिया। यह अत्यधिक अनुचित है कि अपीलकर्ता अभियोजन पक्ष, सीआरपीएफ के एक सेवानिवृत्त कमांडेंट की बेटी होने के नाते और खुद एक प्रोफेसर होने के नाते अपना मोबाइल फोन प्राप्त करने के बाद पुलिस या किसी अन्य व्यक्ति को कॉल नहीं कर सकी थी।

• ट्रायल कोर्ट के अनुसार FIR दर्ज करने में 32 दिन की देरी हुई या अपीलकर्ता-अभियोजन पक्ष के अनुसार कम से कम 20 दिनों की देरी हुई। अपीलार्थी-अभियोजन पक्ष के अनुसार उसके भाई के विदेश में होने कारण ये देरी हुई। लेकिन अपीलार्थी अभियोजन पक्ष की ओर से इस तरह की बात को स्वीकार करना मुश्किल है क्योंकि अपीलकर्ता-अभियोजन पक्ष स्वयं एक शिक्षित महिला है जो एक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत है।

• अपीलकर्ता-अभियोजन पक्ष ने अपने मोबाइल फोन को भी IO को नहीं सौंपा। अपीलकर्ता-अभियोजन पक्ष ने कहा कि जांच के दौरान पुलिस ने इसके लिए नहीं कहा। हालांकि, अदालत के सामने आईओ ने कहा कि उसने अपीलकर्ता-अभियोजक को अपना मोबाइल फोन सौंपने के लिए कहा था लेकिन उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया।

• अपीलकर्ता-अभियोजन पक्ष ने आरोपी-प्रतिवादी को 16 दिसंबर, 2016 (कथित बलात्कार की तारीख के बाद) से 29 जनवरी, 2017 (शिकायत दर्ज करने से पहले) के बीच 529 कॉल किए। बार-बार कॉल करने का उसका कार्य उसके आरोपों के अनुरूप नहीं है।

"मामले में साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 ए आकर्षित नहीं होती"

इन निष्कर्षों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने अपीलकर्ता-अभियोजन पक्ष की गवाही को अविश्वसनीय माना और बिना किसी आत्मविश्वास को प्रेरित करने वाला बताते हुए कहा कि उसकी गवाही को अस्वीकार करने के कारण हैं। पीठ ने आगे कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 114 ए इस मामले में आकर्षित नहीं होती क्योंकि संभोग के तथ्य सिद्ध नहीं होते हैं।

यह भी उल्लेख किया गया है कि अभियोजन पक्ष के मामले में कई त्रुटियां हैं और संदेह का लाभ आरोपी-प्रतिवादी को दिया जाना चाहिए। नतीजतन अदालत ने अपील को योग्यता के आधार पर खारिज कर दिया।

अपीलकर्ता का प्रतिनिधित्व वकील संजीव भाटिया के साथ वकील सिमरन सिदौरा ने किया और राज्य का प्रतिनिधित्व APP आशा तिवारी ने पहाड़गंज थाने के SI विश्वेंद्र के साथ किया।


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